400 गांवों में जंगली सुअरों का आतंक, फसलें हो रहीं बर्बाद, महिला-बच्चे अकेले निकलने से डर रहे

Uttarakhand news in hindi , थराली/चमोली। उत्तराखंड में चमोली जिले के करीब 400 गांवों के लोग जंगली सुअरों से खौफ खाए हुए हैं। यहां जंगली सुअर किसानों के खेतों में विचरते रहते हैं रात के समय खड़ी फसलें बर्बाद कर चले जाते हैं। किसानों की लाख कोशिश के बावजूद उनकी फसलें सुरक्षित नहीं रह पा रही हैं। वहीं, कुछ इलाकों में इन जानवरों ने इंसानों पर भी हमला किया है।

उत्तराखंड में चमोली के 400 गांवों में जंगली सुअरों का आतंक

उत्तराखंड में चमोली के 400 गांवों में जंगली सुअरों का आतंक

कुछ काश्तकारों ने बताया है कि चमोली के लगभग हर गांव में जंगली सुअरों ने आतंक मचाया हुआ है। ये सुअर रात्रि के समय झुंड में आते हैं और रिहायशी इलाकों में भी घुस जाते हैं। इन्हें खदेड़ने के लिए लोग रतजगा करते हैं। कहीं-कहीं कनस्तर या ढोल-नगाड़े बजाकर भगाया जाता है। जंगल से खेतों की तरफ आने वाले रास्तों में सूखी घास भी जलायी जा रही है, ताकि आग को देख सुअर खेतों की तरफ न आ सकें। कुछ लोग पटाखे फोड़कर भी सुअरों को भगाने का प्रयास कर रहे हैं।

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गेहूं, जौ, राजमा जैसी फसलें हो रहीं बर्बाद

गेहूं, जौ, राजमा जैसी फसलें हो रहीं बर्बाद

चमोली जिले में नौ विकास खंड हैं और 400 से ज्यादा गांव हैं। मगर, इन दिनों यहां कोई विकास खंड ऐसा नहीं हैं, जहां जंगली सुअर न विचर रहे हों। इन दिनों खेतों में गेहूं की फसल पकने के कगार पर है, लेकिन जंगली सुअर दिन ढलते ही खेतों में फसल को रौंद रहे हैं। वहीं आलू, राजमा, जौ की फसल को भी जंगली सुअरों ने बर्बाद कर दिया है। दशोली के ग्राम पंचायत नैल, कुड़ाव, देवर-खडोरा, कुजौं-मैकोट, हाट, जैसाल, बेमरु समेत कई गांवों में ये स्थिति बनी हुई है। जोशीमठ के डुमक, उर्गम, कलगोंठ थराली के तलवाडी, फ्री सैमपल स्टेट, नेलढालु आदि गांवों में भी यही स्थिति है।

जानवरों से फसलें बचाने के लिए किसानों को करना पड़ रहा रतजगा

जानवरों से फसलें बचाने के लिए किसानों को करना पड़ रहा रतजगा

जंगली सुअर समेत अन्य जानवरों को खदेड़ने के लिए तलवाडी फ्री सैंपल स्टेट, सोल घाटी, डुंगरी, माल बज्वाड्ड आदि इलाकों के लोग रतजगा करते हैं। वे पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल-दमाऊं बजाकर शोर-शराबे से ऐसे पशुओं को भगाते हैं। इसके अलावा कनस्तर एवं पटाखों का भी इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही मशाल और अलाव जलाते हैं। वन पंचायत सरपंच महिपाल सिंह रावत, बख्तावर सिंह नेगी, मेटा मल्ला के केशर सिंह, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य सुरमा देवी छेत्र पंचायत सदस्य सुभाष पिमोली आदि ने बताया कि कई बार वन विभाग के अधिकारियों से इन वन्य-जीवों से निजात दिलाने की मांग उठाई गई। मगर, ग्रामीणों की मांग को अनसुना कर दिया गया।

कितनी संख्या है सुअरों की, विभाग को नहीं पता

कितनी संख्या है सुअरों की, विभाग को नहीं पता

किसान अपने छह माह की मेहनत को अपनी आंखों के सामने ही बर्बाद होते देख रहे हैं। महिलाएं सुअर की डर से जंगल भी झुंड बनाकर जा रही हैं। जंगली सुअरों की क्षेत्र में दहशत बनी हुई है। वन विभाग प्रायः वन्य प्राणियों की गणना करता है, परंतु सुअरों की गणना सामान्यतः नहीं होती। यही वजह है कि अभी कितने सुअर हैं, इसका लेखा-जोखा वन विभाग के पास नहीं है। हालांकि, जंगलों से लगते गांवों के ग्रामीणों की माने तो पिछले पांच-सात वर्षों मे सुअर, काखड़, भालू की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। विशेषकर सुअर और काखड जो फसलों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।

अधिकारी बोले- मारने की अनुमति दे दी गई है

अधिकारी बोले- मारने की अनुमति दे दी गई है

इस मामले में केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग के डीएफओ अमित कंवर का कहना है कि प्रभावित क्षेत्र में ग्रामीणों को सुअरों को मारने की अनुमति दे दी गई है। यदि ग्रामीण सुअरों को नहीं मार पा रहे हैं, तो क्षेत्र में वन कर्मियों की टीम भेजी जाएगी।

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