Anti-defection Law: दल बदल के दलदल में धंस रही भारत की राजनीति
Anti-defection Law: हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के कुछ विधायकों के जरिए उसे जो चोट दी थी उसकी टीस गहराती जा रही है। तब कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत होते हुए भी उसके उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी को भाजपा के प्रत्याशी हर्ष महाजन से हार का सामना करना पड़ा था।
अब कांग्रेस के उन छह बागी विधायकों ने पार्टी को अलविदा कह भाजपा का दामन थाम लिया है। वहीं राज्यसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने वाले राज्य के तीन निर्दलीय विधायकों ने भी भाजपा में शामिल होकर अपनी नयी निष्ठा व्यक्त कर दी है। इन छह कांग्रेस पार्टी से जीते विधायकों और तीन निर्दलियों ने विधानसभा से त्यागपत्र देकर उनकी नौ सीटों पर उपचुनाव करवाने की आवश्यकता पैदा कर दी है।

एक बात पानी की तरह साफ है कि हाल के दशक में कांग्रेस के छोटे और कद्दावर नेताओं के भाजपा में भागे चले आने का एक नया ट्रेंड स्थापित हुआ है। बहुत हद तक कांग्रेस पार्टी अब एक खाली हो रहा घर बन चुकी है। ऐसा 10 साल तक सत्ता से दूर रहने के कारण हुआ है। हालिया दल-बदल से हिमाचल प्रदेश की सुक्खु सरकार की न सिर्फ मुश्किलें बढ़ गई है बल्कि जिस आक्रामक ढंग से बीजेपी ऐसे मामलों को हैंडल करती रही है उसे देखकर तो यही लगता है कि प्रदेश सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।
हिमाचल प्रदेश में नौ विधायकों के त्यागपत्र के बाद 68 सदस्यीय सदन में विधायकों की संख्या अब 59 रह गई है। यानी कि बहुमत का आंकड़ा 35 से घटकर 29 पर आ चुका है। कांग्रेस का संख्या बल 39 से गिरकर फिलहाल 33 रह गया है। बीजेपी के पास 25 विधायक हैं। जिन नौ सीटों पर उपचुनाव होने हैं, अगर वहां बीजेपी सभी सीटों पर बाजी मार लेती है तो उसकी संख्या बढ़कर 34 हो जाएगी। अगर कांग्रेस एक और सीट जीतती है तो गेंद स्पीकर के पाले में होगी।
राजनीतिक मान्यता है कि प्रतिबद्ध और समर्पित विचारधारा के आधार पर दल-बदल लोकतंत्र को मजबूत और विकसित करते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हाल के दिनों में दल-बदल के जरिए जिस तरह से भ्रष्टाचार के वाजिब मामलों को रफा दफा किया जा रहा है, उससे उत्पन्न स्थितियां सजग लोगों को परेशान करने लगी हैं।
देश में दल-बदल कोई नई परिघटना नहीं है, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता और अनिश्चितता की स्थिति में हमेशा से रही है। किंतु आजकल स्वार्थ और पद के लालच में जो दल-बदल हो रहे हैं उससे सरकारों की स्थिरता के लिए खतरा पैदा हो गया है। यह न केवल उन राजनीतिक दलों के साथ विश्वासघात है जिसके टिकट पर कोई प्रत्याशी चुनाव लड़ता है, जीतता है, बल्कि उन लोगों की इच्छा के साथ भी अन्याय है जिन्होंने उन्हें चुना है। कौन, कब, किस करवट मुड़ जाएगा, इसका कोई भरोसा नहीं रह गया है।
चुनाव आते ही दल-बदल के मामलों की भरमार होने लगती है। मौसम विज्ञानियों की तरह राजनीतिक मौसम को आंकने वाले नेता लहर के साथ खुद को जोड़ लेते हैं। दल-बदल यूं तो देश के पहले आम चुनाव से ही हो रहा है, लेकिन चौथे आम चुनाव के बाद मार्च 1967 से फरवरी 1968 के बीच की छोटी अवधि में ही लगभग 438 सदस्यों ने दल बदल का रिकॉर्ड कायम किया।
दिलचस्प तो यह है कि हरियाणा विधानसभा के एक निर्दलीय सदस्य ने एक ही दिन में पांच बार दल-बदल कर 'आया राम-गया राम' की कहावत को चरितार्थ किया था। तब लोकसभा के सचिव पी बैंकट सुब्बैया द्वारा अगस्त 1967 में संसद में एक संकल्प प्रस्तुत किया गया था, जिसका संज्ञान लेते हुए सरकार ने तत्कालीन गृह मंत्री वाई.बी. चौव्हाण की अध्यक्षता में दल-बदल संबंधी एक समिति का गठन किया था, जिसने 18 फरवरी 1969 को अपनी संस्तुति दी थी, लेकिन उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
राजीव गांधी की सरकार ने 1985 में 52 वें संविधान संशोधन द्वारा पारित दल बदल विरोधी कानून को संविधान की दसवीं अनुसूची में समाहित किया। हालांकि इस कानून को पारित कराने को लेकर राजीव गांधी की नीयत पर भी सवाल उठे थे। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति के कारण राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को 400 से अधिक लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। इसलिए राजीव गांधी सरकार द्वारा दलबदल विरोधी कानून लाने को कई लोगों ने उनके सांसदों को अनुशासन में बांधकर रखने के लिए उठाया गया कदम माना था।
दलबदल कानून का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ के लिए नेताओं द्वारा पार्टी बदले जाने की प्रक्रिया को रोकना था। शुरू में इस कानून में प्रावधान था कि एक तिहाई विधायक या सांसद दल बदलते हैं तो उनका कदम दल बदल नहीं बल्कि दल विभाजन माना जाएगा। आगे चलकर यह संख्या 50% और फिर दो तिहाई कर दी गई। लेकिन इससे बचने के लिए कई गलियां निकाल ली गई। इसमें दल बदल के आधार पर अयोग्यता का उपबंध भी किया गया, लेकिन यह कानून दल का दल में विलय नहीं रोकता है।
इस कानून में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो सांसद या विधायक को अयोग्यता का सामना किये बिना ही पार्टी बदलने की छूट देते हैं। यह कानून किसी राजनीतिक दल को अन्य दल के साथ विलय की अनुमति देता है, यदि उसके कम से कम दो तिहाई सदस्य विलय के लिए सहमत हों।
महत्वपूर्ण तथ्य है कि इस कानून को लागू करने का दायित्व सदन के अध्यक्ष का होता है। चूंकि विधानसभा या लोकसभा अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल के ही सदस्य होते हैं, इसलिए वह विधायकों और सांसदों के जोड़-तोड़ से बनी सरकार को बचाने के लिए अक्सर इस कानून का मनमाने तरीके से प्रयोग करते हैं। कई बार तो वे फैसला लेने में इतनी देर कर देते हैं कि उसका महत्व ही नहीं रह जाता।
इसे हम महाराष्ट्र के ताजा उदाहरण से समझ सकते हैं जहां शिवसेना के एकनाथ शिंदे ने अपनी ही पार्टी के दो तिहाई विधायकों (55 में से 40) के साथ पार्टी छोड़ दी और भाजपा के साथ गठबंधन कर मुख्यमंत्री बन गए। इससे पहले 2016 में अरुणाचल प्रदेश की पीपल्स पार्टी के 43 विधायकों में से 33 भाजपा में शामिल होकर और 2020 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के 22 विधायकों ने भाजपा का साथ पकड़कर नई सरकार का गठन कर लिया।
आए दिन की उठा-पटक को देखते हुए लगता है कि भारत में दल बदल को नियंत्रित करने वाला मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं है। स्वैच्छिक सदस्यता छोड़ने के लिए एक स्पष्ट परिभाषा की जरूरत है। हालांकि दल-बदल लोकतंत्र में असहमति का प्रतीक है, लेकिन पैसे और सत्ता के लालच में किया गया ऐसा कोई भी कार्य लोकतंत्र के सिद्धांत को नकारता है। संविधान के दसवीं अनुसूची के प्रावधानों में बड़े पैमाने पर बदलाव के लिए राजनीतिक दलों को बड़े दिल के साथ आगे आना होगा और जन आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए इस पर निर्णय लेना होगा ताकि सरकार को राष्ट्र के विकास और कल्याण हेतु स्थिर कार्यकाल मिल सके।
वैसे भी किसी एक विचारधारा के नाम पर मतदाताओं का वोट लेना और दूसरी विचारधारा वाले दल के सामने उसे गिरवी रख देना मतदाताओं के साथ धोखा है। उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के विधायक दारा सिंह चौहान का उदाहरण ताजा है। वह अपनी विधायकी और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देकर भाजपा में शामिल हुए और तुरंत बाद घोसी उपचुनाव में जनता का समर्थन हासिल करने के लिए मैदान में उतरे। वहां के मतदाताओं ने उनकी अपील ठुकरा दी।
बहरहाल राजनीति में बड़े पैमाने पर नैतिक मूल्यों की बहाली की कल्पना तो अभी दूर की कौड़ी है, लेकिन एक कानून तो बनना ही चाहिए कि अगर कोई विधायक अथवा सांसद अपनी पार्टी से इस्तीफा देता है तो वह अनिवार्य रूप से विधानसभा या लोकसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे, और उसके फिर से चुनाव लड़ने पर एक निश्चित समय तक रोक रहे। दल-बदल के दलदल में धंस रही राजनीति को सुधारने के लिए इस तरह के प्रभावी प्रावधान रामबाण साबित हो सकते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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