रक्षाबंधन पर यहां फल और फूलों से खेली जाती है बग्वाल, देश-विदेश से पहुंचते हैं लोग, खास है ये मेला
चंपावत के देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में लगने वाले बग्वाल मेला
देहरादून, 12 अगस्त। चंपावत जिले के देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में लगने वाले प्रसिद्ध बग्वाल मेले का आज शुभारंभ हो गया। इस दौरान बग्वाल होती है। जिसमें फल और फूलों से बग्वाल खेली जाती है। इस बग्वाल में थोक के योद्धा शिरकत करते हैं। बग्वाल का अर्थ होता है, पत्थरों की बारिश या पत्थर युद्ध का अभ्यास। श्रावणी पूर्णिमा रक्षाबंधन के दिन देवीधुरा वाराही मंदिर में बग्वाल खेली जाती है। इस दौरान आत्मरक्षा के लिए एक विशेष प्रकार की छंतोलियां का इस्तेमाल किया जाता है।
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मुख्यमंत्री धामी ने मेले में किया प्रतिभाग
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मेले में प्रतिभाग किया। इस दौरान मुख्यमंत्री धामी ने मां वाराही मंदिर में विधि विधान से पूजा कर राज्य की खुशहाली की कामना की एवं मां वाराही धाम में चार खाम सात थोक के बीच खेले जाने वाले प्रसिद्ध पाषाण युद्ध के साक्षी बने। इस अवसर पर उन्होंने देवीधुरा में पुलिस चौकी के निर्माण कार्य किए जाने की घोषणा की। मुख्यमंत्री धामी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा की संस्कृति और संस्कार के इस उत्तराखंड प्रदेश के चम्पावत, देवीधुरा में स्थित मां वाराही धाम को शीश झुकाकर कोटिश प्रणाम करता हूं। इस क्षेत्र में अवस्थित भीम शिला, आदि शक्ति गुफा एवं समस्त देवी . देवताओं के आशीर्वाद से 2021 को बग्वाल मेले को राजकीय मेला घोषित किया गया था। कोरोना काल में दो साल से प्रतीकात्मक बग्वाल आयोजित की जा रही थी।

मानसखण्ड मंदिर माला मिशन में मां वाराही धाम देवीधूरा को भी जोड़ा जाएगा
उन्होंने कहा कि रक्षा बन्धन के शुभ अवसर पर बग्वाल युक्त इस मेले से देवीधुरा चम्पावत की प्रसिद्धि ख्याति पूरे देश भर में ही नहीं विदेशों में भी है। मुख्यमंत्री धामी ने कहा की जोशीमठ के सितूण में स्थित माता सीता के 04 दशक एवं 02 वर्ष बाद हो रहे महायज्ञ में जाने का अवसर प्राप्त हुआ था जहां माता सीता जी को प्रसन्न किये जाने के लिए उनकी विराजमान पाषाण शिला की अर्चना की जाती हैए तो वहीं माँ वाराही देवी को प्रसन्न किये जाने के लिए पाषाण युद्ध अर्थात बग्वाल खेला जाता है। उन्होंने कहा देवीधुरा के बग्वाल पूजन से क्षेत्र में खुशहाली आए, फसलों की अच्छी पैदावार हो, क्षेत्र वासी रोग मुक्त हों, निवासियों को अन्न.धन की प्राप्ति हो, ऐसी मेरी प्रार्थना है। उन्होंने कहा कुमायूं के प्राचीन मंदिरों को भव्य बनाने के लिये मानसखण्ड मंदिर माला मिशन की शुरुआत की गई है। इस मिशन के अन्तर्गत ही मां वाराही धाम देवीधूरा को भी जोड़ा जाएगा।

ये है मान्यता
चार प्रमुख खाम चम्याल, वालिग, गहड़वाल और लमगड़िया खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बगवाल का निमंत्रण देते हैं। पहले यहां नरबलि दिए जाने का रिवाज था लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते पौत्र की बलि की बारी आई तो वंशनाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की। देवी मां के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार ली। तभी से बगवाल शुरू हुई है।

ऐसे खेली जाती है बगवाल
आलों की मतलब परंपरागत रूप से जो अलग-अलग जाति समूह हैं, जिनमें पारस्पर पारिवारिक रिश्ते हैं उनकी आलें-आलें वो आपस में दूसरी आलों के साथ बगवाल खेलते हैं। बीच में एक पत्थर होता है जिसको छूना होता है और बड़ी-बड़ी बांस की छतरियों के सहारे बहादुर लोग आगे बढ़ते हैं और दूसरी आलों के लोग पत्थर बरसाते हैं। अब पत्थर की जगह पर फूल व फल बरसाये जाने लग गए हैं। मगर परंपरा जारी है।
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