BHU: मुस्लिम प्रोफेसर ही संस्कृत पढ़ाएंगे, चांसलर ने तरफदारी करते हुए कहा- महामना भी समर्थन देते
वाराणसी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे लोगों को अब चांसलर जस्टिस (रिटायर) गिरिधर मालवीय ने जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि छात्रों ने जो मुद्दा उठाया है, वो गलत है। अगर आज इस विश्वविद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय जिंदा होते तो वे भी इस नियुक्ति का जरूर समर्थन करते। फिरोज खान का समर्थन करते हुए बीएचयू चांसलर जस्टिस गिरिधर मालवीय ने आगे कहा कि महामना की सोच काफी बड़ी थी। वे होते तो निश्चित तौर पर मुस्लिम प्रोफेसर की भी नियुक्ति को अपना समर्थन देते।' विवि के बोर्ड ने पहले भी कहा था कि प्रो. खान संस्कृत पढ़ाएंगे।

छात्रों ने तरह-तरह के सवाल दागे
बता दें कि, इस विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में पिछले दिनों ही प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति कराई गई थी। कुछ हिंदू छात्रों को इस नियुक्ति पर आपत्ति है। छात्रों ने तरह-तरह के सवाल दागे हैं। कई लोगों का कहना है कि मुस्लिम प्रोफेसर से वे संस्कृत सीखने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। जबकि, कई लोगों ने चयन प्रक्रिया पर भी सवाल उठा दिए।

'सभी मापदंडों का पालन किया गया'
अपनी नियुक्ति का विरोध करने वाले लोगों को जवाब देते हुए फिरोज ने कहा, ''मैं एक मुस्लिम हूं, तो क्या मैं संस्कृत छात्रों को सिखा नहीं सकता।'' बता दें कि, खान के समर्थन में विश्वविद्यालय का बोर्ड और कुलपति विरोध-प्रदर्शनों को नजरअंदाज कर रहे हैं। बोर्ड का कहना है कि प्रोफेसर फिरोज की नियुक्ति में चयन प्रक्रिया के सभी मापदंडों का पालन किया गया।

''सबसे ज्यादा अंक पाकर फिरोज टॉप पर रहे थे'
नियुक्ति का विरोध करने वाले छात्रों का कहना है कि डॉ. फिरोज खान की बीएचयू में नियुक्ति महामना के आदर्शों और नियमों के विपरीत है। ऐसे में हम इसे रद करने की मांग कर रहे हैं। वहीं, फिरोज को चुनने वाले बोर्ड के हवाले से कहा गया कि संस्कृत विभाग के सहायक प्रोफेसर के पद के लिए 10 उम्मीदवारों को चुना गया था। जिनमें सबसे ज्यादा अंक पाकर फिरोज खान टॉप पर रहे थे, इसलिए उनकी नियुक्ति की गई।

'संस्कृत से हमारा खानदानी ताल्लुक'
हिंदू यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग में किसी मुस्लिम प्रोफेसर की पहली नियुक्ति के बारे में फिरोज खान का कहना है कि संस्कृत से हमारा खानदानी ताल्लुक है। मेरे दादा गफूर खान राजस्थान में हिंदू देवी-देवताओं को लेकर भजन गाकर इतने मशहूर हो गए थे कि लोग उनको दूर-दूर से बुलाने आते थे। उन्हीं के नक्शेकदम पर चलते हुए मैंने संस्कृत की पढ़ाई की। साथ ही जयपुर में एक गोशाला के लिए प्रचार-प्रसार करते हुए गौ-सेवा भी की। ऐसे में अब मुझे बीएचयू में संस्कृत पढ़ाने में क्या समस्या होगी?''
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