Kedarnath dham: कौन और कहां से होते हैं मुख्य पुजारी, बदरीनाथ और केदारनाथ के रावल में क्या होता है अंतर
बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है, जो दक्षिण भारतीय राज्यों से आते हैं। रावल को शंकराचार्य के कुल का वंशज कहा जाता है।
शंकराचार्य ने ही दक्षिण भारतीय पुजारियों को हिमालय के मंदिर में नियुक्त करने की परंपरा की शुरुआत की थी। जो आज भी चली आ रही है।

रावल भीमाशंकर लिंग वर्तमान में केदारनाथ धाम के रावल (मुख्य पुजारी) हैं। वह 324वें रावल हैं। रावल पद की शुरुआत टिहरी के शाही परिवार ने की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजघरानों ने मंदिर के रावल (मुख्य पुजारी) को कुछ गांव दिए थे और उन्हें शिष्य रखने की अनुमति भी दी थी। वर्ष 1948 के बाद केदारनाथ मंदिर समिति को 1948 के अधिनियम के अनुसार रावल को नियुक्त करने का अधिकार था।
पहले मंदिर में रावल ही सबसे बड़े अधिकारी हुआ करते थे। वे पुरोहितों की नियुक्ति करते थे। 321वें रावल नीलकंठ लिंग के काल में मंदिर उन्हीं के अधीन हुआ करता था। हालांकि, अब, वे समिति से वेतन लेते हैं। रावल की सेवाओं की कोई निश्चित अवधि नहीं होती है।
बद्रीनाथ धाम और केदारनाथ धाम की पूजा पद्धति अलग है। बद्रीनाथ में रावल खुद मंदिर में भगवान नारायण की पूजा करते हैं। जबकि केदारनाथ में पूजा-अर्चना के लिए रावल पुजारी को अधिकृत करते हैं। बद्रीनाथ धाम के मुख्य रावल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं। जिन्हें मुख्य रावल चुना जाता है, उनके गले में पैदाइशी जनेऊ का निशान होता है। जबकि केदारनाथ के रावल को महाराष्ट्र या कर्नाटक से चुना जाता है।
केदारनाथ के रावल धाम में छह माह की पूजा-अर्चना के लिए पुजारी को अधिकृत करते हैं। कपाटोद्घाटन से लेकर कपाट बंद होने के दौरान, जब भी उनकी इच्छा हो, वे केदारनाथ जा सकते हैं। यदि किन्हीं परिस्थितियों में केदारनाथ के रावल कपाटोद्घाटन में उपलब्ध नहीं होते हैं, तब भी परंपरानुसार धाम के लिए नियुक्त शिष्य (मुख्य पुजारी) ही कपाटोद्घाटन करते हैं।












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