असम का जनादेश: सांस्कृतिक पुनर्जागरण, विकास और वैचारिक राजनीति की निर्णायक जीत
Assam Mandate: राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक की धारा, पचास वर्षों के लंबे इंतजार, अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ाव और वैचारिक संघर्षों के बाद आखिरकार भगवामय हो उठी है। यह उस सपने का साकार होना है, जिसे 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ के रूप में बोया था और जिसे दीनदयाल उपाध्याय, श्री गुरु गोलवलकर, पूज्य वीर सावरकर और डॉ. हेडगेवार जैसे दूरदर्शियों ने अपने रक्त और चिंतन से सींचा था।
1951 में जब देश विभाजन के घावों से उबरने की कोशिश कर रहा था और कांग्रेस का तुष्टिकरण का मॉडल धीरे-धीरे हावी हो रहा था, तब जनसंघ ने एक स्पष्ट वैचारिक प्रतिज्ञा के साथ राजनीति में कदम रखा। उस प्रतिज्ञा का पहला बिंदु था एक अखंड भारत की अवधारणा, जो सांस्कृतिक रूप से सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र तक एक था।

विभाजन के बावजूद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को राजनीति के केंद्र में रखना और भारतीय पहचान को मजबूत करना उनका प्रमुख ध्येय था। जनसंघ चाहता था कि देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक मजबूत केंद्रीय शासन हो, जिसकी नींव जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण जैसे साहसिक निर्णयों पर टिकी हो। जनसंघ ने आर्थिक रूप से स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत का आह्वान किया, समान नागरिक संहिता का समर्थन किया और सबसे बढ़कर, जनसंख्या एवं सीमा सुरक्षा पर एक ऐसा सूक्ष्म दृष्टिकोण रखा जो उस समय की मुख्यधारा की राजनीति में अकल्पनीय था।
यहीं पर छिपा हुआ है जनसंघ की दूरदर्शिता का वह अनूठा पहलू, जिसे समझे बिना असम की इस ऐतिहासिक जीत को नहीं समझा जा सकता। जनसंघ के संस्थापक मनीषी यह भली-भाँति जानते थे कि भारत की सीमाओं की रक्षा केवल सैन्य बल से नहीं, बल्कि सीमावर्ती राज्यों में जनसांख्यिकीय संतुलन और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने से होगी। यही कारण है कि जनसंघ ने सदैव असम की सांस्कृतिक सुरक्षा और जनसंख्या संतुलन पर विशेष बल दिया। असम केवल एक सीमावर्ती राज्य नहीं, भारत की 'सांस्कृतिक चौकी' है।
इसी असम ने मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा को एक स्पष्ट जनादेश दिया है। 30 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी के बीच भी भगवा लहरा देना डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा के सशक्त जनाधार को दिखाता है। असम के मूल निवासियों के हृदय में उमड़ता यह विश्वास पिछले पाँच वर्षों में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और विकास के अद्भुत संतुलन से उपजा है। पहली बार किसी पार्टी को लगातार तीसरी बार इतना बहुमत मिला है, जो यह सिद्ध करता है कि असम की जनता ने अब अपने अस्तित्व, अपनी पहचान और अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट निर्णय ले लिया है।
इस अभूतपूर्व जीत की पहली और सबसे ठोस वजह है पिछले पाँच वर्षों में असम का सांस्कृतिक उत्थान। हिमंता सरकार ने असम की जनता को उनकी गौरवशाली विरासत से पुनः जोड़ा। उन्होंने असमिया समाज को बताया कि वे लचित बोरफुकन के वंशज हैं, जिन्होंने 1671 की सरायघाट की लड़ाई में मुगलों की विशाल सेना को ब्रह्मपुत्र के पार खदेड़ दिया था। यह स्वाभिमान का बोध जब जन-मानस में उतरता है, तो मतदाता अपनी सभ्यता को बचाने के लिए मतदान करता है।
हिमंता सरकार ने असमिया नववर्ष बीहू जैसे पर्व को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर गौरवान्वित किया। असम की बाँस की बाँसुरी की गूँज अब दिल्ली के विज्ञान भवन से लेकर लंदन और न्यूयॉर्क तक सुनाई देती है।
इस सांस्कृतिक पुनरुत्थान को एक सशक्त विकास मॉडल का सहारा मिला। असम आज भारत के सबसे तेजी से बढ़ने वाले राज्यों में से एक है। असम ने संस्कृति और आधुनिकता के संतुलन का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसका सबसे जीवंत प्रमाण है असम का सेमी-कंडक्टर उद्योग में प्रवेश। जिस राज्य को कभी उग्रवाद और आपदाओं के लिए जाना जाता था, आज वह देश की डिजिटल क्रांति का केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। इसने असमिया युवा को बाहर पलायन करने के बजाय अपनी माटी में भविष्य गढ़ने का सपना दिया है।
इस चुनावी परिणाम का एक और स्तर है, जिस पर खुलकर बात होनी चाहिए। यह स्तर जनसांख्यिकीय संतुलन और सीमा सुरक्षा की उस गुप्त चिंता का है जिसे जनसंघ के पुरोधाओं ने दशकों पहले रेखांकित किया था। असम के मूल निवासियों ने इस जनादेश के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी भूमि, अपनी संस्कृति और अपने जनांकिकीय ढाँचे को असुरक्षित नहीं होने देंगे। यहाँ 'मूलवासी' शब्द बहुत व्यापक और गहरा है; इसमें विभिन्न जनजातियाँ, जातीय समूह और हिंदू विविधताएँ शामिल हैं जिन्होंने सहस्राब्दियों से असम को अपना घर माना है।
"मिया" मुसलमानों को खदेड़ने का जो आख्यान चुनाव में गूँजा, उसे ठीक से समझने की आवश्यकता है। यह बांग्लादेशी मूल के अवैध प्रवासियों के विरुद्ध कार्रवाई का हिस्सा था, जो ऐतिहासिक रूप से असम के मूल मुस्लिम समुदाय से भिन्न हैं।
इन कार्यवाहियों ने सीमा को सुरक्षित रखने के उस स्वप्न को चरितार्थ किया जो पूज्य डॉ. हेडगेवार जी और पूज्य श्री गोलवलकर जी ने देखा था। उनका सपना था एक सशक्त, आत्मविश्वास से भरा हिंदू समाज, जो अपनी सीमाओं की चिंता स्वयं करे और किसी बाहरी जनसांख्यिकीय आक्रमण से अपनी संस्कृति को क्षतिग्रस्त न होने दे। असम ने इस चुनाव में ठीक वैसा ही किया है; उसने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए वीर सावरकर और दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्रवादी चिंतन को मतपेटी में उतार दिया।
यह विजय सिद्ध करती है कि भारत का मतदाता अब रोटी-कपड़ा-मकान से ऊपर उठकर इतिहास, पहचान और सभ्यता के प्रश्नों पर भी वोट करता है। यह वास्तव में पहली बार है, जब असम में एंटी इनकम्बेसी के बावजूद किसी गैर-कांग्रेसी सरकार को इतना व्यापक और स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ है। इस बहुमत का आलम यह है कि विपक्ष का अस्तित्व खंडित हो चुका है।
आने वाली पीढ़ियाँ इस जनादेश को एक उस निर्णायक मोड़ के रूप में याद करेंगी, जब भारत ने अपने प्राचीन मंत्रों, अपनी सीमाओं और अपने समाज को एक साथ साधते हुए इतिहास रच दिया।
(नेशनल कमिश्नर, भारत स्काउट एवं गाइड)












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