अशोक गहलोत ने अध्यक्ष बनने से पहले ही गांधी परिवार को दिखा दिए तेवर
जिस बात का अनुमान था, वही हुआ। अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को रोकने के लिए विधायक दल से चुनाव का दांव खेल ही दिया। सोनिया गांधी और राहुल गांधी को पता नहीं किसने सलाह दी थी कि अशोक गहलोत के अध्यक्ष चुने जाने से पहले ही सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनवा देना चाहिए। यह गांधी परिवार का अलोकतांत्रिक कदम था और राजस्थान के कांग्रेसी विधायकों ने गांधी परिवार को लोकतांत्रिक जवाब दे दिया है।

उन्होंने गहलोत के अध्यक्ष चुने जाने से पहले उनका उत्तराधिकारी चुने जाने पर कड़ा एतराज जताया है। गांधी परिवार को राजस्थान में मुख्यमंत्री चुनने का फैसला नए अध्यक्ष, सीडब्ल्यूसी और विधायकों पर छोड़ना चाहिए था। जब कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ ही नहीं तो अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद छोड़ने और उनका उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया कैसे शुरू हो सकती है?

सोनिया गांधी का संदेश सुनने से इंकार
विधायकों के माध्यम से अशोक गहलोत ने भी अध्यक्ष चुने जाने से पहले गांधी परिवार को बता दिया कि वह कठपुतली अध्यक्ष नहीं बनेंगे। वह अपने हर फैसले के लिए गांधी परिवार पर निर्भर नहीं रहेंगे। गांधी परिवार ने अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनवाने का फैसला यह समझ कर किया था कि वह परिवार के सबसे वफादार हैं इसलिए उनके इशारों पर ही चलेंगे। लेकिन अब आप उन्हीं के राज्य में उनके विरोधी को मुख्यमंत्री बना देंगे तो वह काहे के कांग्रेस अध्यक्ष? गांधी परिवार की इस हरकत से यह भी साबित हो गया कि वे पूरी तरह अलोकतांत्रिक हैं और चुने हुए अध्यक्ष को काम नहीं करने देंगे। जब अध्यक्ष पद के चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है तब कार्यकारी अध्यक्ष को क्या अधिकार रह जाता है कि वह जल्दबाजी में अपने पर्यवेक्षकों के माध्यम से अपनी मर्जी का मुख्यमंत्री थोप दे?
इससे पहले कि अध्यक्ष पद से हट रही सोनिया गांधी के दूत मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के विधायकों को सोनिया गांधी का संदेश सुनाते, गहलोत गुट के 80 विधायकों ने उनकी बैठक में जाने से ही इंकार कर दिया। उन्हें पता था कि वे सोनिया गांधी का क्या संदेश लेकर आए हैं। उन्होंने सोनिया गांधी का संदेश सुनने से भी मना कर दिया। गहलोत समर्थक 80 विधायकों ने मंत्री शान्ति धारीवाल के घर पर अलग बैठक करके दो टूक फैसला किया कि वे इस्तीफे दे देंगे लेकिन सोनिया गांधी के थोपे हुए सचिन पायलट को मुख्यमंत्री स्वीकार नहीं करेंगे। वे शान्ति धारीवाल के घर से 500 मीटर की दूरी पर स्पीकर सी.पी. जोशी के घर पर गए और उन्हें विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफे सौंप दिए। उनकी संख्या 80 थी, 90 थी या 92 थी, यह महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन सोनिया गांधी का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि दो तिहाई से ज्यादा विधायक उनका संदेश सुनने से ही इंकार कर दें?
गांधी परिवार को यह समझना चाहिए कि उनकी धमक अब खत्म हो चुकी है, पहले उन्हें जनता ने ठुकराया और अब उनकी तानाशाही के खिलाफ कांग्रेस के भीतर से आवाज उठनी शुरू हो गई है। वह जिसको भी चाहें उसे विधायक दल का नेता नहीं बना सकते। कांग्रेस नेतृत्व को अब विधायकों की बात सुननी पड़ेगी। दिल्ली से मुख्यमंत्री बनाने वाले बाकी दलों के लिए भी यह सबक है कि अगर वे क्षत्रपों को कमजोर करके बौनों के हाथ में नेतृत्व देंगे, तो भविष्य में खुद कमजोर होंगे। गांधी परिवार ने एक एक कर क्षत्रपों को कमजोर किया। कांग्रेस में अशोक गहलोत जैसे कुछ ही क्षत्रप बचे हैं। अब उन्हें भी अध्यक्ष पद की रेवड़ी देकर उनके अपने प्रदेश में उन्हें कठपुतली बनाने की कोशिश की गई।
बागी विधायकों की तीन मांग
सोनिया गांधी ने सचिन पायलट के नाम पर सहमति बनवाने के लिए खड़गे और अजय माकन को भेजा था। उनकी मीटिंग का बहिष्कार करने के बाद प्रताप सिंह खाचरियावास, शान्ति धारीवाल और महेश जोशी 22-23 विधायकों के साथ अलग से उन दोनों को मिलने गए और उनके सामने 3 मांगें रखीं। पहली- अशोक गहलोत अध्यक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दें, न कि पहले। दूसरी, गहलोत के इस्तीफे के बाद उनका उत्तराधिकारी चुना जाए और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मांग यह कि 2020 के वफ़ादार में से ही सीएम बने। यानी विधायकों का बहुमत चाहता है कि गहलोत गुट से स्पीकर सी.पी. जोशी, प्रदेश अध्यक्ष गोबिंद सिंह डोटासरा या वरिष्ठ मंत्री बी.डी. कल्ला में से किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाए। यह बात इन दोनों नेताओं ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट के मुंह पर कही क्योंकि उस समय ये दोनों भी वहां बैठे थे।
शांति धारीवाल के घर पर बुलाई गई बैठक कांग्रेस हाई कमान के मुंह पर तमाचा है। यह बात खड़गे और अजय माकन को भी समझ आ गई लेकिन इस संकट की घड़ी में जब कांग्रेस विधायकों को एकजुट रखने की जरूरत है, अजय माकन ने समानांतर बैठक बुलाने के लिए शान्ति धारीवाल और महेश जोशी पर कार्रवाई की धमकी दी है। महेश जोशी ने जो बात कही है, वह महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के हर विधायक का कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी पर भरोसा है लेकिन विधायक चाहते हैं कि पार्टी उन लोगों का ख्याल रखे जो कांग्रेस के प्रति वफादार रहे हैं।
असल में महेश जोशी 2020 की बात कर रहे हैं जब सचिन पायलट बागी होकर अशोक गहलोत का तख्ता पलटना चाहते थे। उस समय 80 विधायक मजबूती के साथ कांग्रेस और गहलोत के साथ खड़े थे। अब उन 80 विधायकों की वफादारी को दरकिनार करके सोनिया गांधी बगावत करने वाले सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहती है, तो वह नहीं चलेगा। इसलिए इन 80 विधायकों ने सोनिया गांधी के पर्यवेक्षकों की बुलाई बैठक में जाने की बजाए विधानसभा स्पीकर सी.पी. जोशी के घर जाकर अपने इस्तीफे सौंप दिए।
अब यहाँ दो लोग बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। एक हैं महेश जोशी, और दूसरे हैं स्पीकर सी.पी. जोशी। महेश जोशी वह व्यक्ति हैं जिन्होंने सचिन पायलट की बगावत के समय बागियों की सदस्यता खत्म करने के लिए स्पीकर सी.पी. जोशी के सामने याचिका दाखिल की थी और सी.पी. जोशी वह व्यक्ति हैं जिन्होंने गांधी परिवार के इशारे पर ही महेश जोशी की याचिका पर तुरंत फैसला लेना टाल कर प्रियंका गांधी को मौक़ा दिया था कि वह सचिन पायलट को मना कर वापस ले आएं। हालांकि अशोक गहलोत उस समय सचिन पायलट को कांग्रेस से निकालने के पक्ष में थे। लेकिन अब गहलोत उन्हीं सी.पी. जोशी को मुख्यमंत्री बनवाना चाहते हैं।












Click it and Unblock the Notifications