क्या है 55 साल पुराना वो रहस्य, जिसे 'तीखी बदबू' के साथ आई आपदा का कारण मान रहे हैं रैनी गांव के लोग ?

देहरादून: रविवार को उत्तराखंड में आई आपदा से सबसे ज्यादा नुकसान चमोली जिले के तपोवन इलाके को झेलनी पड़ी है। यहीं पर वह रैनी गांव भी है, जो इसबार कुदरत के कहर का केंद्र माना जा रहा है। इस गांव के लोग पहाड़ से आई आफत को लेकर जो बातें बता रहे हैं, उससे 55 साल पुराना एक रहस्य और गहरा गया है। गांव वालों का कहना है कि उन्होंने भयंकर बाढ़ से ठीक पहले हवा में बहुत ही ज्यादा तीखी बदबू महसूस की थी। यही नहीं त्रासदी से ठीक पहले नदियों में मछलियों का बर्ताव भी उन्हें अनहोनी की संकेत दे रहा था। अब गांव वालों को लग रहा है कि काश, वो आफत के संकेतों को पहले ही समझ गए होते!

55 साल पहले नंदा देवी से गुम हुआ था रेडियोएक्टिव उपकरण

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चमोली का रैनी गांव नंदा देवी के बफर जोन में ही मौजूद है। वहां के वायुमंडल पर भारत की दूसरी सबसे ऊंची पर्वत चोटी (पहली कंचनजंघा) की आबो-हवा का बहुत असर पड़ता है। इस गांव और आसपास के लोगों ने रविवार को महसूस किया था कि जब पहाड़ से आफत भरा मलबा ऋषिगंगा नदी में गिर रहा था तो हवा में बहुत ही ज्यादा तीखी बदबू फैल चुकी थी। पास के ही जुगजु गांव की देवेश्वरी देवी ने उस बदबू के बारे में बताया, 'बदबू इतनी ज्यादा थी कि कुछ समय के लिए हमारे लिए सांस लेना मुश्किल हो गया। अगर यह सिर्फ मलबा या बर्फ होता तो ऐसी बदबू नहीं हो सकती थी। इसके चलते हमारे गांव में इस बात को लेकर आशंका बढ़ गई है कि कहीं ये घटना उसी रेडियोएक्टिव उपकरण की वजह से तो नहीं हुई है, जिसके बारे में हमारे बुजुर्ग बताते रहते हैं.....' दरअसल, ये महिला 1965 के उस खुफिया पर्वत अभियान के बारे में कह रही थी, जिसमें एक रेडियोएक्टिव उपकरण नंदा देवी की सतह के पास ही कहीं गुम हो गया था और उसका आजतक कुछ भी पता नहीं चला है।

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    अभी 44 साल बची है उसे डिवाइस की उम्र

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    दरअसल, 55 साल पहले के उस अभियान में जुजगु गांव के कई पुरुषों ने पोर्टर का काम किया था। उस खुफिया पर्वत अभियान में अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए और भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी शामिल थी, जो नंदा देवी के शिखर पर सर्विलांस के लिए प्लूटोनियम से संचालित उपकरण लगाने गए थे। लेकिन, बर्फीले तूफान की वजह से पर्वतारोहियों की उस टीम को काम पूरा किए बिना लौटना पड़ा और वह रेडियोएक्टिव उपकरण नंदा देवी के आधार पर छोड़कर आए गए। एक साल बाद टीम फिर वहां पहुंची, लेकिन उन्हें वह प्लूटोनियम युक्त उपकरण कहीं पर भी नहीं मिला। बाद में भी कई बार कोशिशें हुईं, लेकिन उसका आजतक कोई सुराग नहीं मिला है। उस रेडियोएक्टिव उपकरण की उम्र 100 साल की थी, इसलिए अभी भी माना जा रहा है कि वह आसपास ही कहीं पर बर्फ के नीचे में दबा पड़ा है।

     रेडियोएक्टिव उपकरण सक्रिय तो नहीं हो गया?

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    जिस अभियान में वह रेडियोधर्मी उपकरण गुम हुआ था, उसमें जुजगु गांव के कार्तिक सिंह भी शामिल थे। संयोग से रविवार को उनकी 90 साल की पत्नी अमृता देवी भी ऋषिगंगा में आई सैलाब में बह गईं। उनके बेटे प्रेम सिंह राणा ने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा है, 'सभी गांव वाले अब इसी डर में जी रहे हैं कि एक दिन हम सब इसी तरह जलप्रलय में बह जाएंगे।.....सरकार को जांच करवानी चाहिए और उस रेडियोएक्टिव उपकरण का पता लगाना चाहिए कि क्या उसी के चलते यह बाढ़ आई है। तभी हम लोग राहत की सांस ले सकेंगे।' सवाल है कि क्या गांव वालों की आशंका सही है कि उसी रेडियोएक्टिव पदार्थ की वजह से कहीं नंदा देवी के आसपास अत्यधिक गर्मी तो पैदा नहीं हो रही है, जिससे बर्फ पिघलने लगे हों? या फिर ग्लेशियर टूटने की घटना के पीछे उस डिवाइस में मौजूद प्लूटोनियम का विस्फोट तो नहीं है? इसके बारे में देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान के रसायन विभाग के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया, 'क्योंकि यह एक रेडियोधर्मी पदार्थ है, यह स्वाभाविक है कि वह रेडियोधर्मी किरणें छोड़ेगा, जो कि पानी और दूसरे तत्वों को नुकसान पहुंचाने में सक्षम है। हालांकि, हम यह मानकर चल सकते हैं कि यह अभियान के लिए ले जाया जा रहा था तो उसे जरूर बंद चैंबर में ले जाया गया होगा।'

    वह खुद सक्रिय नहीं हो सकता- 1965 अभियान दल के चीफ

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    जाहिर है कि जब से प्लूटोनियम वाला उपकरण नंदा देवी के आधार में गुम होने की जानकारी सामने आ रही है, लोगों में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो रही हैं। लेकिन, 1965 के उस पर्वतीय अभियान दल का नेतृत्व करने वाले कैप्टन एमएस कोहली (रिटायर्ड) ने इन आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की है। उनके मुताबिक, 'गर्मी पैदा करने या खुद से फटने की बहुत संभावना नहीं है।' उनका कहना है कि अगर टूट भी जाए तो भी वह उपकरण खुद से सक्रिय नहीं हो सकता। नौसेना के दिग्गज ने कहा है, 'बहुत संभावना है कि वह उपकरण ग्लेशियर में दबा हुआ है। क्योंकि, यह स्थिर है इसलिए इसे निष्क्रिय अवस्था में पड़ा होना चाहिए। हमने इसकी तलाश में तीन साल लगाए हैं। इसकी वजह से किसी भी दुर्घटना की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि इसे संचालित करने के लिए दूसरी चीजों की भी आवश्यकता है।'

    बदबू ही नहीं, मछलियों ने भी दिए थे आपदा के संकेत!

    बदबू ही नहीं, मछलियों ने भी दिए थे आपदा के संकेत!

    वैसे गांव वालों को आपदा से ठीक पहले की बदबू के साथ-साथ स्थानीय नदियों में मछलियों का बर्ताव भी हैरान कर रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उस दिन घटना से पहले नदियों में मछलियां पानी के सतह के ऊपर की ओर आ चुकी थीं और उन्होंने उसे हाथ से ही पकड़ना शुरू कर दिया था। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि मछलियां बहुत ही ज्यादा संवेदनशील होती हैं और पानी में होने वाले बदलावों को वह फौरन महसूस कर लेती हैं। लेकिन, उनके पानी के ऊपरी सतह पर आने के कारणों के बारे में वह अभी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं।

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