दो मुस्लिम भाइयों के बीच अनोखी चुनावी जंग, एक भाजपा में तो दूसरे तृणमूल में
कोलकाता, अप्रैल 21: पश्चिम बंगाल की गोआलपोखर विधानसभा सीट। इस सीट पर दो मुसलमान भाई आमने-सामने हैं। एक भाई तृणमूल से तो दूसरे भाजपा से। तृणमूल के उम्मीदवार गुलाम रब्बानी गोआलपोखर के मौजूदा विधायक हैं और ममता सरकार में श्रम मंत्री हैं। वे इस सीट पर दो बार चुनाव जीत चुके हैं। तीसरी जीत के लिए फिर मैदान में हैं। मंत्री गुलाम रब्बानी को चुनौती दे रहे हैं उनके छोटे भाई गुलाम सरवर हुसैन। वे पिछले साल ही भाजपा में शामिल हुए थे। एक साल बाद ही भाजपा ने उन्हें चुनावी मैदान में उतार दिया। अब सीट पर दो सहोदर भाई अनोखी चुनावी लड़ाई लड़ रहे हैं। गुलाम सरवर हुसैन भाजपा को काम करने वाली पार्टी बता कर मुस्लिम समुदाय से वोट मांग रहे हैं। उनका कहना है कि अगर आप तृणमूल की जोर-जबर्दस्ती से मुक्ति चाहते हैं तो भाजपा को वोट दीजिए। दूसरी तरफ उनके बड़े भाई गुलाम रब्बानी का दावा है कि वे इस बार और अधिक वोटों से जीतेंगे। गोआलपोखर सीट उत्तर दिनाजपुर जिले में है जहां 22 अप्रैल को वोटिंग है।

चुनाव ने बांट दिया परिवार
चुनावी जंग ने मंत्री गुलाम रब्बानी के परिवार को एक तरह से दलीय आधार पर बांट दिया है। वे पांच भाई हैं। बड़े भाई गुलाम यजदानी राजनीति से दूर हैं। चार में एक भाई गुलाम हैदर भाजपा के पक्ष में गुलाम सरवर हुसैन के लिए वोट मांग रहे हैं। एक अन्य भाई गुलाम रसूल तृणमूल के पक्ष में मंत्री गुलाम रब्बानी के लिए वोट मांग रहे हैं। गुलाम रसूल तृणमूल के प्रखंड अध्यक्ष भी हैं। यानी इस मुस्लिम परिवार में दो भाई भाजपा की तरफ हैं तो दो तृणमूल के पक्ष में। इसकी वजह से इस क्षेत्र के मुस्लिम वोटर असमंजस में पड़ गये हैं। गुलाम सरवर के कई मुस्लिम परिवारों के साथ निजी ताल्लुकात हैं। जिस तरह से पश्चिम बंगाल में मतों का ध्रुवीकरण तेज हुआ है उसको देख कर भाजपा के लिए मुस्लिम वोट कठिन माना जा रहा है। लेकिन भाजपा के गुलाम सरवर इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते । उनका कहना है तृणमूल, भाजपा का डर दिखा कर मुसलमानों का वोट लेती रही है। इस खेल में अल्पसंख्यकों का परिवार गरीब से और गरीब होता जा रहा है। भाजपा को हराने के नाम पर अब वे और बर्बाद होने के लिए तैयार नहीं।

तृणमूल बनाम भाजपा
गोआलपोखर पहले फॉरर्वड ब्लॉक का गढ़ था। इस सीट पर उसे छह बार जीत मिली थी। लेकिन 2011 में गुलाम रब्बानी ने फॉरवर्ड ब्लॉक से यह सीट छीन ली। तब उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी। 2016 के चुनाव के समय रब्बानी तृणमूल में चले आये। उन्होंने तृणमूल उम्मीदवार के रूप में भी जीत हासिल की। ममता बनर्जी ने एक बार फिर उन पर भरोसा किया है। 2011 के चुनाव में भाजपा ने यहां से शौकत अली को खड़ा किया था। उन्हें करीब सात हजार वोट मिले थे और तीसरे स्थान पर रहे थे। 2016 के चुनाव में भाजपा ने गोआलपोखर से देबाशीष सरकार को उम्मीदवार बनाया था जिन्हें 16 हजार 966 वोट मिले थे। यानी इस सीट पर धीरे-धीरे भाजपा की स्थिति बेहतर होती जा रही है। इस बार भाजपा के मुसलाम प्रत्याशी होने तृणमूल की मुश्किलें बढ़ गयी दिखती हैं। अगर गुलाम सरवर को थोड़ा भी मुस्लिम वोट मिला गया तो भाजपा की नैया पार लग सकती है। इस सीट पर कांग्रेस के मसूद नसीम एहसान भी चुनाव लड़ रहे हैं। राहुल गांधी ने उनके लिए चुनावी रैली की है। अगर मसूद मुस्लिम मतों में बंटवारा करते हैं तो इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है।

गुलाम सरवार क्यों हुए भाजपाई ?
गुलाम सरवर पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट हैं। उनका होटल व्यवसाय भी है। कुछ दिन तक उन्होंने गुड़गांव में नौकरी भी की थी। 2018 के पंचायत चुनाव के वक्त वे गांव आये थे। उनके एक भाई गुलाम हुसैन पंचायत चुनाव में उम्मीदवार थे। उनका कहना है, इस चुनाव में ममता सरकार के मंत्री और उनके भाई गुलाम रब्बानी के इशारे पर तृणमूल के लोगों ने बूथ लूट कर गुलाम हैदर को हरवा दिया। एक भाई ने दूसरे भाई को हरवा दिया। इस चुनावी धांधली के खिलाफ जब सरवर ने ऑब्जर्वर से शिकायत की तो उनकी बात नहीं सुनी गयी। थाना में केस करना चाहा तो पुलिस ने केस दर्ज करने से इंकार कर दिया। जब इसके खिलाफ आंदोलन किया तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लेकिन जब पंचायत के लोगों को ये बात मालूम हुई तो हजारों लोगों ने थाना का घेराव कर लिया। अंत में पुलिस को उन्हें छोड़ना पड़ा। इसके बाद गुलाम सरवर भाजपा में शामिल हो गये। तब से वे तृणमूल की राजनीतिक दबंगई का विरोध कर रहे हैं। सरवर का आरोप है कि गोआल पोखर में अगर कोई गरीब मुसिलमान अपने हक मारे जाने की बात करता है तो उसे धमका कर चुप कर दिया जाता है। गरीबी न धर्म देखती न जात। उनका दावा है कि यहां वैसे मुसलमानों का उन्हें समर्थन मिल रहा जिनके साथ नाइंसाफी हुई है। किसके दावे में कितना दम है, ये 2 मई को ही पता चलेगा।
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