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GI Tag क्या है? इससे लंगड़ा आम और बनारसी पान को कैसे मिलेगा फायदा, समझें आसान भाषा में

हाल ही में बनारस के चार उत्पादों को जीआई टैग मिला है। ऐसे में लोगों के मन में सवाल है कि आखिर GI Tag होता क्या है. तो आइए जानते हैं इसके बारे में

GI Tag Banarasi Paan and Mango

बनारसी पान, सुप्रसिद्ध लंगड़ा आम, रामनगर का भंटा, आदमचीनी चावल को GI Tag मिला है। जी आई टैग मिलने के बाद दुनिया के बाजारों में यह सामग्री दस्तक देंगे। जी आई विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ रजनीकांत द्वारा बताया गया कि नाबार्ड उत्तर प्रदेश और योगी सरकार के सहयोग से हाल ही में 11 उत्पादों को जीआई टैग मिला है। इसमें 7 उत्पाद वन डिस्टिक वन प्रोडक्ट में भी शामिल हैं, जबकि चार उत्पाद वाराणसी से ही संबंधित हैं। जीआई टैग मिल जाने के बाद यह प्रोडक्ट के उत्पादन से जुड़े लोगों को काफी राहत मिलेगी क्योंकि जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों की पहचान भारत ही नहीं अन्य देशों में भी होगी।

आखिर क्या होता है जीआई टैग
जीआई का पूरा नाम जियोग्राफिकल इंडिकेशन है। इसे यदि हम हिंदी में समझे तो इसका अर्थ भौगोलिक संकेतक होता है। जी आई टैग मिलने के बाद उस प्रोडक्ट की एक पहचान हो जाती है। जी आई टैग मिलने के बाद उसी के आधार पर उस प्रोडक्ट की पहचान की जाती है। जैसे आदमचीनी चावल का जीआई पंजीकरण संख्या 715, बनारसी लंगड़ा आम का 716 और रामनगर के भंटा का 717 तथा बनारसी पान का जी आई पंजीकरण संख्या 430 है। जी आई टैग मिलने के बाद 10 साल तक यह मान्य रहता है। उसके बाद यदि इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं तो इसके लिए पंजीकरण को रिन्यू कराना पड़ेगा। जीआई टैग प्राप्त होने के बाद प्रोडक्ट की अहमियत बढ़ जाती है और इससे जुड़े लोगों को काफी लाभ मिलता है। इसके अलावा किसी प्रोडक्ट के नाम पर बनाए जाने वाले फेक प्रोडक्ट को रोकने में भी मदद मिलती है।

जीआई टैग के लिए कैसे होता है आवेदन
किसी भी प्रोडक्ट का जीआई टैग प्राप्त करने के लिए उस प्रोडक्ट के उत्पाद करने वाले व्यक्ति या किसी संबंधित व्यक्ति द्वारा सीजीपीडीटीएम आवेदन करना पड़ता है। इसके अलावा सरकार या फिर किसी एसोसिएशन के द्वारा भी जीआई के लिए उस उत्पाद का आवेदन किया जा सकता है। आवेदन करने के पश्चात सीजीपीडीटीएम संस्था के लोगों द्वारा पूरी तरह इसका तहकीकात किया जाता है। संस्था के लोग यह देखते हैं कि आवेदन करने वाले व्यक्ति का दावा कितना सही है क्या कोई अन्य व्यक्ति इसका दावेदार है या फिर यह प्रोडक्ट किन-किन स्थानों पर बनता है। इसके अलावा कृषि से संबंधित प्रोडक्ट की उपज कहां-कहां होती है पूरी जांच पड़ताल करने के बाद जब संस्था के लोग संतुष्ट हो जाते हैं उसके बाद उस प्रोडक्ट को जीआई टैग दिया जाता है।

बनारस के इन प्रोडक्ट के लिए भी किया गया आवेदन
जीआई विशेषज्ञ और पद्मश्री डॉ रजनीकांत द्वारा मीडिया को बताया गया कि बनारसी साड़ी के साथ ही बनारस और पूर्वांचल के कई अन्य प्रोडक्ट को पहले से ही जीआई टैग मिल चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि बनारस का लाल पेड़ा, तिरंगी बर्फी, बनारसी ठंडई, बनारस का लाल भरवा मिर्च तथा बनारस के चिरईगांव के करौंदा लिए भी आवेदन किया गया है। उनके द्वारा संभावना जताई गई कि इन प्रोडक्ट को भी जल्द ही जीआई टैग मिल सकते हैं और जी आई टैग मिलने के बाद यह सभी प्रोडक्ट भी देश की बौद्धिक संपदा में शुमार हो जाएंगे।

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