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Ramcharitmanas Row: रामचरित मानस को कैसे कह दिया नफरती ? तुलसीदास जी तो सामाजिक समरसता की मिसाल थे

बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने श्री रामचरितमानस पर विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि श्रीरामचरितमानस नफरत फैलाने वाला ग्रंथ है। क्या पौराणिक धार्मिक ग्रंथ रामचरितमानस पर सवाल उठाना उचित है?

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Ramcharitmanas Row in Bihar: बिहार के शिक्षा मंत्री ने क्यों कहा कि रामचरित मानस नफरती ग्रंथ है ? इस सवाल पर पक्ष और विपक्ष के बीच जो भी विवाद हुआ वह बहुत अप्रिय है। जिस रामचरित मानस पर देश-विदेश में सैकड़ों शोध हो चुके हैं उस पर सवाल उठाना कहां तक उचित है ? चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में ही तुलसी साहित्य पर अकेले 35 पीएचडी हो चुके हैं। यशस्वी साहित्याकर अमृतलाल नागर ने एक उपन्यास लिखा है- मानस का हंस। यह पुस्तक हिंदी साहित्य की अविस्मरणीय रचना है। इस उपन्यास में गोस्वामी तुलसीदास जी के समग्र जीवन को उकेरा गया है। उनका जीवन सामाजिक समरसता का दुर्लभ उदाहरण है। वह भी उस जमाने में जब भारत में अकबर का शासन था। तुलसीदास जी मुगल सम्राट अकबर के समकालीन थे।

तुलसीदास जी के जीवन से जुड़े प्रमाणिक तथ्यों को जुटाने में नागर जी को कितनी परेशानियां हुईं, इसके बारे में उन्होंने इस पुस्तक के 'आमुख' में लिखा है। 'मानस का हंस' में नागर जी ने तुलसीदास जी की कहानी कहने के लिए कई पात्रों को गढ़ा है। इनमें दो पात्रों का जिक्र जरूरी है। बकरीदी कक्का और हुसैनी जुलाहा। उत्तर प्रदेश के जिस चित्रकूट जिले के राजापुर गांव में उनका जन्म हुआ था बकरीदी कक्का और हुसैनी जुलाहा भी वहीं के निवासी थे। राजा भगत (अहिर) तुलसीदास जी के मित्र थे। तुलसीदास जी का गांव ब्राह्मण, यादव और मुसलमान की मैत्री का सबसे बड़ा प्रतीक था। 'मानस का हंस' में उनके जीवन को कुछ यूं दर्शाया गया है।

भिक्षा मांग कर गुजारा बचपन

भिक्षा मांग कर गुजारा बचपन

तुलसीदास जी की माता हुलसी देवी का निधन उनके जन्म के समय ही हो गया था। जन्म के समय ही उन्होंने राम का उच्चारण किया था इसलिए उनका नाम रामबोला पड़ गया। उनके पिता आत्माराम संस्कृत के विद्वान और प्रसिद्ध ज्योतिषि थे। उन्होंने बालक को अपशगुनी मान कर घर से बाहर निकालने का आदेश दिया। इसके बाद आत्माराम जी की सेविका मुनिया ने तुलसीदास जी को अपनी सास के पास पहुंचा दिया था। तुलसीदास जी मुनिया की सास को पार्वती अम्मा कहते थे। पेट भरने के लिए दोनों घर-घर भीख मांगते थे। जब वे पांच साल के थे तब पार्वती अम्मा का भी निधन हो गया। तुलसीदास जी फिर बेसहारा हो गये। वे भीक्षाटन करते और पढ़ने की चेष्टा करते। एक दिन भटकते भटकते उत्तर प्रदेश के गोंडा के सुकरखेत इलाके में पहुंच गये। वहां सरयू और घाघरा नदी के बीच हनुमान जी का एक मंदिर था। तुलसीदास जी ने इस मंदिर में आश्रय लिया। यहीं उनकी मुलाकात बाबा नरहरि दास से हुई। उन्होंने ही बालक रामबोला का नाम तुलसीदास रखा था। बाबा नरहरि दास ने उन्हें शुरुआती शिक्षा दी। फिर आगे की पढ़ाई के लिए बनारस के प्रसिद्ध विद्वान के पास भेज दिया। शिक्षा पूरी करने के बाद तुलसीदास जी अपने गुरु की आज्ञा के बाद देश भ्रमण के लिए निकल पड़े।

बकरीदी दर्जी के सम्मान में खड़े हो गये तुलसीदास जी

बकरीदी दर्जी के सम्मान में खड़े हो गये तुलसीदास जी

कुछ दिनों के बाद तुलसीदास जी को अपनी जन्मभूमि की याद आयी। तुलसीदास जी की जन्मभूमि को लेकर विवाद हो सकता है। लेकिन ‘मानस का हंस' में उल्लेखित प्रसंग काबिले जिक्र है। राजापुर का पुराना नाम बिकरमपुर है। तुलसी दास जी बिकरमपुर पहुंचे। गांव मे उनकी मुलाकात राजा भगत से हुई। राजा भगत भगवान श्रीराम के भक्त थे। उन्होंने तुलसीदास जी से परिचय पूछा। उन्होंने अपने पिता और माता का नाम बताया। तब राजा भगत उन्हें इस परिचय से पहचान लेते हैं। फिर वे अपना परिचय देते हैं और बताते है कि वे अहीर हैं। राजा भगत तुलसीदास जी से एक दिन छोटे हैं इसलिए उन्हें भइय्या कहते हैं। बकरीदी दर्जी हैं और वे तुलसीदास जी से चार दिन बड़े हैं। इसलिए तुलसीदास जी बकरीदी को भइय्या कहते हैं। जब बकरीदी मिलने आते हैं तो तुलसीदास जी उनके सम्मान में खड़े हो जाते। इस प्रसंग को आप क्या कहेंगे ? क्या सामुदायिक एकता की इससे बड़ी कोई मिसाल होगी ?

हुसैनी जुलाहा और तुलसीदास जी के पिता का संवाद

हुसैनी जुलाहा और तुलसीदास जी के पिता का संवाद

नागर जी के उपान्यास मे एक और उल्लेखनीय प्रसंग है। तुलसीदास जी का जन्म होने ही वाला है कि आत्माराम जी के दरवाजे पर हुसैनी जुलाहा पहुंच जाता है। हुसैनी जुलाहा और तुलसीदास जी के पिता के बीच बहुत आत्मीय बातचीत होती है। उसी समय मुगल सेना ने इलाके के राजा पर आक्रमण कर दिया है। तब हुसैनी जुलाहा और आत्माराम जी गांव की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो जाते हैं। आत्माराम जी इलाके नामी ज्योतिषी हैं। हुसैनी भी अपने नवजात बच्चे का भाग्य जानने के लिए आत्माराम जी के पास आया है। इस प्रसंग के जरिये नागर जी ने अकबरकालीन भारत के सामाजिक तानाबाना को बुना है।

संघर्ष में तप कर निखरे तुलसीदास जी

संघर्ष में तप कर निखरे तुलसीदास जी

एक प्रसंग में तुलसीदास जी अपने गांव वालों को बताते हैं, बचपन में पार्वती अम्मा हमें भजन याद कराती थीं। उस समय सूरदास, कबीरदास और मीराबाई के भजन बहुत प्रचलित थे। जल्द ही मुझे सभी भजन याद हो गये। मैं और पार्वती अम्मा भजन गा कर भिक्षा मांगते थे। पार्वती अम्मा लोगों की सहानुभूति जगाने के लिए मेरे ब्राह्मण और अभागा होने का जिक्र करती थीं। इसके बाद भी कई बार हमें दुत्कार कर भगा दिया जाता था। कभी-कभी तो गाली भी पड़ती थी। यह सब सुन कर मेरे आत्मसम्मान को बहुत ठेस लगती थी। बड़ा कठिन जीवन था उस समय। तब पार्वती अम्मा कहती थीं, बेटा यह यह दुख नहीं तपस्या है। उन्होंने ही मुझे पढ़ाया था कि जब-जब दुख और परेशानी घेरे तब-तब बजरंगबली को याद करो।

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    अकबर भी प्रभावित हुआ था संत तुलसीदास से

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    साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित और संस्कृत के पूर्व प्रोफेसर डॉक्टर राधावल्लभ त्रिपाठी का कहना है कि गोस्वामी तुलसीदास के दो जीवनीकारों ने लिखा है कि उनकी अकबर से मुलाकात हुई थी। लेकिन इन लेखकों ने अकबर का नाम नहीं बल्कि दिल्ली का बादशाह लिखा है। हालांकि किसी अन्य इतिहासकार ने इसके बारे में कुछ नहीं लिखा है। तुलसी साहित्य पर शोध करने वाले उदय शंकर दुबे का कहना है कि एक पेंटिंग से संकेत मिलता है कि अकबर और संत तुलसीदास की काशी में गंगा के तट पर मुलाकात हुई थी। इस पेंटिंग में दिखाया गया है कि गंगा नदी में एक सजी-धजी बड़ी नाव में सम्राट अपने सहयोगियों के साथ बैठे हुए हैं जब कि दूसरी तरफ एक अन्य नाव में तुलसीदास जी अपने तीन सहयोगियों के साथ बैठे हुए हैं। उदय शंकर जी के मुताबिक तुलसी दास जी की एक तरफ टोडरमल बैठे हुए हैं जब की दूसरी तरफ उनके शिष्य मेघा भगत बैठे हुए हैं। मान्यता है कि इस मुलाकात के बाद अकबर तुलसीदास जी से इतना प्रभावित हुआ था कि उसने सीता-राम का सिक्का जारी कर दिया था। इस मुद्रा की एक निशानी बीएचयू के भारत कला भवन में आज भी सुरक्षित है। जिस तुलसीदास जी का जीवन इतना समन्वयकारी था उनकी विश्वविख्यात रचना पर सवाल उठाना विडम्बना ही तो है।

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