1980 Moradabad Riots: चालीस साल बाद सामने आयी मुरादाबाद दंगों की सच्चाई
1980 Moradabad Riots: यूपी में योगी आदित्यनाथ सरकार ने आज से 43 साल पहले हुए मुरादाबाद दंगों की रिपोर्ट ऐसे समय में सदन पटल पर रखी है, जब हरियाणा के नूंह में हुआ दंगा चर्चा में है। 40 साल बाद विधानसभा के सदन पटल पर रखी गयी इस रिपोर्ट पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि इस देश में दंगे भी राजनीति का शिकार होते रहे हैं। आज से चालीस साल पहले भी हुआ कुछ और लेकिन बताया कुछ और गया, जैसे आज नूंह दंगों की सच्चाई राजनीतिक सुविधा के अनुसार उलट पलटकर समझाने की कोशिश की जा रही है।
आज से 43 साल पहले हुए मुरादाबाद दंगों की जांच के लिए एमपी सक्सेना के नेतृत्व में एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने 3 साल के भीतर ही अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन यूपी शासन को सौंप दी थी। लेकिन 40 साल तक उस रिपोर्ट को सदन पटल पर नहीं रखा गया। इन 40 सालों में 14 मुख्यमंत्री आये और गये, लेकिन रिपोर्ट विधानसभा का मुंह नहीं देख पायी। तो क्या ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस रिपोर्ट में मुस्लिम लीग के नेता डॉ शमीम अहमद एवं डॉ हामिद हसन के नेतृत्व वाली भीड़ को दोषी ठहराया गया था? या फिर सिर्फ इसलिए क्योंकि राजनीतिक रूप से मुरादाबाद दंगों के लिए दोषी करार दिये गये आरएसएस को क्लीन चिट दे दी गयी थी?

अब चालीस साल बाद जब योगी आदित्यनाथ की सरकार ने न्यायिक आयोग की रिपोर्ट को सदन पटल पर रखकर दंगे के कारणों को सार्वजनिक करने का साहस दिखाया है, तब सवाल उठता है कि आखिर दंगों की राजनीति कौन करता है? योगी आदित्यनाथ से पूर्व 15 मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में 14 बार यह रिपोर्ट कैबिनेट के सामने रखी गई, लेकिन राजनीतिक कारणों, सांप्रदायिक स्थिति एवं चुनावी प्रभाव को देखते हुए इसे कैबिनेट का अनुमोदन नहीं दिया गया। रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की बजाय लंबित रखने का निर्णय लिया गया। एमपी सक्सेना आयोग ने अपनी रिपोर्ट 20 नवंबर 1983 को ही शासन को सौंप दी थी। पहली बार यह रिपोर्ट 13 मार्च 1986 को वीर बहादुर सिंह की कैबिनेट के समक्ष पेश हुई, लेकिन इसे सदन पटल पर रखने की मंजूरी नहीं मिली।
इसके बाद यह रिपोर्ट क्रमश: 9 जून 1987, 22 दिसंबर 1987, 17 सितंबर 1988, 31 जुलाई 1989, 20 अक्टूबर 1990, 24 जुलाई 1992, 11 दिसंबर 1992, 1 फरवरी 1994, 30 मई 1995, 15 फरवरी 2000, 17 फरवरी 2002, 31 मई 2004 और 9 अगस्त 2005 को यानी कुल मिलाकर 14 बार कैबिनेट के सामने पेश की गई, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते इसे सदन पटल पर रखने की मंजूरी नहीं दी गई।
इस बीच संबंधित पत्रावली जांच रिपोर्ट से अलग हो गई। आश्वासन पूर्ति की रिपोर्ट खोजी गई, लेकिन वह पत्रावली पर नहीं मिली। योगी ने रिपोर्ट तलाश के लिये मुरादाबाद डीएम एवं एसएसपी को निर्देश दिया, लेकिन रिपोर्ट पत्रावली पर नहीं मिली। भाषा विभाग एवं पुस्तकालय में भी रिपोर्ट तलाशी गई, लेकिन सफलता नहीं मिली। काफी तलाश के बाद यह रिपोर्ट अनुभाग के रजिस्टर में पायी गई। 12 मई 2023 को इस रिपोर्ट को योगी कैबिनेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से इसे सदन में रखने की मंजूरी मिली।
लेकिन चालीस साल बाद भी इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने पर राजनीति शुरू हो गई है। जिन दलों ने रिपोर्ट को सदन के समक्ष रखने की हिम्मत नहीं दिखाया, वे अब उल्टा आरोप लगा रहे हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, ''चुनाव आ रहे हैं। अब इस तरह की रिपोर्ट आती रहेगी।'' कांग्रेस नेता पीएल पूनिया का कहना है,''चुनाव में फायदा लेने के लिये यह रिपोर्ट पेश की गई है। वोटों के ध्रुवीकरण के लिये सरकार ने यह रिपोर्ट अब पेश की है।'' लेकिन कोई विपक्षी नेता यह नहीं कह पा रहा है कि वोट बैंक की राजनीति को देखते हुए ही योगी के पहले किसी भी मुख्यमंत्री ने मुरादाबाद दंगों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का साहस नहीं दिखाया था।
जांच आयोग की रिपोर्ट में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार तारीख थी 13 अगस्त 1980, दिन बुधवार। पूरे देश में ईद मनाई जा रही थी। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में लगभग 70 हजार लोग ईदगाह और सड़कों पर बैठकर नमाज पढ़ने की तैयारी कर रहे थे। अचानक अफवाह फैली कि बाल्मिकी समाज की तरफ से ईदगाह में सुअर छोड़ दिया गया है, जिससे कई नमाजियों के कपड़े खराब हो गये हैं। अफवाह के बाद मची भगदड़ में कई लोग मारे गये। नाराज मुस्लिमों ने पत्थरबाजी करते हुए तीन थानों में आग लगा दी। तीन पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी। माहौल संभालने आये एडीएम सिटी डीपी सिंह की भी बेरहमी से हत्या कर दी गई। बाल्मिकी समाज के लोगों पर हमले कर कई लोगों को मार डाला गया।
उस समय केंद्र में इंदिरा गांधी तथा प्रदेश में वीपी सिंह की कांग्रेस सरकार थी। इंदिरा गांधी के निर्देश पर मुख्यमंत्री वीपी सिंह ने पीएसी और पैरा मिलिट्री फोर्सेस को मुरादाबाद में शांति बहाली के लिए लगाया। 14 अगस्त को केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह भी वीपी सिंह के साथ मुरादाबाद पहुंचे। इस दंगे में 84 लोगों की मौत हुई थी तथा 112 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। आरोप लगा कि पीएसी के जवानों ने गोलियां चलाकर सैकड़ों लोगों की हत्या की है। दो महीने तक मुरादाबाद एवं आसपास के जिलों में माहौल तनावपूर्ण रहा। घटना की गंभीरता को देखते हुए कांग्रेस सरकार ने जस्टिस एमपी सक्सेना की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का गठन किया।
जस्टिस एमपी सक्सेना ने अपनी रिपोर्ट 20 नवंबर 1983 को शासन को सौंप दी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यूपी मुस्लिम लीग पार्टी के अध्यक्ष डा. शमीम अहमद, डा. हामिद हसन इन दंगों के जिम्मेदार हैं। यह लोग लंबे समय से हिंसा की तैयारी कर रहे थे। शमीम ने 1971 का लोकसभा एवं 1974 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद मुस्लिमों की सहानुभूति हासिल करने के लिए दंगे की साजिश रची थी। 1980 में जब उन्हें फिर से टिकट मिला तो उसने जीतने के लिए दंगे कराने का प्रयास और तेज कर दिया। ईद से दो दिन पहले शहर की बाल्मिकी बस्ती में एक बारात चढ़त के दौरान मुस्लिम लीग के लोगों ने मारपीट की थी। लेकिन तत्कालीन इंस्पेक्टर वीरेंद्र सिंह उप्पल ने दोनों पक्षों में समझौता कराकर मामला सुलटा दिया।
पुलिस को तब अंदेशा भी नहीं था कि इतनी बड़े साजिश की तैयारी की जा रही है। बाल्मिकी समाज ने मुसलमानों का कूड़ा उठाने से इंकार कर दिया था, जिसकी वजह से शमीम अहमद को माहौल बिगाड़ने का मौका मिल गया। रिपोर्ट के अनुसार ईद वाले दिन मुस्लिम लीग के कैंप कार्यालय से अफवाह फैलायी गई कि ईदगाह में बाल्मिकी समाज की ओर से सुअर छोड़ दिये गये हैं। इसके बाद अचानक ईदगाह में भगदड़ मच गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईदगाह से 34 शव बरामद हुए। शव परीक्षण के बाद न्यायिक आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मरे हुए 84 लोगों में 55 लोगों की मृत्यु भगदड़ के दौरान कुचलने से हुई है। शेष 29 व्यक्तियों की मृत्यु अन्य चोटों के कारण हुई थी।
दंगों के दौरान पीएसी पर भी नसंहार करने के आरोप लगे थे, लेकिन आयोग ने पीएसी एवं सरकारी मशीनरी को क्लीन चिट देते हुए कहा कि दंगा नियंत्रण के लिये पीएसी ने प्रयास किया था, नरसंहार जैसी कोई घटना साक्ष्यों से मेल नहीं खाती है। सक्सेना आयोग ने भाजपा एवं आरएसएस को भी इन दंगों में क्लीन चिट दी थी। आयोग ने लिखा कि इस दंगों में भाजपा या आरएसएस की कोई भूमिका नहीं थी। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक नहीं होने के चलते मारे गये सरकारी कर्मचारियों एवं प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा भी नहीं मिल सका। इस मामले में सभी पक्षों की तरफ से कुल 108 मुकदमे अलग-अलग थानों में दर्ज कराये गये। पुलिस ने 32 मुकदमों में आरोप पत्र दाखिल किए तथा 75 में फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई।
बहरहाल अब इतने लंबे समय बाद मुरादाबाद दंगों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने का कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि न वो लोग बचे हैं और न राजनेता। लेकिन एक सवाल जरूर उठता है कि जब दंगे जैसे संवेदनशील मामलों में सच्चाई जानने के लिए आयोग बनाये जाते हैं तो फिर उसकी रिपोर्ट को क्यों दबा दिया जाता है। अगर राजनीतिक दल यही चाहते हैं कि सच्चाई जनता तक न पहुंचे तो फिर ऐसे आयोग बनाने और उस पर जनता का पैसा खर्च करने का क्या तुक रह जाता है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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