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Uttarkashi News: ना क्लाउडबर्स्ट, ना भारी बारिश, फिर उत्तरकाशी में क्यों आई तबाही? पहाड़ दे रहे खतरे का संकेत

Uttarkashi Flash Flood 2025 Update: उत्तराखंड के उत्तरकाशी (Uttarkashi) जिले का धाराली गांव में बीते मंगलवार को आई अचानक बाढ़ (Flash Flood) ने इस शांत और खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र में तबाही मचा दी।शुरुआत में स्थानीय प्रशासन और मीडिया रिपोर्ट्स में इस घटना को क्लाउडबर्स्ट (Cloudburst), यानी बादल फटने का नतीजा माना गया। लेकिन जैसे-जैसे मौसम वैज्ञानिकों और भू-वैज्ञानिकों ने मौके के आंकड़े और परिस्थितियां खंगालनी शुरू कीं, एक नई और कहीं अधिक चिंताजनक सच्चाई सामने आने लगी।

विशेषज्ञों का अब मानना है कि यह आपदा महज भारी बारिश का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे ग्लेशियर का टूटना, ऊपरी क्षेत्रों में बनी किसी झील का अचानक फटना (Glacial Lake Outburst Flood) या फिर किसी विशाल हिमस्खलन (Avalanche) जैसी शक्तिशाली घटना जिम्मेदार हो सकती है।

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इस नई थ्योरी ने न केवल आपदा की प्रकृति पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र की भूगर्भीय संवेदनशीलता और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर भी गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी है।

वैज्ञानिकों की जांच में सामने आए अहम तथ्य

जैसे-जैसे राहत और बचाव कार्य आगे बढ़ा, वैज्ञानिकों ने आपदा से जुड़े मौसमीय और भूगर्भीय आंकड़ों का अध्ययन शुरू किया। मौजूदा साक्ष्य इस ओर इशारा करते हैं कि धाराली गांव के ऊपरी हिस्सों में किसी ग्लेशियर के टूटने, झील के अचानक फटने या हिमस्खलन से रास्ता रोककर बनी झील के टूटने के कारण बड़ी मात्रा में पानी नीचे बहा, जिससे यह बाढ़ आई।

IMD की रिपोर्ट: बारिश बहुत कम हुई थी

भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा जारी आंकड़े क्लाउडबर्स्ट थ्योरी पर सीधे तौर पर सवाल खड़े करते हैं। उत्तरकाशी जिले में मंगलवार , 5 अगस्त को हर्षिल में केवल 6.5 मिमी बारिश दर्ज की गई। 24 घंटे की कुल वर्षा हर्षिल में 9 मिमी और भटवारी में 11 मिमी रही। जिले में सबसे अधिक बारिश जिला मुख्यालय उत्तरकाशी में हुई थी जो मात्र 27 मिमी दर्ज हुई।

IMD के क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक रोहित थपलियाल ने कहा कि प्रभावित क्षेत्र में 24 घंटे में केवल हल्की वर्षा दर्ज हुई। इतनी कम वर्षा से इतनी गंभीर बाढ़ की संभावना नहीं बनती। वहीं एक अन्य वरिष्ठ वैज्ञानिक ने भी पुष्टि की कि इतनी मामूली वर्षा से इस प्रकार की तबाही संभव नहीं, और यह ग्लेशियर फटने जैसी ताकतवर घटना की ओर संकेत करता है।

उत्तराखंड में हैं 1,266 हिम झीलें, कई खतरे में

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (Wadia Institute of Himalayan Geology) के अनुसार, उत्तराखंड में वर्तमान में 1,266 ग्लेशियल लेक्स (हिम झीलें) मौजूद हैं। इनमें कुछ छोटी हैं तो कुछ विशाल जलाशयों जैसी। इनमें से कई झीलें नीचे के इलाकों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने इनमें से 13 झीलों को "हाई रिस्क वाली" और 5 झीलों को "बेहद खतरनाक" कैटेगरी में रखा गया है।

भूवैज्ञानिकों की चेतावनी: यह आपदा किसी झील के फटने जैसी घटना का संकेत

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व कार्यकारी निदेशक और वरिष्ठ भूवैज्ञानिक पियूष रौतेला ने कहा, "ऐसी आपदाएं तब होती हैं जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पानी एकत्रित होता है और अचानक नीचे बह जाता है। सिर्फ भारी बारिश इतनी भयंकर बाढ़ नहीं ला सकती।"

उन्होंने यह भी जोड़ा कि अक्सर हिमस्खलन या ग्लेशियर टूटने से पानी के प्रवाह में रुकावट आती है, जिससे ऊपर झील जैसी संरचना बनती है। जब वह टूटती है तो उसका पानी बेहद तेजी से नीचे आता है और तबाही मच जाती है।

इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों को अब ग्लेशियरों की लगातार निगरानी, झीलों के स्तर की नियमित जांच और पूर्व चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) को सक्रिय करने की सख्त जरूरत है।

राहत और बचाव कार्य जारी

बता दें कि प्रशासन, NDRF और SDRF की टीमें प्रभावित इलाकों में लगातार राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। वहीं वैज्ञानिक दल भी मौके पर जाकर भू-आकृतिक बदलाव, ग्लेशियर की स्थिति, और झीलों के बहाव की दिशा में जांच कर रहे हैं ताकि घटना की सटीक वजह सामने लाई जा सके।

उत्तरकाशी की यह आपदा केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक संदेश है - कि जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों की अनियमित गति और हिमालय की नाजुक संरचना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में ऐसे जोखिमों से बचने के लिए हमें साइंटिफिक प्लानिंग, स्थानीय जागरूकता और इन्फ्रास्ट्रक्चर की मजबूती पर ध्यान देना होगा।

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