Uttarakhand CM: क्या 'शापित' बंगले ने ले ली त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी ?
देहरादून: कार्यकाल से एक साल से भी पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी जाने से राज्य के राजनीतिक गलियारों में मुख्यमंत्री के कथित 'शापित' बंगले को लेकर एकबार फिर से चर्चा तेज हो गई है। त्रिवेंद्र सिंह रावत देहरादून के न्यू कैंट रोड स्थित अपने अपने आधिकारिक बंगले में ठीक से दो साल भी नहीं रह पाए कि उनका सीएम का पद चला गया। वो पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं, जिनके साथ ऐसा हुआ है। सियासी तौर पर 'मनहूस' माने जाने वाले इस बंगले ने उनसे पहले तीन मुख्यमंत्रियों की कुर्सी छीनी है। इस बंगले का खौफ राजनेताओं में इतना है कि हरीश रावत ने तरह-तरह के बहाने बनाकर इससे दूरी बनाए रखी थी।

'शापित' बंगले ने ले ली त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी ?
उत्तराखंड में बीजेपी की भारी जीत के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत 18 मार्च, 2017 को मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन, उन्होंने दो साल से ज्यादा वक्त तक न्यू कैंट रोड वाले आधिकारिक बंगले से दूरी बनाकर रखी। आखिरकार वो 23 अप्रैल, 2019 को उसमें शिफ्ट हो गए। वैसे वो शुरू से इसके 'शापित' होने की अफवाहों को खारिज कर रहे थे। लेकिन, उन्होंने भी इसमें घुसने से पहले वाकायदा विधि-विधान से पूजन-हवन करवाया और नवरात्र के दूसरे दिन शुभ मुहूर्त देखकर गृहप्रवेश किया था। करीब ढाई घंटे तक चली पूजा में उनकी पत्नी, दोनों बेटियों के अलावा उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत, प्रकाश पंत, यशपाल आर्या और मदन कौशिक भी उपस्थित हुए थे। उस समय सीएम के एक नजदीकी ने कहा था कि 'इस आवास में कोई वास्तु दोष नहीं है।' इसलिए, उसे दूर करने के लिए उन्हें अलग से कोई विशेष अनुष्ठान की जरूरत नहीं महसूस हुई। लेकिन, जिस तरह से उन्हें कार्यकाल पूरा करने से पहले इस्तीफा देना पड़ा है, एकबार फिर से इस आधिकारिक आवास को लेकर बहस छिड़ गई है।

'अशुभ' बंगले से दूर ही रहे हरीश रावत
देहरादून में सीएम के आवास के 'अशुभ' होने का सबसे ज्यादा असर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश सिंह रावत पर पड़ा था। उन्होंने कई तरह के बहाने बनाकर अपना कार्यकाल गुजार दिया, लेकिन उन्होंने बीजापुर स्थित स्टेट गेस्ट हाउस कभी खाली नहीं किया, जिसे उन्होंने ऑफिशीयल रेसिडेंस घोषित कर रखा था। एकबार उन्होंने कहा था कि वह उपचुनाव (तब हुए) जीतने के बाद ही सरकारी आवास में दाखिल होंगे। लेकिन, चुनाव जीतने के बाद उन्होंने फिर से अपना सुर बदल लिया। उन्होंने तब कहा- 'मैं एक सामान्य आदमी हूं। मेरे जैसे साधारण आदमी के लिए आधिकारिक आवास बहुत बड़ी जगह है।' हालांकि, ये बात अलग है कि फिर भी हरीश रावत की चुनाव के बाद सत्ता में वापसी नहीं हो पाई थी। सबसे दिलचस्प बात तो ये है कि वो खुद भी दो-दो सीटों से चुनाव हार गए थे।

निशंक ने सबसे पहले ली थी 'मनहूस' बंगले में एंट्री
असल में मुख्यमंत्री आवास को तब से 'मनहूस' कहा जाने लगा, जब तीन-तीन मुख्यमंत्रियों की उनके कार्यकाल के बीच में ही विदाई हो गई। इस बंगले में जो नेता सीएम के तौर पर रह चुके हैं, वो हैं- रमेश पोखरियाल निशंक, मेजर जनरल (रि) बीसी खंडूड़ी और विजय बहुगुणा। इनमें से सबकी कुर्सी बीच में ही चली गई थी। वैसे बाद में बहुगुणा ने इस आवास से जुड़ी चर्चाओं को बेकार की अफवाह बताया था। बता दें कि साल 2000 में गठित उत्तराखंड राज्य के पहले सीएम नित्यानंद स्वामी देहरादून के निवासी थी और वो जितने दिन भी इस पद पर रहे उन्होंने अपने घर से ही कामकाज किया था। उनके बाद नारायण दत्त तिवारी 2002 में मुख्यमंत्री बने। सीएम बनने के बाद उन्होंने अंग्रेजों के जमाने के एक बंगले में रहना शुरू किया और 2007 में वहीं रहकर अपना कार्यकाल पूरा किया था। लेकिन, तबतक उस पुराने बंगले को 'असुरक्षित' घोषित कर दिया गया था।

परंपरागत पहाड़ी स्टाइल में बना है शानदार बंगला
बता दें कि देहरादून स्थित परंपरागत पहाड़ी स्टाइल वाला मुख्यमंत्री आवास 2010 में बनकर तैयार हुआ था। इसमें 60 कमरे हैं और त्रिवेंद्र सिंह रावत से जुड़े लोगों का कहना है कि वह सिर्फ इसके पांच कमरों का ही इस्तेमाल करते रहे हैं। इसके अलावा इसमें स्वीमिंग पूल, सभी अत्याधुनिक सुविधाएं, एलिवेटर और गेस्ट रूम के साथ-साथ स्टाफ क्वार्टर्स भी बने हुए हैं। सीएम रावत जब इसमें रहने आए थे तो उन्होंने पानी की बचत के मद्देनजर स्वीनिंग पूल का इस्तेमाल नहीं करने का इरादा जताया था। 10 एकड़ से ज्यादा इलाके में फैली इस इमारत के निर्माण पर अनुमानित 16 करोड़ रुपये की लागत आई थी।












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