Article 30 of Constitution: स्कूल में बाईबिल और कुरान पढ़ाई जा सकती है तो भगवतगीता क्यों नहीं?
हिन्दुओं की धार्मिक शिक्षा को किसी प्रकार का सरकारी प्रोत्साहन न दिया जाना शिकायत की एक वजह रहा है। इसकी जड़ में कहीं न कहीं भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 है जो मौजूदा हाल में इस प्रकार का भेदभाव पैदा करता है।
Article 30 of Constitution: अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनेस्को जो बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है, उसने 2022 में ग्लोबल एजुकेशन मोनिटरिंग रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के मुताबिक पिछले आठ वर्षों में भारत में जो नए विद्यालय खुले हैं, उनके बारे में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। दस नए विद्यालयों में से सात निजी क्षेत्र के विद्यालय थे और केवल तीन ही सरकारी (सार्वजनिक) उपक्रम थे। इसकी तुलना अगर उसी रिपोर्ट की बातों से करें तो पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय बुद्धिजीवी जिसे दक्षिण एशिया कहते हैं, यानि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल जैसे कई अलग-अलग देश होते हैं, उन सभी देशों में ऐसी ही स्थिति है।
पिछले कम से कम तीन दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में निजी उपक्रमों की गिनती लगातार बढ़ ही रही है। शिक्षा के निजीकरण को लेकर भारत में कई अलग-अलग खेमों के राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवियों की सुनें तो शिक्षा के निजीकरण की कड़ी निंदा होती रहती है, मगर फिर भी ये जारी है। इन्हीं हलचलों के बीच भारत की शिक्षा नीति बदली है और मौजूदा सरकार एक नयी शिक्षा नीति ले आई है।
इससे पहले कि हम नयी शिक्षा नीति और बदलावों की बात करें, हमें पहले यह समझना होगा कि शिक्षा नीतियों में खामियां हैं कहां? ये प्रश्न हमें सीधा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 पर ले आता है। आपको शायद याद होगा कि 2016 के दौर में ही ये चर्चा शुरू हो गयी थी कि कैसे पिछले 7 वर्षों में ही सरकार ने मदरसों पर करीब 1000 करोड़ खर्च किये थे। कुछ लोगों के लिए ये प्रश्न महत्वपूर्ण था क्योंकि गुरुकुलों पर कभी कोई ऐसी रकम खर्च होती नहीं दिखती।
कथित अल्पसंख्यक कहलाने वाले समुदायों की मजहबी शिक्षा पर सरकारी खर्च को जायज और हिन्दुओं पर कोई खर्च न होने के पीछे यही अनुच्छेद 30 है। अनुच्छेद 30, देश में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के लिए अल्पसंख्यकों को अधिकार देता है। इसके मुताबिक:
1. सभी अल्पसंख्यकों (धार्मिक और भाषाई) को देश में अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों को स्थापित और संचालित करने का अधिकार होगा।
1.A. अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित और प्रशासित किसी शैक्षणिक संस्थान की किसी भी संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण के लिए कोई कानून बनाते समय, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसा कानून, अल्पसंख्यकों के अधिकारों को ना तो रोकेगा और ना ही निरस्त करेगा।
2. राज्य सरकार, अल्पसंख्यक द्वारा शासित किसी भी शैक्षणिक संस्थान को आर्थिक सहायता देने के मामले में, भेदभाव नहीं करेगी।
संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत दी गई सुरक्षा केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित है और इसे देश के सभी नागरिकों तक विस्तारित नही किया जाता है।
अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक समुदाय को यह भी अधिकार देता है कि वे अपने बच्चों को अपनी ही भाषा में शिक्षा प्रदान करा सकते हैं। इसी अनुच्छेद से ये अर्थ निकाला जाता है कि मुस्लिम समुदाय चाहे तो अपने बच्चों को उर्दू और ईसाई चाहे तो अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा सकता है। यही वो जगह है जहाँ से हिन्दुओं के साथ भेदभाव अपने आप सरकारी व्यवस्थाओं में घुस जाता है।
इस एक अनुच्छेद से आप समझ सकते हैं कि भारत के किसी भी कस्बे के बड़े स्कूल अल्पसंख्यक समुदाय (मुहम्मडेन/क्रिश्चियन) द्वारा संचालित क्यों होते हैं। इससे आपको ये भी पता चल जाता है कि स्कूलों में बाइबिल या कुरान की शिक्षा क्यों दी जा सकती है और भगवद्गीता पढ़ाना विवाद का विषय क्यों बन जाता है, या बना दिया जाता है।
सिर्फ फण्ड की बात करें तो सितम्बर 2022 में ही एनसीपीसीआर (नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स) ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें बताया गया था कि पिछले कुछ वर्षों में मदरसों को औसतन करीब 10000 करोड़ रुपये का फण्ड प्रतिवर्ष दिया गया। ये मदरसों को मिलने वाले पैसे का केवल आधा था। बाकी का पचास प्रतिशत "गुप्त स्रोतों" से मिल रहा था।
मलंकारा सीरियन कैथोलिक कॉलेज केस (2007) के मामले में दिए गए एक फैसले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, "अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को दिए गए अधिकार केवल बहुसंख्यकों के साथ समानता सुनिश्चित करने के लिए हैं और इनका इरादा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की तुलना में अधिक लाभप्रद स्थिति में रखने का नहीं है।" साथ ही सर्वोच्च न्यायालय का ये भी मानना है कि अल्पसंख्यकों को कानून से बाहर कोई अधिकार नहीं दिया जा रहा। ये सब इसलिए हो सकता है क्योंकि ऐसा अनुच्छेद 30 में वर्णित है।
ऐसा तब है जब भारतीय संविधान के ही अनुच्छेद 28 में कहा जाता है कि सरकार जिस स्कूल को फण्ड दे रही हो, उसमें मजहबी शिक्षा नहीं दी जा सकती। अगर कोई स्कूल अल्पसंख्यक स्कूल है, यानि कि अल्पसंख्यक माने जाने वाले समुदाय द्वारा संचालित है, तो उस पर ये नियम लागू ही नहीं होगा और वहां मजहबी शिक्षा दी जाएगी। इसकी तुलना में हिन्दुओं द्वारा संचालित स्कूल अगर धार्मिक शिक्षा देना चाहें तो वो फ़ौरन सरकारी मदद से वंचित हो जाते हैं।
जो भी स्कूल किसी किस्म की सरकारी मदद जैसे फण्ड, जमीन, किसी किस्म की करों में छूट, यहां तक कि सीबीएसई पाठ्यक्रम के जरिए पढ़ाई भी करवाता है, वो अपने आप सरकारी सहयोग/मदद लेने वाले स्कूल की परिभाषा में आ जाता है। इसका मतलब है हिन्दुओं द्वारा संचालित सभी स्कूल इस परिभाषा से अनुच्छेद 28 के कारण कोई धार्मिक या मजहबी शिक्षा नहीं दे सकते।

मोटे तौर पर कहें तो मान लीजिये कि अमर, अकबर और एंथनी ने एक साथ स्कूल चलाना शुरू किया। तीनों सीबीएसई बोर्ड के स्कूल चलाते हैं। तीनों ही स्कूलों में सभी समुदायों के बच्चे पढ़ते हैं। अब अकबर और एंथनी तो अपने स्कूलों में सरकारी पैसे से मजहबी शिक्षा दे सकते हैं क्योंकि अनुच्छेद 30 है, लेकिन अमर ऐसा करे तो उसका स्कूल सीबीएसई स्कूल नहीं रह जायेगा। क्या यह देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं के साथ भेदभाव नहीं है?
सरकार नयी शिक्षा नीति में जो बदलाव ला रही है, उनमें हिन्दुओं को भी धार्मिक शिक्षा देने के लिए कोई अधिकार देने के लिए क्या प्रावधान किये गए हैं, ये एक बड़ा सवाल है। अब जब कथित राष्ट्रवादी सरकार को सत्ता संभाले लगभग 8 वर्ष का समय बीत चला है, तब सत्ता पक्ष के समर्थक भी ये प्रश्न उठाने लगे हैं। सवाल ये है कि सरकार बहादुर बिना दिल्ली की सड़कें जाम किये, बिना दंगा-फसाद और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए शांतिपूर्वक अपनी मांगे सामने रखने वाले हिन्दुओं की बातें क्यों नहीं सुनती समझती?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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