पश्चिम बंगाल चुनाव: अब्बास सिद्दीक़ी ने क्या ममता बनर्जी की नींद उड़ा दी है?
स्थानीय लोग जिस पीर को दादा हुज़ूर कहते हैं, वे 19वीं सदी के सूफ़ी संत थे. इन्होंने शिक्षा और समाज सुधार को लेकर कई काम किए थे.
दादा हुज़ूर यानी अबु बक्र सिद्दीक़ी ने कई अनाथालय, मदरसे और कई स्वास्थ्य केंद्र बनाए. फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ में दादा हुज़ूर का ही मज़ार है. फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ हुगली ज़िले में है, जो पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से 44 किलोमीटर दूर है.
इस मज़ार पर हावड़ा, दक्षिणी 24-परगना, उत्तरी 24 परगना और दिंजापुर ज़िले के बड़ी संख्या में मुसलमान दुआ मांगने आते हैं. असम और बांग्लादेश के भी मुसलमान यहाँ आते हैं. इस पूरे इलाक़े में 90 विधानसभा क्षेत्र हैं, जहाँ मुसलमानों की तादाद 27 फ़ीसदी से ज़्यादा है.
पश्चिम बंगाल में पहले के चुनावों में भी फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ में नेता आते थे और पीरज़ादाओं से मुलाक़ात कर पीर हज़रत के मज़ार पर प्रार्थना करते थे. लेकिन इस साल फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ दूसरी वजह से चर्चा में है. पहली बार एक पीरज़ादा चुनाव लड़ रहा है.
35 साल के अब्बास सिद्दीक़ी यानी दादा हुज़ूर के पड़पोते ने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ़) नाम की एक पार्टी बनाई. इस पार्टी के गठन के तत्काल बाद लेफ़्ट फ़्रंट ने उन्हें गले लगा लिया. कांग्रेस और लेफ़्ट फ्रंट का गठबंधन पहले से ही था, लेकिन इसमें आईएसएफ़ भी आ गया. मज़ार से महज़ 300 मीटर की दूरी पर अब्बास सिद्दीक़ी का घर है. यहीं पर उनका परिवार रहता है.
राजनीति के केंद्र में कैसे आए अब्बास सिद्दीक़ी
अब्बास सिद्दीक़ी अचानक से पश्चिम बंगाल की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं. फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ में मज़ार और मस्जिद पास में ही है. यह मस्जिद मध्यकालीन है.
एक घंटा इंतज़ार करवाने के बाद सिद्दीक़ी घर से बाहर आए. क़रीब छह फुट के सिद्दीक़ी कुर्ते-पायजामे में थे और सिर पर टोपी थी. अब्बास सिद्दीक़ी को लेफ़्ट फ्रंट ने कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में 28 फ़रवरी की रैली में बुलाया था. इस रैली में अप्रत्याशित रूप से भीड़ जुटी थी और इसमें अब्बास सिद्दीक़ी की अहम भूमिका बताई जाती है.
वाम मोर्चे में आने से पहले सिद्दीक़ी की बात हैदराबाद के सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से चल रही थी. दोनों एक दूसरे के घर पर भी गए थे. इसके बाद से अब्बास और चर्चा में आ गए थे.
ब्रिगेड परेड ग्राउंड में अब्बास सिद्दीक़ी का भाषण काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा. उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी बीजेपी की बी टीम हैं और उन्हें सत्ता से बेदख़ल करना बहुत ज़रूरी है. कांग्रेस और वाम मोर्चा की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि आईएसएफ़ दलितों और आदिवासियों को भी लेकर चलेगा. इसी को देखते हुए आईएसएफ़ का अध्यक्ष सिमल सोरेन को बनाया गया है. सोरेन आदिवासी हैं.

ओवैसी के साथ क्यों नहीं बनी?
अब्बास सिद्दीक़ी की बात ओवैसी के साथ क्यों नहीं बनी? ओवैसी ने बीबीसी से इसे लेकर कहा कि यह बात अब्बास से ही पूछिए, क्योंकि उन्होंने पूरी कोशिश की थी.
सिद्दीक़ी कहते हैं, ''हमारे लिए बीजेपी को छोड़कर कोई भी पार्टी अछूत नहीं है. हमने पहले टीएमसी से बात की थी और 44 सीटों की मांग की थी. उन्होंने इनकार कर दिया था. फिर वाम मोर्चा 30 सीट देने के लिए तैयार हो गया, तो हमने इसे स्वीकार कर लिया. हमने ओवैसी साहब से भी बात की थी. सबकुछ ठीक ही चल रहा था. लेकिन कुछ दिक़्क़तें थीं. हमे लग रहा था कि कहीं समीकरण बिगड़ न जाए. कुछ सवाल हमने असद साहब से पूछे थे, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया था.''
अब्बास सिद्दीक़ी ने अतीत में कई इस्लामिक जलसों में काफ़ी आक्रामक भाषण दिए हैं. उन्होंने एक बार टीएमसी की सांसद नुसरत जहाँ और कोलकाता के मेयर फ़िरहद हाकिम पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. यहाँ तक कि उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हिजाब पहनने के लिए उन पर जुबानी हमला किया और कहा कि ममता बनर्जी ऐसा करके मुसलमानों को बेवकूफ़ बना रही हैं.
अब्बास सिद्दीक़ी को लगता है कि मुख्यधारा की पार्टियाँ सेक्युलरिज़्म के नाम पर केवल प्रतीकों के ज़रिए राजनीति कर रही हैं जबकि नीतिगत स्तर पर कोई ठोस क़दम नहीं उठा रही हैं. सिद्दीक़ी कहते हैं कि ममता बनर्जी के हिजाब पहनने से मुसलमानों का भला नहीं होगा, बल्कि उन्हें स्कूल, कॉलेज, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी चीज़ों पर ध्यान देना होगा.
नुसरत जहाँ को लेकर अब्बास सिद्दीक़ी के मन में इतनी नफ़रत क्यों है? सिद्दीक़ी कहते हैं, ''कोई अगर लाखों की जान को लेकर खिलवाड़ करे, तो उसके लिए क्या कहा जाएगा. लोकसभा में उन्हें सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ वोट करना चाहिए था. वो सांसद हैं और उनकी यह ज़िम्मेदारी थी. जब दिल में दुख होता है, तो आवाज़ थोड़ी कड़क निकल जाती है. ऐसा नहीं बोलना चाहिए था. थोड़ी नरम बात कहनी चाहिए थी. लेकिन किसी की ज़िंदगी से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए.''
ममता के हिजाब और कोलकाता के मेयर बॉबी हाकिम के दुर्गा पूजा आयोजन को लेकर अब्बास सिद्दीक़ी कहते हैं, ''ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत होनी चाहिए. आपको मुझसे मिलने के लिए सिर पर टोपी या हिजाब लगाने की ज़रूरत नहीं है. इससे इस्लाम की इज़्ज़त नहीं बढ़ जाएगी. यह कोई नियम नहीं है. मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए सिर पर कपड़े रखना ज़रूरी है. लेकिन आप चुनाव के टाइम में ये सब करते हैं, तो ये नाटक लगता है. ये इस्लाम का अपमान है. राजनीति से मज़हब को दूर रखिए. इसका घालमेल मत करिए.''

'नाटक की आवश्यकता नहीं'
अब्बास सिद्दीक़ी कहते हैं, ''मैं मुसलमान हूँ. मंदिर में कभी नहीं जाता हूँ. लेकिन मैं मंदिर के ख़िलाफ़ भी नहीं हूँ. यह एक सेक्युलर गणतंत्र है. सबको अपने धर्म का प्रैक्टिस करने का अधिकार है. लेकिन इस अधिकार में ड्रामे को शामिल करने के लिए नहीं कहा गया है. चुनाव के वक़्त में मैं मंदिर में जाकर नारियल फोड़ने लगूँ, धूप-अगरबत्ती दिखाने लगूँ, तो यह धर्म का फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करना हुआ न कि इससे हिंदू धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ गई. हिंदू धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए मेरे नाटक की ज़रूरत नहीं है.''
सिद्दीक़ी कहते हैं कि मेयर अपना काम करे. वे कहते हैं, ''कोलकाता की सड़क पर रात में निकलिए, तो हज़ारों बेघर हिंदू मिलेंगे. सड़क ही उनके लिए घर है. मंदिर में जाना हिंदुओं का आदर करना नहीं है, बल्कि ये नाटक है. मेयर को चाहिए कि बेघर हिंदुओं के लिए इंतज़ाम करे, न कि दुर्गा पूजा कराने का नाटक करें.''
जाधवपुर यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर अब्दुल मतीन ने फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ को लेकर शोध किया है. इस चुनाव में अब्बास सिद्दीक़ी के पार्टी बनाने से क्या ममता बनर्जी को नुक़सान होगा?
इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर मतीन ने कहा, ''बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों से फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ का मज़बूत संबंध है. इससे तृणमूल कांग्रेस को नुक़सान होगा. फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ बहुत ही समावेशी है. यहाँ हिंदू भी जाते हैं. अब्बास सिद्दीक़ी के पुराने भाषण आक्रामक हैं और महिला विरोधी हैं. नुसरत को लेकर उनका बयान पूरी तरह से ग़लत था, लेकिन हाकिम और ममता को लेकर जो कुछ भी कहा, उससे मैं सहमत हूँ. चुनाव के वक़्त ये मंदिर मस्जिद जाकर ड्रामा ही करते हैं.''

ममता पर आरोप
प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ''बंगाल के सांप्रदायिक माहौल को ख़राब करने में ममता बनर्जी का योगदान है. उन्होंने मुस्लिम तुष्टीकरण किया है. ईमामखाता, कलमा पढ़ना और हिजाब लगाना ये सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देने वाला साबित हुआ है. पिछले दो-चार साल में बंगाल की राजनीति में सांप्रदायिकता बढ़ी है. टीएमसी ने सत्ता पाने के लिए इस बहस को आगे बढ़ाया कि अगर मुसलमान उसे वोट नहीं करेंगे, तो बीजेपी सत्ता में आ जाएगी. टीएमसी भी बाक़ी कथित सेक्युलर पार्टियों की तरह इसी तर्क के आधार पर मुसलमानों का वोट लेने की कोशिश कर रही है.''
प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ''यह टीएमसी को सूट करता है कि मुसलमानों के बीच बीजेपी का डर हो और यह बीजेपी को सूट करता है कि हिंदुओं के बीच मुसलमानों का डर हो. दोनों पार्टियाँ बंगाल के चुनाव को इसी लाइन पर ले जाने की कोशिश कर रही हैं. 2016 के चुनाव में टीएमसी ने जितने मुसलमानों को टिकट दिया था, इस बार नहीं दिया. टीएमसी की राजनीति अब एक्सपोज हो गई है. ममता बहुसंख्यकवाद की ही राजनीति कर रही हैं. वो बीजेपी का मुक़ाबला उसी के तरीक़े से करना चाह रही हैं. अभी जो सीपीएम और कांग्रेस का मोर्चा है, वो टीएमसी और बीजेपी की बाइनरी पॉलिटिक्स के लिए झटका है.''
प्रोफ़ेसर मतीन को लगता है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण 2019 के लोकसभा चुनाव में ही शुरू हो गया था और इस बार भी इसका असर दिख सकता है. अब्बास सिद्दीक़ी का भी मानना है कि ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करती हैं और इससे ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिल रहा है. हालाँकि टीएमसी नेता सौगत रॉय का कहना है कि ममता का चंडी पाठ करना और लाइल्लाह करना धर्मनिरपेक्षता की मिसाल है.
अब्बास सिद्दीक़ी कहते हैं कि मुहर्रम के लिए ममता को दुर्गा पूजा करने की ज़रूरत नहीं है. वे कहते हैं, ''एक सेक्युलर नेता, वो होगा जो मुहर्रम और दुर्गा पूजा दोनों साथ कराए न कि किसी एक के लिए किसी दूसरे को बंद करे. ममता की इसी राजनीति से ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा मिला है. किसी मुसलमान ने दुर्गा पूजा को बाधित करने की मांग नहीं की थी. लेकिन ममता ने ऐसा मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए किया. उन्हें पता होना चाहिए कि मुसलमान दुर्गा पूजा बाधित करने से ख़ुश नहीं होगा, बल्कि उसके लिए कुछ ठोस होगा, तब उसे ख़ुशी मिलेगी. मैं मानता हूँ कि ममता ने मुस्लिम तुष्टीकरण किया है. किसी और की सरकार में दुर्गा पूजा और मुहर्रम को लेकर दिक़्क़त नहीं हुई, लेकिन ममता राज में क्यों समस्या हुई?''

'नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं'
नई पार्टी बनाने पर फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ के पीरज़ादाओं का परिवार भी बँटा हुआ है. अब्बास सिद्दीक़ी के चचेरे भाई मोहम्मद जियाउद्दीन सिद्दीक़ी ने कहा, ''हम सूफ़ी परंपरा से हैं और यहाँ सियासत के लिए कोई जगह नहीं है. फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ किसी पार्टी पॉलिटिक्स में शामिल नहीं रहा है. ममता बनर्जी इस प्रदेश की ऐसी मुख्यमंत्री हैं, जो सभी मज़हब को साथ लेकर चलती हैं.''
सीपीएम की सेंट्रल कमिटी के सदस्य रबिन देब से पूछा कि अब्बास सिद्दीक़ी पीरज़ादा तो नुसरत जहाँ के बारे में आपत्तिजनक बातें करते हैं, ऐसे में उन नेताओं से आपका गठबंधन कितना तार्किक है?
इस सवाल के जवाब में रबिन देब कहते हैं, ''हमने पहले ही अब्बास से कह दिया है ये सब नहीं चलेगा. हमें सबकी राजनीति करनी है और उसी लाइन पर अब्बास को भी चलना होगा. ये हमारा फ़र्ज़ है कि कोई ग़लत बोलता है, तो उसे भी ठीक करके साथ में ले चलें.''
सीपीएम को ज़मीनी हक़ीक़त पता है कि बंगाल में पहचान की राजनीति ज़ोर पकड़ रही है. ऐसे में उसने फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ को साथ में लेकर उसी राजनीति को साधने की कोशिश की है. फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ के अनुयायियों को सीपीएम के लिए नज़अंदाज़ करना आसान नहीं था.
आईएसएफ़ से गठबंधन के लिए बीजेपी कांग्रेस और सीपीएम को घेर रही है. कांग्रेस इससे बचने की भी कोशिश कर रही है. पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुख्रर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी से इस गठबंधन को लेकर पूछा तो उन्होंने कहा कि अब्बास का गठबंधन सीपीएम के साथ है न कि कांग्रेस के साथ.
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