Article 356: क्या है अनुच्छेद 356, जिसका इस्तेमाल आजादी के बाद अभी तक 111 बार हो चुका है?
राज्यसभा में अपने 90 मिनट के भाषण में पीएम मोदी ने पूर्व की केंद्र सरकारों द्वारा अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करके राज्यों में राष्ट्रपति शासन थोपने का आरोप लगाया था।

Article 356: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राज्यसभा में अपने 90 मिनट के भाषण में 'सहकारी संघवाद' के मुद्दे पर बोलते हुए कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकारों ने कई क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधित्व वाली राज्य सरकारों को गिराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 356 का कम से कम 90 बार इस्तेमाल किया था। साथ ही पीएम मोदी ने आरोप लगाते हुए कहा कि इंदिरा गांधी ने अकेले अनुच्छेद 356 का उपयोग क्षेत्रीय दलों की सरकारों को गिराने के लिए 50 बार किया था। इस मुद्दे पर देश की राजनीति गरमा गई है।
क्या है अनुच्छेद 356?
भारत के संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति को राज्य के राज्यपाल से रिपोर्ट मिलने पर अगर वो संतुष्ट हैं कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि राज्य सरकार, राज्य के संविधान के प्रावधानों के अनुसार काम नहीं कर सकती है, तब राष्ट्रपति को अनुच्छेद 356 (1) के तहत राष्ट्रपति शासन के लिए उद्घोषणा करने का अधिकार है। इसके तहत राष्ट्रपति उस राज्य सरकार की सभी शक्तियां राज्यपाल के माध्यम से अपने अधीन प्रयोग में कर सकते हैं।
111 बार लगाया गया राष्ट्रपति शासन
26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू होने के बाद से साल 2016 तक 26 राज्यों में तकरीबन 111 बार राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। इसमें पंजाब ऐसा पहला राज्य था, जहां संविधान लागू होने के दो सालों के भीतर ही राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। जबकि केरल, पंजाब और उत्तर प्रदेश में अब तक 10 बार राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है। इसके अलावा, मणिपुर, बिहार में यह क्रमश: 8-8 बार लागू हुआ है।
राष्ट्रपति शासन की सबसे लंबी अवधि जम्मू-कश्मीर में 6 साल 2 महीने 20 दिन (18 जुलाई 1990 से 09 अक्टूबर 1996) है। इसके बाद पंजाब है जहां इसकी अवधि 4 साल, 9 महीने और 15 दिन (11 मई 1987 से 25 फरवरी 1992) रही। वहीं सबसे कम अवधि तक का राष्ट्रपति शासन कर्नाटक और बिहार में केवल 8 दिन (10 अक्टूबर 1990 से 17 अक्टूबर 1990) और (28 मार्च 1995 से 04 अप्रैल 1995) तक रहा। इसके अलावा ओडिशा में केवल 14 दिन (16 दिसंबर 1976 से 29 दिसंबर 1976) रहा।
मोदी सरकार ने भी 10 बार लगाया राष्ट्रपति शासन
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के पहले से ही 19 जून 2018 से अब तक राष्ट्रपति शासन लागू है। जबकि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी के शासनकाल (16 मई 1996 से 1 जून 1996 और 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004) में 5 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। जबकि 29 मई 2014 से अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 10 बार राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है।
वैसे राज्यों में अलग-अलग समय पर राष्ट्रपति शासन लागू किये गये, जिसके कई कारण हैं। जैसे विधानमंडलों के सदस्यों द्वारा दल-परिवर्तन, गठबंधन सरकारों का टूटना, मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित होना, मुख्यमंत्रियों द्वारा त्याग पत्र दिया जाना, नवनिर्मित राज्यों में विधानमंडलों का न होना, राज्यों में जन आंदोलन के कारण भी प्रशासन में अस्थिरता आयी।
दल-परिवर्तन से लगा राष्ट्रपति शासन
साल 1967 के आम चुनावों के बाद दल-परिवर्तन को लेकर कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। सबसे पहले ऐसी घटना नवंबर 1954 में आंध्र प्रदेश में देखने को मिली थी। इसके बाद के सालों में बिहार, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, तमिलनाडु और गोवा में भी दल परिवर्तन के चलते ऐसा हो चुका है।
गठबंधन टूटने से लगा राष्ट्रपति शासन
सतारुढ़ गठबंधन की सरकारों के टूटने से भी राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है। इसमें झारखंड (2010, 2013), केरल (1979, 1981 और 1982), महाराष्ट्र (2014), मणिपुर (1992), ओडिशा (1961 और 1971), पंजाब (1968), त्रिपुरा (1979), उत्तरप्रदेश (1970 और 1995), जम्मू और कश्मीर (2008) और कर्नाटक (2007) शामिल हैं।
अविश्वास प्रस्ताव व सीएम का इस्तीफा भी बना कारण
आंध्र प्रदेश और केरल के राज्य विधानमंडलों में मंत्रिपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किये जाने के कारण साल 1954 और 1964 में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा क्योंकि अन्य दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थे। इसी तरह गुजरात में 1976 में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया क्योंकि अनुदानों की मांगों पर राज्य विधानसभा में मतदान में हारने के कारण मुख्यमंत्री ने त्यागपत्र दे दिया था। आंध्र प्रदेश (2014), दिल्ली (2014), केरल (1970 और 1979), पंजाब (1951), सिक्किम (1979), उत्तर प्रदेश (1968 और 1975) और पश्चिम बंगाल (1970) में मुख्यमंत्रियों ने विभिन्न कारणों से स्वयं ही अपने से त्यागपत्र दे दिये, जिसकी वजह से राज्यपालों को सिफारिश करनी पड़ी कि इन राज्यों का शासन राष्ट्रपति द्वारा अपने हाथ में ले लिया जाये।
'जन-आंदोलन' ने निकाली हवा
साल 1973 में आंध्र प्रदेश में, असम (1979), गुजरात (1974), केरल (1959), पंजाब में (1983 और 1987) में राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने के अन्य कारणों में एक कारण जन-आंदोलन भी था।
वहीं नये राज्यों के गठन केरल 1956, पंजाब में 1966, मणिपुर और त्रिपुरा में 1972 में गठन के समय ऐसी स्थिति बन गयी कि केंद्र को प्रशासन अपने हाथों में लेना पड़ा। जब तक कि वहां नई विधानसभा विधिवत निर्वाचित नहीं हो गई।
इन कारणों से भी लगा राष्ट्रपति शासन
जब साल 1965 में केरल, 1971 में ओडिशा, 1967 में राजस्थान, 1996 व 2002 में उत्तर प्रदेश और 2005 में बिहार में चुनाव होने के बाद नयी विधानसभाओं का गठन हो जाने पर किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाने की वजह से भी अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था।
वहीं 19 जनवरी 2009 को झारखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया गया क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 164 (4) के तहत विधायक दल का जो नेता चुना जाता है, उसे छह महीने के अंदर राज्य के विधानसभा की सदस्यता प्राप्त करनी होती है लेकिन तब के मुख्यमंत्री ही विधानसभा का चुनाव हार गये और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।
जब नौ राज्यों में लगा राष्ट्रपति शासन
बात 30 अप्रैल 1977 की है जब नौ राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक (21 महीने) की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। इसके बाद लोकसभा के मार्च 1977 के चुनावों में 'अभूतपूर्व राजनैतिक स्थिति' सामने आयी। नौ राज्यों - बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मतदाताओं ने इन राज्यों में और केंद्र में मौजूद (कांग्रेस सरकार) सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों को पूरी तरह से नकार दिया था। तब नवगठित केंद्र सरकार ने राज्यपालों को विधानसभाएं भंग करने और नये चुनाव कराने की सलाह देने का सुझाव दिया। तब राज्यों ने केंद्र के सुझाव को नहीं माना और अनुच्छेद 356 के अधीन की गई कार्यवाही को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में 29 अप्रैल 1977 को राज्यों द्वारा दायर आवेदन को खारिज कर दिया था।
राष्ट्रपति शासन के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया
साल 1988 में सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति शासन लगाने जाने के मामले पर सुनवाई करनी पड़ी। दरअसल नागालैंड में केंद्र सरकार ने 7 अगस्त 1988 को राज्य सरकार को दो कारणों (सत्ता नेताओं का पार्टी छोड़ना और राज्य में बढ़ती अशांति) से बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया। तब यह मामला गुवाहाटी हाईकोर्ट और फिर बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
इसके बाद कर्नाटक में 21 अप्रैल 1989 को इस आधार पर राष्ट्रति शासन लागू किया गया था कि 16 अप्रैल 1989 को सत्तारूढ़ जनता दल के 20 सदस्यों द्वारा दल परिवर्तन किये जाने के कारण मुख्यमंत्री एस. आर. बोम्मई का विधानसभा में बहुमत नहीं रहा था। बोम्मई ने अपनी सरकार की बर्खास्तगी के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि धारा 356 इस कोर्ट के विचार योग्य नहीं है। तब बोम्मई ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। पांच साल तक यह केस चला और मार्च 1994 में, SC की नौ-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय दिया, जो अनुच्छेद 356 और केंद्र सरकार द्वारा इसके मनमाने उपयोग के संबंध में एक प्रमुख निर्णय बन गया।
इसी तरह 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे के गिराये जाने के बाद उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। वहीं केंद्र सरकार ने 15 दिसंबर 1992 को मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश (जहां बीजेपी सत्ता में थी) की सरकारों को बर्खास्त कर दिया और इन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। तब इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी थी। जहां मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने संबंधी आदेश को 2 अप्रैल 1993 को रद्द कर दिया। तभी 16 अप्रैल 1993 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को 15 दिसंबर 1992 के राष्ट्रपति के आदेशों को रद्द करने संबंदी निर्णय के खिलाफ स्थगन आदेश दे दिया था। इसके बाद भी मामला शांत नहीं हुआ और न्यायाधीश रत्नावल पांडियन की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की एक संविधान पीठ ने मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा की वैधता को 11 मार्च 1994 को छह अलग-अलग फैसलों को सही ठहराया।
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