Bengal news:ममता बनर्जी के लिए इसबार महिला वोटर क्यों हैं महत्वपूर्ण ?
कोलकाता: टीएमसी ने बंगाल में इसबार उम्मीदवारों की जो लिस्ट जारी की है, उसमें कई चीजें महत्वपूर्ण हैं। उसने दलितों के बाद सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवारों पर फोकस किया है। वहीं, तुष्टिकरण का दाग छुड़ाने के लिए सिर्फ 14 फीसदी मुसलमानों को ही टिकट दिया है। लेकिन, पिछले चुनावों का विश्लेषण करें तो इस चुनाव में महिलाओं पर उसका जोर बहुत ही अहम साबित हो सकता है। खासकर उसका नारा भी है- 'बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय' (बंगाल को अपनी बेटी चाहिए)। यह सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि ममता बनर्जी इस समय देश की अकेली महिला मुख्यमंत्री हैं। बल्कि, इसके जरिए उनकी पार्टी वहां की महिला वोटरों को 'दीदी' की सत्ता की उनके लिए अहमियत भी समझाना चाहती है। तृणमूल कांग्रेस की इस रणनीति के पीछे पुख्ता वजह भी हैं।

ममता ने 50 महिला उम्मीदवारों पर लगाया दांव
बंगाल चुनाव में सत्ताधारी टीएमसी ने इसबार 294 में से 50 महिलाओं को टिकट दिया है। यह संख्या 2016 के चुनाव से 5 यानी 17 फीसदी ज्यादा है। जाहिर है कि इसने भाजपा का सामना करने के लिए महिलाओं को बहुत ज्यादा तबज्जो देने की कोशिश की है। पार्टी ने टीएमसी छोड़कर बीजेपी में गए सांसद सौमित्र खान की पत्नी सुजाता खान को भी प्रत्याशी बनाया है। भाजपा में गए ममता के पूर्व मंत्री सोवन चटर्जी की पत्नी रत्ना चटर्जी पर भी दांव लगाने में उसने गुरेज नहीं की है। यानी तृणमूल कांग्रेस खुद को प्रदेश की महिलाओं की सबसे बड़ी रक्षक और उनकी चिंता करने वाली पार्टी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है। यही नहीं उसे महिलाओं से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं, जैसे 'सबुज साथी' और 'कन्याश्री' से भी बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं।
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जब महिलाओं ने डाले ज्यादा वोट तो ममता की बनी सरकार
पांच महीने पहले ही देश ने बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे देखे हैं। वहां तीन चरणों के चुनाव में अगर आखिर के दोनों फेज में महिला वोटर घर से नहीं निकली होतीं तो वहां एनडीए की सरकार की राह में रोड़ा अटक सकता था। नीतीश कुमार और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की कई महिला हित वाली योजनाओं के बारे में कहा जाता है कि उसने जेडीयू और बीजेपी के पक्ष में महिलाओं को गोलबंद करने में बहुत मदद की है। बंगाल में भी पिछले चुनावों में वोटों का गणित देखें तो महिला वोटरों के ज्यादा तादाद में निकलने का मतलब टीएमसी सुप्रीमो के लिए बल्ले-बल्ले साबित हुआ है। अगर हम पिछले तीन विधानसभा चुनावों का विश्लेषण करें तो साफ जाहिर होता है कि ममता सरकार बनाने में बंगाल की महिला वोटरों का बहुत बड़ा रोल रहा है। जैसे कि 2006 में 82 फीसदी पुरुष मतदाताओं के मुकाबले 81 फीसदी महिला मतदाता वोट डालने निकली थीं। लेकिन, 2011 में जब दीदी की पहली सरकार बनी थी तो वोट डालने वाले 84 फीसदी पुरुषों के मुकाबले महिला वोटरों की संख्या 85 फीसदी दर्ज की गई थी। 2016 में भी यही समीकरण नजर आया और 82 फीसदी पुरुषों ने वोटिंग की तो उनसे ज्यादा यानी 83 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले।

2016 में टीएमसी को पुरुषों से 6 फीसदी ज्यादा महिला वोट मिले
अगर लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़ों पर यकीन करें तो 2016 में 48 फीसदी महिला वोटरों ने टीएमसी को वोट दिया था, जो कि पुरुषों की तुलना में 6 फीसदी ज्यादा है। यहां यह भी गौर करने की बात है कि इस चुनाव में टीएमसी को ओवरऑल 45 फीसदी वोट मिले थे, जो कि उसे मिले महिला मतों से 3 फीसदी कम है। बंगाल में टीएमसी महिलाओं पर इसलिए भी फोकस कर रही है, क्योंकि वहां उनकी आबादी 49 फीसदी यानी लगभग आधी है, जबकि पिछले चुनावों में वह पुरुषों से ज्यादा वोटिंग करने में दिलचस्पी ले रही हैं।

महिलाओं का मिला साथ तो तीसरीबार बनेगी ममता सरकार
अगर लोकसभा चुनावों की बात करें तो भी महिलाओं ने मताधिकार का इस्तेमाल करने में वहां कोई कोताही नहीं बरती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बंगाल में महिलाओं को वोटिंग का प्रतिशत 82 फीसदी रहा था। लोकनीति-सीएसडीएस के विश्लेषणों के मुकाबले बंगाल में महिलाओं ने हर चुनाव में पुरुषों के मुकाबले ममता का ज्यादा समर्थन किया है। मसलन, 2011 में 38 फीसदी पुरुषों का वोट टीएमसी को गया था तो 39 फीसदी महिलाओं ने उसके पक्ष में वोटिंग की थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब तृणमूल ने राज में सभी पार्टियों की लुटिया डुबो दी थी, तब पुरुषों से 5 फीसदी ज्यादा यानी 42 फीसदी महिलाओं ने दीदी के पक्ष में ईवीएम का बटन दबाया था। जाहिर है कि अगर यह ट्रेंड बरकरार रहा तो नीतीश कुमार की तरह दीदी को फिर से सत्ता का स्वाद चखने का मौका मिल सकता है।












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