Archeological Excavations : प्राचीनतम इतिहास के प्रमाण प्राप्त करने की पहल
वर्तमान बजट में अप्रत्याशित रूप से पुरात्व के महत्व वाले स्थलों के उत्खनन को बजटीय सहायता दी गयी है। इस बजटीय सहायता से पुरातत्व के महत्व वाले 47 स्थानों पर उत्खनन का कार्य किया जाएगा।

Archeological Excavations: पुरातत्विक उत्खनन से स्वर्णिम इतिहास के तथ्यों को टटोला जा रहा है। तथ्यों से यह तय हो रहा है कि हम आदि संस्कृति के वाहक हैं। कई भ्रांतियां मिट रही हैं। नई अवधारणाएं बन रही हैं। हरियाणा में हिसार के पास राखीगढ़ी में पुरात्विक उत्खनन हुआ। सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुराने अवशेष मिले। कई कंकाल पाए गए। उनमें से एक कंकाल का डीएनए लिया गया।
उसके बाद जम्मू कश्मीर से तमिलनाडु तक करीब 25 सौ अलग-अलग लोगों के डीएनए सैंपल लिए गए। उनका मिलान करवाया गया। आर्य अनार्य की अवधारणा ध्वस्त हो गई। रिपोर्ट के आधार पर यह माना गया कि आर्य कहीं बाहर से ना आकर यहीं के थे। उनकी रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि ये करीब साढ़े चार हजार वर्ष पुराने हैं और मोहन जोदड़ो उत्खनन क्षेत्र का ही विस्तार है।
इनके अलावा भी पुरातत्विक स्थलों के उत्खनन के निष्कर्षों से इतिहास के रोचक तथ्य सामने आ रहे हैं। तुर्की के विनाशकारी भूकंप से दो सौ दिन पहले पूर्वी तुर्की के वैन जिले में प्राचीन किले के उत्खनन के दौरान दूसरे मंदिर के अवशेष मिले। इससे पहले वहां की एक मस्जिद के उत्खनन के नीचे मंदिर के अवशेष मिले। यह ईसापूर्व आठवीं सदी का है। जिसे राजा मीनुआ ने बनाया था। मंदिर के पास काफी संख्या में प्राचीन समय के बर्तन और मक़बरा भी मिला। यह मध्य युगीन इतिहास की अवधारणा को पलट सकता है।
तुर्क अथवा विदेशों में बदल रही अवधारणाओं पर गौर करने के बजाय हम अपनी अर्थात् भारतीय उपमहाद्वीप की बात करें तो पुरातत्विक उत्खननों से हमारी सनातन पहचान बुलंद हो रही है। कई अचंभित करने वाले तथ्य मिल रहे हैं जो धरा के इस हिस्से के अतीत पर नए सिरे से प्रकाश डाल रहे हैं। पुरातत्विक उत्खननों के नतीजे से नदी घाटी सभ्यता वाले भारतीय भूभाग के बारे में कहा जाता है कि यहां के खास देशांतर और अक्षांश वाले कई स्थानों पर शून्य व अन्य गणितीय अंक तथा विज्ञान व भूगोल का संधान करने वाली आबादी रही है।
हम आठ सौ साल से ज्यादा समय तक गुलाम रहे। हमारे अतीत की प्रसिद्धि से विश्व अनजान रहा। अंग्रेजों के शासन काल 1920 में रेल लाइन के विस्तार के क्रम में हड़प्पा कालीन सिंधु घाटी सभ्यता के सबूत मिले। एएसआई के हाथ अचंभित करने वाले तथ्यों ने गुलामी की हीन भावना से बाहर निकलने में हमारी मदद की। लेकिन मोहन जोदड़ो की खुदाई के नतीजे जब तक हम पर पूरी तरह असर करते तब तक 'फूट डालो और शासन करो' के अंग्रेजों की नीति के हम बुरी तरह से शिकार हो चुके थे। हम राष्ट्र विभाजन की विभीषिका के दौर में प्रवेश कर चुके थे। हालांकि उसके बाद से हमारे गौरव का भान बढ़ता रहा है। इसमें पुरातत्विक उत्खनन से मिल रहे तथ्यों ने अहम भूमिका निभाई है। एएसआई दुनिया को यह बताने में काफ़ी हद तक सफल रहा है कि खास देशांतर और अक्षांस पर मौजूद भारतीय भूखंड के नीचे आदिकालीन सभ्यताओं के अंबार दबे पड़े हैं।
एएसआई की कोशिशों पर रंग चढ़ते हुए केंद्र सरकार ने मौजूदा वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) को 47 महत्वपूर्ण स्थलों के उत्खनन अथवा सर्वेक्षण का काम दिया है। इनमें से 31 पुरातत्विक स्थानों पर एएसआई पहले से जारी काम को गति देने जा रही है, जबकि 16 स्थलों पर दूसरी एजेंसियों को काम पर लगाया जा रहा है।
एएसआई जिन 31 स्थलों पर उत्खनन और अध्ययन को गति देने जा रही है उनमें हरियाणा के हिसार का राखीगढ़ी शामिल है। इसके अलावा पलवल के केसरुआ खेड़ा गांव के टीलों की खुदाई होनी है। यह साईट करीब दो हजार वर्ष पुरानी है। इसके अलावा मुगलों से पहले शेरशाह सूरी के काल में बने दिल्ली के पुराना किला में खुदाई का काम तेज होना है। यहां स्थानीय आबादी की अगाध श्रद्धा से जुड़ा पांडव कालीन भैरव मंदिर है। उसके आसपास आदिकालीन सभ्यता के मौजूदगी के व्यापक प्रमाण मिले हैं।
सिंधु घाटी से जुड़े इलाकों के अलावा एएसआई को कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से सुदूर पूर्वोत्तर प्रदेशों में पुरातत्विक स्थलों पर उत्खनन और सर्वे के काम में गति लाने का निर्देश है। मिसाल के तौर पर ईसाई बहुल मिजोरम के साइहा जिला है। वहां से म्यांमार तक उन इलाकों का खुदाई का काम तेज होगा जहां हिंदू देवी देवताओं के निशान मिले हैं। पुराना गोवा का चर्च, असम का गोरक्षना टीला, मध्य प्रदेश का बांधवगढ़ राष्ट्रीय पार्क, बटेश्वर मंदिर समूह और ग्वालियर के मानसिंह किला में पुरातत्विक खुदाई को तेज किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश के बड़ौत के तिलवाड़ा साकिन की खुदाई को आगे बढ़ाया जाएगा। उप्र के महाराजगंज के धमरौली में कन्हैया बाबा के स्थान का उत्खनन होगा। झारखंड में सिमडेगा और चतरा के ओबरा में एएसआई साइट पर काम तेज होगा। बिहार में कैमूर का निदौर, जम्मू व कश्मीर में जबरवान हिल्स, तमिलनाडु के कांचीपुरम के वेदकुपपुट्टू और कलवाई का किला, केरल के पलक्कड का मालापुज्जा, महाराष्ट्र के पालघर में वसई का बारूद कोट में काम को गति मिलेगी।
महाराष्ट्र के ही वैतरणी नदी घाटी का अध्ययन और औरंगाबाद में बीवी का मक़बरा व वर्धा में खैरवाल बरियल्स में उत्खनन व संरक्षण कार्य को बढ़ावा मिलेगा। राजस्थान के भीलवाड़ा में औझियाना और पतन का बनेरा गांव, ओडिशा के खुर्द नरहुदा और जयपुर का पराबादी, बंगाल के पूर्व बर्धमान का भरतपुर और उतरी दीनापुर और कर्नाटक के विजय नगर का पान सुपारी बाजार के पुरातत्विक उत्खनन से इतिहासवेत्ताओं को नई दृष्टि मिल सकती है।
गुलामी काल में लिखी किताबों को लेकर आरोप है कि उनमें इतिहास के साथ न्याय नहीं हुआ। आम भारतीयों को हीनता बोध से ग्रसित करने वाले कई तथ्य समाहित रहे। उन्हें तथ्यात्मक तरीके से सुधारा जा रहा है। पुरातात्विक उत्खननों के आसरे श्रेष्ठता बोध की बातों को फिर से उकेरा जा रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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