Parliament Attack: लोकतंत्र के मंदिर की रक्षा करने वाले मां भारती के वीर जाबाज सपूतों को नमन
नई दिल्ली। 13 दिसंबर का दिन भारतीय इतिहास में कई छोटी-बड़ी घटनाओं के नाम दर्ज है और भविष्य में भी इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाएं समय-समय पर दर्ज होती रहेंगी। लेकिन वर्ष 2001 में 13 दिसंबर के दिन आतंकियों के द्वारा संसद भवन पर हमला करने की एक ऐसी घटना को अंजाम दिया गया, जिसको सदियों तक आसानी से भूलना संभव नहीं है। इस घटना ने प्रत्येक सच्चे देशभक्त भारतीय को बुरी तरह से झकझोर कर देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बेहद चिंतित कर दिया था। हालांकि हमारे जाब़ाजों ने तत्काल जबरदस्त जवाबी कार्यवाही करके आतंकियों को ढ़ेर करके हमले को विफल करने का काम को बाखूबी अंजाम दिया और देशवासियों को भरोसा दिलाया जब तक मां भारती के वीर सपूत धरा पर ज़िंदा हैं तब तक देश की तरफ आँख उठाने वाले हर दुश्मन का अंजाम बहुत बुरा होगा।
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लेकिन हालात के मद्देनजर विचारणीय तथ्य यह भी थे कि पाक परस्त आतंकी संगठनों ने हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रहरी व सबसे बड़े मंदिर संसद की दहलीज तक पहुंचने का दुस्साहस आखिरकार कैसे किया, कुछ ईमान बेचने वाले व गद्दार लोगों की वजह से देश में कुछ जगहों तक पहुंच रखने वाला आतंक का खतरनाक साया अचानक से संसद भवन तक कैसे पहुंच गया, जिस पर हमारे देश की बेहतरीन जांच एजेंसियों ने कार्य किया और दोषियों को सजा दिलवाई। लश्कर ए तैयब्बा और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के षड्यंत्र पर 5 हथियारबंद आतंकियों ने लोकतंत्र के सबसे पावन तीर्थ संसद भवन पर बमों और गोलियों से हमला करने की दुस्साहस पूर्ण घटना को अंजाम दिया था, वह लोग विस्फोटक से भरी कार को परिसर के अंदर उड़ाकर संसद भवन व देश के बेहद विशिष्ट लोगों को नुकसान पहुंचना चाहते थे। लेकिन मां भारती के वीर जाबांज सपूतों ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए इस हमले को अपने हौसले व वीरता के कौशल से समय रहते सफलतापूर्वक नाकाम करने का काम करके देश की शान संसद भवन को सुरक्षित रखने का कार्य किया था। हमारे वीर जवानों ने आतंकियों के संसद भवन के बाहरी परिसर से भवन के अंदुरुनी हिस्से में घुसकर आतंक मचाने के बेहद खतरनाक मनसूबों को पूरा नहीं होने दिया था, लेकिन ऐसा करते हुए देश की रक्षा में 8 सुरक्षाकर्मियों व 1 माली को अपने प्राण न्यौछावर करने पड़े थे।
कुछ देशद्रोही गद्दारों की टोली की वजह से हुई थी ये नापाक हरकत
चंद पैसों की खातिर अपना ईमान बेचने वाले चंद लोगों व कुछ देशद्रोही गद्दारों की टोली की वजह से देश की राजधानी के बेहद सुरक्षित माने-जाने वाले इलाके में देश की आनबान शान संसद भवन की इमारत में घुसने का दुस्साहस एक अक्षम्य अपराध था। इस घटना को अंजाम देने के लिए आतंकवादियों ने गृहमंत्रालय के स्टीकर के बलबूते DL-3CJ-1527 नंबर की सफेद रंग की लालबत्ती लगी एम्बेसडर गाड़ी का प्रयोग संसद भवन के परिसर में घुसने के लिए किया था। हालांकि शुरुआत में ये आतंकी सुरक्षाकर्मियों को चकमा देने में कामयाब रहे थे, लेकिन इनकी कार की रफ़्तार संसद भवन परिसर में चलने वाली सरकारी गाड़ियों से कुछ ज़्यादा तेज थी, कार की तेज रफ़्तार देखकर संसद के वॉच एंड वॉर्ड ड्यूटी में तैनात जगदीश प्रसाद यादव को कुछ संदेह हुआ और आनन-फानन में वह वीर निहत्थे ही आतंकियों की इस कार की और दौड़ पड़े, लेकिन तब ही हड़बड़ी में कार के उपराष्ट्रपति कृष्ण कांत के काफिले की गाड़ी से टकराने के बाद सुरक्षाकर्मियों का शक यकीन में बदल गया और उनकी सजगता से आतंकियों के मनसूबे फेल हो गये।
आतंकियों को मां भारती के सपूतों ने किया ढेर
जिसके बाद आतंकी संसद भवन के परिसर में अपनी कार से उतर कर अपने खूनी खेल खेलने के नापाक कदमों से लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को अपवित्र करने के मंसूबे से गोलीबारी करते हुए चल पड़े, लेकिन उससे पहले ही हमारे जाबांज सुरक्षा बलों ने उन्हें ढेर कर दिया। बाद में जांच ऐजेंसियों ने संसद पर हमले के मामले में मदद करने के लिए चार देशद्रोही चरमपंथियों को गिरफ़्तार किया। जिन चार लोगों में मोहम्मद अफज़ल, शौकत हुसैन, अफ़साँ गुरु और प्रोफ़ेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी को दिल्ली की विशेष अदालत ने 16 दिसंबर 2002 को दोषी करार दिया था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफ़ेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी और अफ़साँ गुरु को बरी कर दिया था, लेकिन मोहम्मद अफ़ज़ल की मौत की सज़ा बरकरार रखी और शौकत हुसैन की मौत की सज़ा को घटाकर 10 साल की सज़ा कर दिया था। बाद में 9 फरवरी, 2013 को अफ़ज़ल गुरु को दिल्ली की तिहाड़ जेल में सुबह 8 बजे फांसी पर लटका कर वीर जाबांज शहीदों को श्रद्धांजलि दी गयी। आज हम संसद हमले की 19वीं बरसी पर मां भारती के वीर जाबांज सपूतों को कोटि-कोटि नमन करते हैं।
।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।










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