Andhra Pradesh: चंद्रबाबू नायडू की गिरफ्तारी से सांसत में बीजेपी

Andhra Pradesh: प्रतिष्ठा की लड़ाई बने दिल्ली सेवा विधेयक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रणनीतिक कौशल ही रहा कि आंध्र प्रदेश की राजनीति में दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े तेलुगू देशम और वाईएसआर कांग्रेस को ना सिर्फ संसद में साथ ला खड़ा किया, बल्कि विधेयक के लिए दोनों का समर्थन जुटा लिया। चूंकि आम चुनाव नजदीक हैं, लिहाजा माना यह जा रहा था कि आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी इन दोनों दलों के साथ मिलकर बीच की ऐसी राह निकाल लेगी, जिससे आंध्र प्रदेश की सभी 25 सीटों को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के खाते में लाया जा सके।

लेकिन जिस तरह कौशल विकास घोटाले में वाईएसआर कांग्रेस की राज्य सरकार ने चंद्रबाबू नायडू को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया है, उससे सबसे ज्यादा परेशान भारतीय जनता पार्टी लग रही है। दोनों दलों को साधना और सहयोग के बिंदु पर पहुंचा पाना अब बीजेपी के लिए टेढ़ी खीर साबित होता नजर आ रहा है।

Andhra Pradesh: BJP in trouble due to arrest of Chandrababu Naidu

पिछले दो आम चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी लगातार बड़ी जीत हासिल कर चुकी है। लोकसभा में अपनी दमदार उपस्थिति के चलते वह अखिल भारतीय पार्टी होने का दावा कर सकती है, लेकिन यह कटु सत्य है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए कर्नाटक के इतर दक्षिण भारत के प्रदेश अभी भी मुश्किल बने हुए हैं। पिछले दो चुनावों में थोड़ी सी उपस्थिति तेलंगाना में भी बन चुकी है। लेकिन आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल अब भी भारतीय जनता पार्टी के लिए दूर की कौड़ी बने हुए हैं।

ऐसा नहीं कि यहां भारतीय जनता पार्टी ने मेहनत नहीं की है, उसके मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम इन राज्यों में भी चल रहे हैं। फिर भी भारतीय जनता पार्टी इन राज्यों से अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा पाई है। चूंकि 2024 के आम चुनाव नजदीक हैं, लिहाजा भाजपा चाहती है कि वह दक्षिण के राज्यों में भी अपनी पहुंच और पकड़ बनाए। अगर वह खुद नहीं बना सकती तो वह अपने सहयोगियों का कुनबा बढ़ाकर ऐसा करे।

आंध्र प्रदेश की दोनों बड़ी राजनीतिक ताकतें, मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी और विपक्षी चंद्रबाबू नायडू को साथ लाने की कवायद भाजपा की उसी चाहत का नतीजा थी। स्थानीय राजनीति में चूंकि दोनों एक-दूसरे के विरोधी दल हैं, इसलिए दोनों ही राजनीतिक दलों के लिए साथ आना संभव नहीं है। ऐसा होने से दोनों के स्थानीय स्तर पर अस्तित्व का सवाल उठ खड़ा होगा।

आंध्र प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव हों या लोकसभा चुनाव, भाजपा की यहां ऐसी उपस्थिति भी नहीं दिखी, जिसका उल्लेख किया जा सके। लेकिन 2019 के आम चुनाव में जगनमोहन रेड्डी की पार्टी को पचास फीसदी से कुछ ही कम यानी 49.89 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे, जबकि टीडीपी ने चालीस फीसदी से कुछ ही ज्यादा यानी 40.19 फीसद वोट हासिल किए थे। दोनों को प्राप्त मतों में साढ़े आठ फीसदी से ज्यादा अंतर था। इसका असर सीटों की संख्या पर भी दिखा। राज्य की 25 लोकसभा सीटों में से जगनमोहन रेड्डी की पार्टी को 22 सीटों के साथ बंपर जीत मिली, जबकि टीडीपी को महज तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा।

लोकसभा के साथ ही यहां के विधानसभा चुनाव हुए थे। उसमें तो राज्य की जनता ने लोकसभा की तुलना में जगनमोहन रेड्डी को किंचित ज्यादा मत दिया, जिस कारण उसे 151 सीटों के साथ बहुत धमाकेदार जीत मिली। जबकि चंद्रबाबू नायडू को लोकसभा में प्राप्त चालीस फीसदी से भी कम वोट मिला और उन्हें सिर्फ 23 सीटों से ही संतोष करना पड़ा।

आंध्र प्रदेश में अभी जिस तरह का माहौल है, उससे नहीं लगता कि यहां की राजनीतिक स्थिति में बहुत कुछ बदलने जा रहा है। हां, अपना खोया हुआ जनाधार हासिल करने के लिए चंद्रबाबू नायडू जोर लगा रहे हैं। यहां यह भी याद कर लेना चाहिए कि कभी चंद्रबाबू नायडू की संयुक्त आंध्र प्रदेश यानी तेलंगाना समेत वाले राज्य में तूती बोलती थी। अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के दौरान जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए था, उसकी प्रमुख हस्ती नायडू भी थे। बाहर से समर्थन देने के बावजूद वाजपेयी सरकार से वे अपने राज्य के लिए हर प्रमुख मांग आसानी से मनवा लेते थे।

एक दौर में चंद्रबाबू नायडू की आंध्र में राजनीतिक हैसियत ऐसी थी कि कोई भी नहीं सोच पाता था कि आंध्र प्रदेश से उनकी सत्ता जा सकती है। उनकी हालत कुछ कुछ आज के उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जैसी थी। लेकिन जगनमोहन रेड्डी के पिता राजशेखर रेड्डी ने बतौर आंध्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज्यव्यापी पदयात्राएं निकालीं और 2004 के विधानसभा चुनावों में चंद्रबाबू नायडू से आंध्र प्रदेश छीन लिया। उसका असर लोकसभा के नतीजों पर भी दिखा और कांग्रेस व्यापक बढ़त हासिल करने में आगे रही। लेकिन बाद में वही कांग्रेस आंध्र से बाहर हो गई। तेलंगाना पर चंद्रशेखर राव का कब्जा है तो आंध्र पर कांग्रेस से अलग हो चुके राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी का।

ऐसे माहौल में भाजपा अगले आम चुनाव में अपनी किलेबंदी को चाकचौबंद करने की कोशिश में जुटी हुई है। इसीलिए वह आंध्र प्रदेश के दोनों दलों को साध रही है। लेकिन कौशल विकास घोटाले में चंद्रबाबू नायडू की गिरफ्तारी के बाद जगनमोहन रेड्डी ने बीजेपी के विकल्प सीमित कर दिए हैं। अब उसके सामने चुनौती है कि वह या तो चंद्रबाबू नायडू का साथ ले या फिर जगनमोहन रेड्डी के संग राजनीति का रथ आगे बढ़ाए। क्योंकि चंद्रबाबू की गिरफ्तारी के बाद एक तरह से दोनों दलों की दुश्मनी एक बार फिर सतह पर आ गई है, जो कुछ महीनों से नेपथ्य में जाती दिख रही थी। शायद इसके पीछे बीजेपी का भी योगदान था।

वैसे चंद्रबाबू की गिरफ्तारी के विरोध में स्थानीय स्तर पर जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उसमें तेलुगू देशम का साथ स्थानीय भाजपा भी दे रही है। आंध्र प्रदेश में बीजेपी की मजबूरी है कि वह एनडीए के पुराने साथी के साथ खड़ी नजर आये तो वहीं सत्ताधारी जगनमोहन के विरोध में भी दिखे। जबकि गठबंधन राजनीति में चंद्रबाबू और जगनमोहन दोनों ही अपने अपने कारणों से धुर कांग्रेस विरोधी हैं। दोनों ही चाहेंगे कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई एलायंस हो तो वो बीजेपी के साथ ही रहे।

चंद्रबाबू नायडू के पास दिल्ली में तीसरे मोर्चे का विकल्प रहता था लेकिन जब से केन्द्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की संभावना खत्म हुई है वो अब कोई नया विकल्प नहीं तलाश सकते। कुछ ऐसा ही हाल जगनमोहन का है जो कांग्रेस द्वारा दी गयी निजी पीड़ा को आज तक नहीं भूले हैं। उनके लिए भी सुविधाजनक यही रहेगा कि वह केन्द्रीय स्तर पर बीजेपी के साथ ही खड़े दिखाई दें।

लेकिन दोनों जैसे ही आंध्र की राजनीति में लौटते हैं एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। इससे उनका अपना राजनीतिक हित भले सधता हो लेकिन बीजेपी के लिए संकट पैदा हो जाता है कि वह किसे सही कहे और किसे गलत। ऐसे में देखना होगा कि बीजेपी आंध्र प्रदेश की राजनीति में दोनों दलों को कैसे साध पाती है। हालांकि यह भाजपा के लिए बहुत कठिन डगर है फिर भी अगर वह ऐसा करने में कामयाब रही तो दक्षिण का दुर्ग भेदने की उसकी राह थोड़ी आसान हो जाएगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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