OMG : बन गया होता अगर गेट पास तो जल प्रलय में बह गए होते ये मजदूर भी

देहरादून। उत्तराखंड में जलप्रलय के बाद सुरक्षित बचे झारखंड के 33 मजदूरों को घर लाने के लिए हेमंत सरकार एयर लिफ्ट करेगी। संबंधित जिलों के अधिकारी मजदूरों के परिजनों को हवाई जहाज से लेकर उत्तराखंड जाएंगे। उनकी खैरियत जानने के बाद 33 मजदूर और उनके परिजन हवाई जहाज से ही रांची लौटेंगे। पर्वतीय और दुर्गम जंगलों के बीच रहने वाले झारखंड के लोग पहाड़ों पर निर्माण कार्य के विशेषज्ञ माने जाते हैं। इनमें विषम परिस्थितियों से लड़ने की नैसर्गिक क्षमता होती है। झारखंड के कई लोग चमोली के पावर प्रोजेक्ट में काम करते थे। कोई फिटर है, कोई वेल्डर है, तो कोई पहाड़ काटने का कारीगर। जलप्रलय में झारखंड के 14 मजदूर लापता बताये जा रहे हैं। 33 लोगों के सुरक्षित होने की सूचना है। झारखंड के अधिकारी खुद जा कर वहां जमीनी हकीकत देखना चाहते हैं। बचे हुए मजदूरों ने फोन से जो कहानी सुनायी है वो रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

कभी-कभी बिगड़े काम में भी छिपी होती है भलाई
झारखंड का लातेहार जिला। सदर प्रखंड का गांव बरियातू खालसा जागीर। रविवार 7 फरवरी का दिन। तपोवन के हाइड्रो पावर प्लांट में इस गांव के 10 मजदूर काम करते हैं। इनकी जिंदगी कैस बची, जरा गौर फरमाइए। पावर प्लांट में इंट्री के लिए सभी कर्मचारियों का गेटपास बना होता है। इन दस मजदूरों का गेटपास नहीं बना था। उन्होंने जरूरी कागजात ठेकेदार को दे दिये थे। लेकिन समय पर नहीं बना। जब गेटपास नहीं मिला तो ये मजदूर नाराज हो गये। उन्हें प्लांट के अंदर जाने से रोक दिया गया। वे गेटपास बनने का इंतजार करने लगे। टाइमपास के लिए वे वहां से दूर बैठ कर ताश खेलने लगे। इसी बीच दिन के ग्यारह बजे पहाड़ टूटने की जोरदार आवाज हुई। थोड़ी देर बाद हर तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगा। पहाड़ से नीचे गिरने वाले पानी की आवाज इतनी तेज थी कि सब कोई डर गया। ये दस मजदूर घटनास्थल से बहुत दूर बैठ कर ताश खेल रहे थे। हर तरफ शोर सुनाई देने लगा। दहशत के मारे ये भी दुबक कर एक समतल जगह पर आ गये। जब बचाव कार्य शुरू हुआ तो उसी दिन उन्हें बचा लिया गया। अगर गेटपास समय पर बन गया होता और ये दस मजदूर काम पर गये होते तो शायद इनका अता-पता नहीं होता। कभी कभी बिगड़े काम में भी भलाई छिपी होती है।

जान जोखिम में डाल कर पहाड़ पर मजदूरी
इन खुशनसीब लोगों में योगेश्वर भी एक हैं। इनकी पत्नी सरोजनी बार-बार ईश्वर का स्मरण कर रही हैं कि उनकी जिंदगी उजड़ने से बच गयी। सरोजनी ने गांव में कर्ज लेकर अपने घर की मरम्मत करायी थी। समय पर कर्ज चुकाना जरूरी था। इसलिए योगेश्वर गांव के लोगों के साथ मजदूरी करने उत्तराखंड चले गये। गांव में सरोजनी अपने दो छोटे बच्चों के साथ पति का इंतजार कर रही है। गरीबी की मार लोगों को बाहर जा कर कमाने के लिए मजबूर कर देती है। इस गांव की कमला देवी के लिए भी घर चलाना मुश्किल था। मेहनत मजूरी के बाद भी उनका बेटा सत्येन्द्र घर का खर्चा नहीं चला पा रहा था। गांव के दोस्तों ने कहा कि चमोली के पावर प्लांट में 20 हजार रुपये महीना पर काम मिल रहा है। लातेहार में रह कर इतना पैसा कमान सपना ही था। इसलिए सत्येन्द्र भी कुछ पैसा कमाने के ख्याल से चमोली चला गया। जान जोखिम में डाल कर मजदूर यहां काम करते हैं। पावर प्रोजेक्ट के लिए बनी दो सुरंगे भी मजदूरों की जान पर आफत बन गयीं।

झारखंड के 14 मजदूर लापता
घटना के पांच दिन बीत चुके हैं। पावर प्लांट के तपोवन सुरंग में अभी भी करीब 35 लोग फंसे हुए हैं। सुरंग में वे कहां हैं इसकी सटीक लोकेशन नहीं मिल पा रही। ऋषिगंगा नदी में गुरुवार को भी अचानक पानी बढ़ गया। जिससे बचाव कार्य को रोकना पड़ा। जो मजदूर सुरंग में फंसे हैं उनके परिजन वहां पहुंच गये हैं। उनकी सलामती की कोई खबर नहीं मिलने से वे परेशान हैं। जल प्रलय में अभी तक दो सौ लोगों के लापता होने की जानकारी है। 36 लोगों के शव बरामद हो चुके हैं। लापता लोगों के परिजनों को उनकी तस्वीर लेकर आने के लिए कहा गया है। झारखंड के लापता 14 मजदूरों में से नौ लोहरदगा के रहने वाले हैं। घटना के बाद से इनका अपने परिजनों से कोई सम्पर्क नहीं हो पाया है। झारखंड सरकार लापता लोगों के परिजनों को भी हवाई जहाज से उत्तराखंड भेज रही है।












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