Chachi Kachori की दुकान का सफर थमा, वाराणसी में विकास के नाम पर टूटी बनारसी स्वाद की पहचान
Chachi Kachori: वाराणसी में एक बार फिर सड़कों को चौड़ी करने का कार्य अब धरातल पर उतर आया है। बीएचयू गेट के पास लंका चौराहे से शुरू हुई मुहिम ने अब बनारस की वर्षों पुरानी दुकानों को भी अपनी चपेट में ले लिया है।
इस अभियान के तहत रविदास गेट से लेकर रवींद्रपुरी जाने वाले मार्ग पर अतिक्रमण हटाया गया। बुलडोज़र की गूंज के बीच कई दुकानें तोड़ी गईं, जिनमें दो ऐतिहासिक नाम -'पहलवान लस्सी' और 'चाची की कचौड़ी' भी शामिल हैं।
इन दोनों दुकानों का स्वाद बनारस की पहचान बन चुका था। दशकों से यह दुकानों सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि बनारसी संस्कृति और गप्पों का केंद्र रही हैं। यहां राजनीति, सिने से लेकर बड़ी-बड़ी हस्तियां आ चुकी थी। अब यह विरासत मलबे में तब्दील हो गई है।

यह दुकान नहीं पुरखों की मेहनत थी
बुलडोज़र जब पहलवान लस्सी की दुकान पर चला तो दुकान के मालिक मनोज यादव की आंखों में आंसू छलक उठे। वह बोले, "यह सिर्फ दुकान नहीं, हमारे पुरखों की मेहनत थी। इसे टूटते देखना किसी हादसे से कम नहीं है।"
करीब 70-75 साल पुरानी यह दुकान अपनी रबड़ी वाली लस्सी के लिए मशहूर थी। मनोज वाजपेयी, स्मृति ईरानी और मनोज तिवारी जैसे तमाम चर्चित नाम यहां की लस्सी का स्वाद चख चुके हैं। बीएचयू के छात्र तो हमेशा यहां मिलते थे।
सबको भाता था चाची का बनारसी अंदाज
वहीं पहलवान लस्सी के ठीक पीछे चाची की कचौड़ी की दुकान थी। यहां स्वाद से ज़्यादा चाची के तीखे बोल और बनारसी अंदाज़ के लिए लोग आते थे। यहां की कचौड़ी बनारसीपन की खुशबू लिए होती थी।
चाची के निधन के बाद उनके बच्चे दुकान संभाल रहे थे। लेकिन अब दुकान का नाम, स्वाद और किस्से सब इतिहास बन गए हैं। जो ग्राहक रोज आते थे, वो अब एक सूनी दीवार को देख सन्न हैं।
फोरलेन के लिए ढहा दी गईं पुरानी पहचानें
लोक निर्माण विभाग की योजना के अनुसार, लहरतारा से लेकर विजया मॉल तक 9.5 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई जाएगी। यह प्रोजेक्ट करीब 241.80 करोड़ रुपये की लागत से फोरलेन में बदला जा रहा है।
इस चौड़ीकरण के लिए विभाग ने करीब 30 दुकानों को चिन्हित किया था। 10 दिन पहले सभी को नोटिस भेजा गया। अधिकतर दुकानदारों ने स्वेच्छा से दुकानें खाली कर दीं, लेकिन मन से कोई तैयार नहीं था।
यादों से भरा बनारस, अब बदल रहा नक्शा
प्रशासन का कहना है कि प्रभावित दुकानों को उचित मुआवजा दिया जाएगा। लेकिन स्थानीय लोग मानते हैं कि दुकानों का मूल्य सिर्फ ज़मीन का नहीं होता, उससे जुड़ी भावनाएं भी होती हैं। ऐसे में इस तरह कार्रवाई से पहले विचार करना चाहिए।
यह भी बताया जा रहा है कि यहां पर कई दुकानों की जमीन महंत परिवार की थी। बरसों से चलती आ रहीं दुकानें अब इस बदलाव की बलि चढ़ गईं। बनारसी लोग इसे विकास के नाम पर विरासत की बलि बता रहे हैं। विपक्ष के नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं।
बनारस के पत्रकार विनय मौर्य बताते हैं कि वाराणसी आज विकास की रफ्तार पकड़ रहा है, लेकिन इसके साथ वो पहचान भी खो रहा है, जो गली-कूचों में सांस लेती थी। चाची की गालियां और पहलवान की लस्सी अब सिर्फ किस्सों में रहेंगी।
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