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Kashi Tamil Sangamam: ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती, काशी और तमिलनाडु के बीच ज्ञान साझा

Kashi Tamil Sangamam: काशी तमिल संगमम 3.0 के अंतर्गत काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में सोमवार को आयोजित बौद्धिक सत्र में कृषि और पारंपरिक हस्तकला के क्षेत्र में ज्ञान साझा किया गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना था।

तमिलनाडु के किसानों और हस्तकला कारीगरों समेत 210 से अधिक सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल ने इस आयोजन में भाग लिया। दिन की शुरुआत बीएचयू के कृषि फार्म में हुई, जहां कृषि विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. उदय प्रताप सिंह ने प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया।

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उन्होंने कृषि के आधुनिकीकरण और उन्नयन के लिए संस्थान में हो रहे शोध और नवाचारों की जानकारी दी। इसके अलावा, एकीकृत कृषि पद्धतियों और पोषण आधारित फसल प्रणालियों पर भी चर्चा हुई।

प्रतिनिधिमंडल ने कृषि फार्म का दौरा करते हुए उन्नत कृषि तकनीकों, डेयरी उत्पादन और वर्मीकम्पोस्टिंग के बारे में सीखा। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियों पर भी विचार-विमर्श हुआ। विशेष रूप से मत्स्य पालन और कुक्कुट पालन की उन्नत तकनीकों पर जानकारी साझा की गई।

पंडित ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में वैचारिक सत्र

अगले चरण में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में वैचारिक सत्र आयोजित हुआ। इस सत्र में कृषि के उन्नयन और हस्तकला के विकास पर गहन चर्चा हुई। आईआईटी बीएचयू के प्रो. वी. रामनाथन ने सत्र का संचालन किया, जिसमें कृषि विज्ञान संस्थान के प्रो. रघुरामन, दृश्य कला संकाय के डॉ. सुरेश चंद्र जांगिड़ और जैविक कृषि के विशेषज्ञ पद्म श्री चंद्रशेखर सिंह मुख्य वक्ता रहे।

प्रो. रघुरामन ने बीएचयू फार्म एडवाइजरी ऐप के बारे में जानकारी साझा की, जो किसानों को फसल संबंधित सलाह देता है। इसके अलावा, उन्होंने गेहूं की उन्नत किस्म HUW 838 के बारे में बताया, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किया था। इस किस्म से किसानों को बेहतर उत्पादन और मुनाफा हो रहा है।

काशी की समृद्ध कला और शिल्पकला

दृश्य कला संकाय के डॉ. सुरेश चंद्र जांगिड़ ने काशी की समृद्ध कला पर चर्चा की, जिसमें बनारसी रेशम बुनाई, गुलाबी मीनाकारी और पारंपरिक मूर्तिकला शामिल हैं। उन्होंने डिज़ाइन इनोवेशन सेंटर द्वारा किए जा रहे नवाचारों के बारे में भी बताया, जो पारंपरिक शिल्प को आधुनिक डिज़ाइन से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

पद्म श्री चंद्रशेखर सिंह ने जैविक कृषि के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे तकनीक और नवाचार का उपयोग करके कृषि को लाभकारी उद्यम बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि काशी तमिल संगमम उत्तर और दक्षिण के बीच ज्ञान साझा करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।

डीआईसी वाराणसी के प्रतिनिधि बलराम ने उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं के बारे में बताया, जो किसानों और शिल्पकारों को प्रोत्साहन और सहयोग देती हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

किसानों और शिल्पकारों के अनुभव

सत्र में यूपी के किसान कैलाश नारायण सिंह ने नील क्रांति योजना और मत्स्य पालन के बारे में अपने अनुभव साझा किए। डॉ. शशिकांत राय ने काले चावल की खेती के लाभ बताए, जबकि अनिल कुमार सिंह ने कृषक उत्पादन संगठन के माध्यम से आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी के उपयोग पर चर्चा की।

विश्वकर्मा क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने अनानास के पत्तों से धागा बनाने और शिल्पकला के आधुनिकीकरण के प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने विदेशी बाजार पर निर्भरता को कम करके आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जताई, ताकि 'विकसित भारत' के लक्ष्य को साकार किया जा सके।

कार्यक्रम के अंत में संवादात्मक सत्र का आयोजन हुआ, जिसमें तमिलनाडु के प्रतिनिधियों और स्थानीय विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए। इस सत्र ने ज्ञान और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया, जिससे दोनों राज्यों के बीच संबंध और मजबूत हुए।

कृषि और शिल्पकला पर आधारित इस सत्र ने भारत के विभिन्न हिस्सों के बीच सांस्कृतिक और ज्ञान के सेतु बनाने का कार्य किया। काशी तमिल संगमम ने यह सिद्ध किया कि जब तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के विशेषज्ञ मिलकर अपने अनुभव साझा करते हैं, तो यह राष्ट्रीय एकता और विकास की दिशा में नई प्रगति हासिल करता है।

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