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Manikarnika Darshan: केवल अक्षय तृतीया के दिन दिखती हैं मां मणिकर्णिका, जानें इसके पीछे की रहस्यमयी परंपरा

Manikarnika Darshan: वाराणसी की दिव्य परंपराओं में एक विशेष स्थान रखने वाली मां मणिकर्णिका की वार्षिक शोभायात्रा इस बार अक्षय तृतीया के अवसर पर 30 अप्रैल को निकाली जाएगी। इस दिन श्रद्धालु केवल एक दिन के लिए देवी के दर्शन कर सकेंगे, जो साल भर महंत आवास में विराजमान रहती हैं। कुंड पर मां के आगमन से जुड़ी हर गतिविधि श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पावन मानी जाती है।

सुबह से ही भक्तों की भीड़ चक्रपुष्करिणी कुंड पर जुटेगी, जहां मां मणिकर्णिका की अष्टधातु की प्रतिमा विशेष पीतल के आसन पर विराजमान की जाएगी। इस विशेष अवसर पर लोग पुण्य की कामना से कुंड के उत्तराभिमुख गोमुख में पवित्र डुबकी भी लगाएंगे। माना जाता है कि यहां स्नान करने से चारों धाम के दर्शन का पुण्य मिलता है।

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कुंड पर मां की प्रतिमा के आगमन से पहले उनका भव्य शृंगार किया जाएगा। रात भर चलने वाले भजन-कीर्तन और पूजन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में भक्तों की भागीदारी होगी।

केवल एक दिन मिलता है मां मणिकर्णिका का दर्शन

हर साल वैशाख शुक्ल तृतीया पर मां मणिकर्णिका की शोभायात्रा निकलती है। तीर्थ पुरोहित जयेंद्र नाथ दुबे बब्बू महाराज के अनुसार, यह एक मात्र दिन होता है जब मां के दर्शन चक्रपुष्करिणी कुंड पर होते हैं। अन्य दिनों में देवी ब्रह्मनाल स्थित मंदिर में विराजती हैं।

मां की प्रतिमा को पालकी में लेकर गलियों से होती हुई कुंड तक लाया जाता है। रास्ते में भक्त मां के दर्शन करते हुए जयकारे लगाते हैं। शोभायात्रा धार्मिक ऊर्जा और भक्तिभाव का जीवंत उदाहरण बन जाती है।

अष्टधातु की प्रतिमा और विशेष आसन

30 अप्रैल की रात को मां मणिकर्णिका की ढाई फीट ऊंची अष्टधातु की प्रतिमा को 10 फीट ऊंचे पीतल के आसन पर विराजमान किया जाएगा। उसके बाद झांकी सजाई जाएगी जिसमें नए वस्त्र, आभूषण और फूलों से देवी का श्रृंगार किया जाएगा।

पूरी रात भक्त मां के दर्शन करते रहेंगे और भजन-कीर्तन में मग्न रहेंगे। ऐसा माना जाता है कि इस रात देवी के पूजन से कुंड का जल भी ऊर्जित हो जाता है।

स्नान से मिलता है चारों धाम का पुण्य

एक मई को मध्याह्न में श्रद्धालु चक्रपुष्करिणी कुंड के उत्तराभिमुख गोमुख में अक्षय पुण्य के लिए स्नान करेंगे। पुरोहितों के अनुसार, यह स्नान अत्यंत फलदायक होता है और इसके प्रभाव से मनुष्य को सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त होता है।

यह अवसर भक्तों के लिए आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है और इसे लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह रहता है।

साल भर मंदिर में रहती है प्रतिमा

मां मणिकर्णिका की प्रतिमा साल भर ब्रह्मनाल के महंत आवास में बने मंदिर में विराजमान रहती है। मान्यता है कि यह प्रतिमा स्वयं मणिकर्णिका कुंड से प्रकट हुई थी।

केवल अक्षय तृतीया के दिन इसे बाहर लाकर कुंड पर स्थापित किया जाता है और अगले दिन स्नान कराकर पुनः मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है।

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माना जाता है कि मां के स्नान के बाद चक्रपुष्करिणी कुंड का जल एक वर्ष तक सिद्ध रहता है। इसमें स्नान करने से पाप और कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस कारण श्रद्धालु बड़ी संख्या में अक्षय तृतीया पर यहां पहुंचते हैं।

मणिकर्णिका दरबार में धार्मिक आयोजन कब तक चलता है?

शोभायात्रा अक्षय तृतीया के दिन निकलती है और मां की प्रतिमा अगले दिन कुंड में स्नान के बाद पुनः मंदिर में स्थापित की जाती है।

मां मणिकर्णिका की प्रतिमा किस धातु की बनी होती है?

यह प्रतिमा अष्टधातु से बनी होती है और इसकी ऊंचाई करीब ढाई फीट होती है।

काशी के चक्रपुष्करिणी कुंड में स्नान का क्या महत्व है?

मान्यता है कि इसमें स्नान करने से चारों धाम के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है।

काशी में मां मणिकर्णिका कहां विराजमान होती हैं?

देवी साल भर ब्रह्मनाल स्थित महंत आवास के मंदिर में रहती हैं और केवल एक दिन के लिए कुंड पर आती हैं।

मां मणिकर्णिका की शोभायात्रा किस दिन निकलती है?

यह यात्रा हर साल अक्षय तृतीया के दिन निकाली जाती है, जो इस बार 30 अप्रैल को है।

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