Bharat Bhagya Vidhata Review: कंगना की मूवी ने मुंबई हमले के हीरोज को दिया ट्रिब्यूट, नर्सिंग स्टाफ को सलाम

फिल्म: भारत भाग्य विधाता (Bharat Bhagya Vidhata)
स्टारकास्ट: कंगना रनौत, गिरिजा ओक गोडबोले, स्मिता तांबे, रसिका अगासे
डायरेक्टर: मनोज तपाड़िया
रनटाइम: 2 घंटे 7 मिनट
स्टार: 4 (****)

Bharat Bhagya Vidhata Review: हमारे समाज में कई बार ऐसा होता है कि हम एक तबके को नजरअंदाज करते हैं। वो तबका है नर्सिंग स्टाफ, जो दिन रात अनजान होते हुए भी सबकी सेवा करते हैं लेकिन इसके बदले में उन्हें कई बार दुत्कार दिया जाता है। इतना ही नहीं कुछ लोग रौब दिखाते हुए बदतमीजी भी कर बैठते हैं लेकिन वो अपने मरीज के लिए क्या-क्या करती हैं और उनके अंदर कितना साहस होता है, इस बात को जीवंत करती है कंगना रनौत की फिल्म 'भारत भाग्य विधाता'। कैसी है फिल्म और किस घटना पर आधारित है, आज इस रिव्यू में इसी पर बात करते हैं।

Bharat Bhagya Vidhata

क्या है कंगना रनैत की फिल्म की कहानी?
कंगना रनौत की फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' साल 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के उस हिस्से की कहानी दिखाती है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है। या यूं भी कहें कि भारत देश के अधिकतर लोग उसके बारे में जानते भी नहीं है क्योंकि 26/11 की घटना पर जब भी फिल्म बनी है वो ज्यादातर ताज होटल या लियोपोल्ड कैफे के आसपास घूमती हैं लेकिन ये फिल्म अपना फोकस कामा हॉस्पिटल पर रखती है।

मुंबई के कामा हॉस्पिटल की दास्तां

मुंबई का कामा हॉस्पिटल, इस अस्पताल में दो आतंकवादी घुसते हैं, तब वहां डर, अफरा-तफरी और मरीजों को बचाने की कोशिश कर रहे नर्सिंग स्टाफ का साहस देखने को मिलता है, जिसमें कामा अस्पताल की गीता, शीतल और बबीता की साथारण सी जिंदगी असाधारण बन जाती है। इसे देखने के लिए आपको सिनेमाघर जाना होगा और महसूस करना होगा।

फिल्म की दमदार स्टारकास्ट और उनकी शानदार एक्टिंग

-फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी एक्टिंग है। कंगना रनौत ने गीता का किरदार बहुत सहज तरीके से निभाया है। उन्होंने हीरो बनने की कोशिश नहीं की बल्कि हालात के बीच मजबूती से खड़े रहने वाली एक आम महिला को दिखाया है। कंगना रनौत ने अपनी परफॉर्मेंस भी शानदार दी है। फिल्म की वो स्टार हैं लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगा है कि वो जबरदस्ती किसी सीन में दिख रही हों। अस्पताल के बाहर यानी निजी जिंदगी के अवतार में भी कंगना ने मसूमियत रखी है।

-गिरिजा ओक गोडबोले और स्मिता तांबे (बबीता) भी अपने किरदारों में काफी प्रभावशाली हैं। खासकर अस्पताल वाले सीन्स में, जहां डायलॉग से ज्यादा चेहरे के भाव काम करते हैं। नर्सों के बीच के समूह दृश्य बहुत वास्तविक लगते हैं। थोड़े बिखरे हुए, बातचीत से भरे और बिल्कुल बनावटी नहीं। यही चीज फिल्म को जमीन से जुड़ा हुआ बनाए रखती है। फिल्म की पूरी कास्ट ने कुछ भी ओवर नहीं किया है। सभी ने किरदार को बेहद आम रखा है, जिससे बतौर दर्शक आप खुद को कनेक्ट कर पाते हैं।

फिल्म का परफेक्ट निर्देशन

मनोज तपाड़िया का निर्देशन तब सबसे अच्छा लगता है जब वह चीजों को सिर्फ दिखाते हैं, बिना ज्यादा समझाने की कोशिश किए। मराठी मध्यमवर्गीय जीवन, अस्पताल के गलियारे और ट्रेन के दृश्य बहुत प्राकृतिक लगते हैं। दूसरे हिस्से में जब आतंकवादी अस्पताल में घुसते हैं, तब फिल्म और ज्यादा मजबूत हो जाती है। तनाव साफ महसूस होता है। हालांकि कुछ जगह फिल्म की गति धीमी पड़ती है, लेकिन फिर भी ये दर्शकों के मन में उन लोगों की याद छोड़ जाती है, जो उस रात उस अस्पताल की बिल्डिंग के अंदर मौजूद थे।

क्यों देखें फिल्म 'भारत भाग्य विधाता'?

ये फिल्म बड़े स्तर पर चौंकाने की कोशिश नहीं करती। ये खुद को सीमित रखती है, जमीन से जुड़ी रहती है और यही इसकी सबसे बड़ी पहचान बन जाती है। ये फिल्म महज एक सिनेमा नहीं है, ये एक ट्रिब्यूट है उन नर्सों को जिन्होंने अपने परिवार और अपनी जान से पहले आम जनता और अपने पेशेंट को ऊपर रखा।

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