उत्तराखंड में सरकार बनने को लेकर जानिए वो 4 मिथक, जिन पर टिकी सबकी निगाहें

उत्तराखंड में सरकार बनने को 4 बड़े मिथक पर टिकी सबकी निगाहें

देहरादून, 8 मार्च। उत्तराखंड में सरकार किसकी बनेगी ये 10 मार्च को तय हो जाएगा, लेकिन सबकी निगाहें 4 बड़े मिथक पर टिकी हुई हैं। जो हमेशा से ही प्रदेश में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते आ रहे हैं। ऐसे में इस बार भी सभी को इन 4 अहम मिथक को लेकर उत्सकुता है। कि ये मिथक बने रहते हैं या फिर इस बार टूट कर नया इतिहास रचते हैं। आइए जानते हैं इन 4 मिथक के बारे में।

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    उत्तराखंड में सरकार बनने को लेकर जानिए वो 4 मिथक, जिन पर टिकी सबकी निगाहें
    गंगोत्री से जीते तो सत्ता पर काबिज होना तय

    गंगोत्री से जीते तो सत्ता पर काबिज होना तय

    उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री विधानसभा सीट है। इस सीट से जुड़े मिथक पर प्रदेश के इतिहास में हमेशा से मुहर लगती आ रही है। गंगोत्री विधानसभा से जीतने वाले विधायक की पार्टी ही सरकार बनाती आ रही है। उत्तराखंड बनने के बाद ये मिथक टूटा न​हीं है। 2002 और 2012 में कांग्रेस यहां से जीती और सरकार बनाई, इसी तरह 2007 और 2017 में भाजपा जीती और सत्ता तक पहुंची। इस बार भी सभी की इस मिथक के पूरा होने या टूटने पर निगाहें टिकी हुई हैं।

    रानीखेत से जीते तो विपक्ष में बैठे

    रानीखेत से जीते तो विपक्ष में बैठे

    कुमाऊं की रानीखेत सीट का अपना एक खास इतिहास और रिकॉर्ड बना हुआ है। जिस दल का विधायक इस सीट से जीतकर आया वो हमेशा विपक्ष में ही बैठे हैं। इस तरह से इस सीट पर भी सबकी निगाहें टिकी हुई है। इस सीट पर 2002 और 2012 में भाजपा जबकि 2007 और 2017 में कांग्रेस जीतकर आई। इस तरह दोनों बार जीतने वाली पार्टी को विपक्ष में बैठना पड़ा है। हालांकि इस बार जनता कह रही है कि विधायक बने तो सरकार उसी दल का बनना चाहिए नहीं तो विकास कार्य पर असर पड़ता है। ऐसे में सभी की निगाहें रानीखेत पर टिकी हुई है।

    शिक्षा मंत्री दोबारा जीतकर नहीं आए

    शिक्षा मंत्री दोबारा जीतकर नहीं आए

    प्रदेश में सरकार बनने के बाद मंत्रिमंडल की अहम भूमिका रहती है। लेकिन उत्तराखंड में 4 बार सरकार का गठन हुआ तो सबकी निगाहें शिक्षा मंत्री पर टिकी रही। मं​त्री बनने के बाद हर कोई भारी भरकम विभाग लेना चाहते हैं, लेकिन शिक्षा विभाग से हर कोई बचता रहा। शिक्षा मंत्री दोबारा विधानसभा में नहीं पहुंच पाए। 2002 में पहले चुनाव से पहले भाजपा की अंतरिम सरकार में तीरथ सिंह रावत शिक्षा मंत्री रहे, 2002 में पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार में नरेंद्र भंडारी, 2007 भाजपा सरकार में गोविंद सिंह बिष्ट और खजान दास शिक्षा मंत्री बने, 2012 में कांग्रेस सरकार में मंत्री प्रसाद नैथानी शिक्षा मंत्री रहे ये सब अपने चुनाव हारे है। इस बार गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय शिक्षा मंत्री हैं। ​जो कि फिर से चुनावी मैदान में है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अरविंद पांडेय मिथक तोड़ते हैं या फिर मिथक बरकरार रहता है।

    मुख्यमंत्री रहते चुनाव हारे, धामी पर अब निगाहें

    मुख्यमंत्री रहते चुनाव हारे, धामी पर अब निगाहें

    उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बनने के बाद कोई भी मुख्यमंत्री रहते विधानसभा का अपना चुनाव नहीं जीत पाया। 2002 में एनडी तिवारी सीएम रहे, उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। 2007 में बीसी खंडूरी मुख्यमंत्री बने वे 2012 में हार गए। 2012 में पहले विजय बहुगुणा सीएम बने उन्होंने 2017 में चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन इसी कार्यकाल में हरीश रावत भी सीएम रहे, वे दो-दो जगह से चुनाव हार गए। अब 2017 में पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत और फिर तीरथ सिंह रावत सीएम बने, लेकिन दोनों ने चुनाव लड़ा। तीसरे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चुनाव लड़ा अब उन पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि वे खटीमा से चुनाव जीत पाएंगे या इस बार मिथक टूटता है।

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