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ऋषिकेश के नीलकंठ महादेव मंदिर जाने के लिए अब भक्तों की राह आसान, रोपवे से 36 किमी की दूरी 21 मिनट में होगी तय

ऋषिकेश, नीलकंठ महादेव मंदिर के बीच रोपवे निर्माण को मंजूरी

देहरादून, 19 अगस्त। ऋषिकेश के प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव मंदिर जाने के लिए अब भक्तों की राह आसान होगी। इसके लिए आईएसबीटी से त्रिवेणी घाट और त्रिवेणी घाट से नीलकंठ महादेव तक 5.5 किलोमीटर लंबा रोपवे बनने जा रहा है। ये रोपवे 36 किलोमीटर की दूरी को 5.5 किलोमीटर में बदल देगा। इस रोपवे एक घंटे में एक साइट में एक हजार लोग जा सकेंगे। इस प्रोजेक्ट पर अनुमानित 455 करोड़ का खर्चा आएगा। रोपवे बनने से 36 किलोमीटर की यह दूरी 21 मिनट में तय हो जाएगी। शिवभक्तों के लिए ये मंदिर खास है।

uttarakhand rishikesh Neelkanth Mahadev temple ropeway project distance 36 km covered 21 minutes.

रोपवे निर्माण को वित्त विभाग ने मंजूरी दी

ऋषिकेश और नीलकंठ महादेव को मंदिर के बीच रोपवे निर्माण को वित्त विभाग ने मंजूरी दे दी है। अब नियोजन विभाग से मंजूरी के बाद 450 करोड़ की इस परियोजना का प्रस्ताव जल्द ही कैबिनेट में लाया जाएगा। नीलकंठ महादेव मंदिर में सावन और शिवरात्रि में काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते है। ऐसे में पार्किंग के अभाव में जाम और तमाम समस्याओं के कारण लोगों को डेढ़ से दो घंटे का समय लग जाता है। रोपवे बनने से 36 किलोमीटर की यह दूरी 21 मिनट में तय हो जाएगी। आईएसबीटी से त्रिवेणी घाट की दूरी 28 किलेामीटर है और टूरिस्ट सीधे रोपवे से घाट पहुंच सकेंगे। घाट से नीलकंठ महादेव मंदिर की दूरी 8 किलोमीटर है। रोपवे के लिए चार स्टेशन बनेंगे। आईएसबीटी, त्रिवेणी घाट, नीलकंठ और पार्वती मंदिर,अगले तीस सालों को टारगेट करते हुए बनाए जा रहे एक घंटे में एक साइट में एक हजार लोग जा सकेंगे। इस प्रोजेक्ट पर अनुमानित 455 करोड़ का खर्चा आएगा।

भगवान शिव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर सड़क मार्ग से 50 किलोमीटर

उत्तराखंड के गढ़वाल में कई धार्मिक स्थल हैं जिसमें ऋषिकेश में नीलकंठ महादेव मंदिर सबसे प्रमुख पर्यटन स्थल है। भगवान शिव को समर्पित यह ऋषिकेश के बड़े मंदिरों में से एक हैं। यह मंदिर लगभग 5500 फुट की ऊंचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। मुनि की रेती से नीलकंठ महादेव मंदिर सड़क मार्ग से 50 किलोमीटर स्थित है। मान्यता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मंथन से निकला विष ग्रहण किया था। उसी समय उनकी पत्नी पार्वती ने उनका गला दबाया जिससे विष उनके पेट तक न पहुंचे। इस तरह विष उनके गले में बना रहा। विषपान के बाद विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था। गला नीला पड़ने के कारण ही उन्हें नीलकंठ नाम से जाना जाता है। मंदिर परिसर में पानी का एक झरना है जहां भक्तगण मंदिर के दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं। नीलकंठ महादेव मंदिर अत्यन्त मनोहारी मंदिर शिखर के तल पर समुद्र मंथन के दृश्य को चित्रित किया गया है और गर्भ गृह के प्रवेश.द्वार पर एक विशाल पेंटिंग में भगवान शिव को विष पीते हुए भी दिखलाया गया है। सामने की पहाड़ी पर शिव की पत्नीए पार्वती जी का मंदिर है। यहां ​सबसे ज्यादा शिवभक्त पहुंचते हैं। जो कि सावन और महाशिवरात्रि में भोले के दर्शन और जल चढ़ाने जरुर आते हैं। हर साल यहां शिवरात्रि में लाखों की संख्या में शिवभक्त पहुंचते हैं।

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