फ्लैशबैक 2021: 2021 में नहीं हुए जो पूरे वादे, 2022 से जगी उम्मीदें
उत्तराखंड में सख्त भू कानून, राजधानी, जिलों की मांग, पलायन आज भी समस्याएं बरकरार
देहरादून, 25 दिसंबर। 2022 के काउंडाउन शुरू होते ही अब नए साल से उम्मीदें जग गई हैं। उत्तराखंड के जो सपने 2021 में पूरे नहीं हो पाए, वे 2022 में पूरा होने की उत्तराखंड के लोगों को आस है। 2022 इस लिहाज से भी खास है कि मार्च तक उत्तराखंड को 5वीं सरकार मिलने जा रही है। ऐसे में नई सरकार और नए साल में उत्तराखंड के लोगों को क्या आस है।

आइए एक नजर डालते हैं-
सख्त भू कानून
उत्तराखंड में मौजूदा भू-कानून में हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर संशोधन को लेकर लंबे समय से कई संगठनों ने मुहिम तेज की हुई है। धामी सरकार ने इस संबंध में पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में समिति का गठन भी किया है। समिति भूमि कानून को लेकर विभिन्न पहलुओं से अध्ययन कर रही है। लेकिन अब तक सरकार की और से कोई निर्णय नहीं हो पाया है। नए साल और नई सरकार से लोगों को उम्मीद है कि उत्तराखंड में सख्त भू कानून बने। जिससे उत्तराखंड भू माफियाओं से बचाया जा सके। विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950)(संशोधन) अधिनियम में धारा-143(क) और धारा 154 (2) को जोड़े जाने का विरोध हो रहा है। साथ ही कहना है कि सरकार ने पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में कृषि भूमि खरीद की सीमा समाप्त कर दी गई है। लीज और पट्टे पर 30 साल तक भूमि लेने का रास्ता खोला गया है। इससे कृषि भूमि पर संकट खड़ा हो चुका है।
नए जिलों की मांग
नए साल और नई सरकार से उत्तराखंड के लोगों को नए जिलों के पुर्नगठन की उम्मीद हैा लंबे समय से क्षेत्रीय जनता नई जिलों को लेकर आंदोलनरत हैं। लेकिन सरकार इस बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है। सियासी दल चुनाव में उत्तराखंड में सरकार बनने के बाद अपने-अपने दावे कर रहे हैं लेकिन शुरूआत से 4 जिलों को लेकर जो आंदोलन शुरू हुआ उसमें यमुनोत्री, कोटद्वार, डीडीहाट और रानीखेत जिलों को लेकर सरकार ने पहल शुरू की लेकिन अमलीजामा नहीं पहना सके। अब आम लोगों की राय से नए जिलों को लेकर लोगों की भावना का ध्यान रखते हुए नए जिलों की मांग पूरी होने की लोग आस लगाए हुए हैं।
पलायन पर कब होगा एक्शन
21 साल में उत्तराखंड की सरकारें पलायन को लेकर बस बयानबाजी ही करती नजर आ रही हैं। जिस तरह की रणनीति पलायन को लेकर होनी चाहिए वो सरकार आते ही भूल जाती है। 5 साल तक सरकार और कुर्सी बचाने के चक्कर में सियासी दल उत्तराखंड की सबसे बड़ी चिंता को दूर नहीं कर पाए हैं। पलायन आयोग बनाया गया लेकिन अब तक इसका कोई दूरगामी परिणाम सामने नहीं आया। पलायन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड से करीब 60 प्रतिशत आबादी यानी 32 लाख लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। आयोग का दावा है कि कुल मिलाकर 3900 गांवों से पलायन हुआ है। सबसे ज़्यादा पलायन गढ़वाल के पौड़ी ज़िले और अल्मोड़ा ज़िले से हुआ है। ऐसे में नए साल और नई सरकार पलायन पर कुछ एक्शन लेगा या नहीं।
स्थाई राजधानी
उत्तराखंड में देहरादून अस्थाई और गैरसेंण ग्रीष्मकालीन राजधानी है। यानि कि छोटे से राज्य में दो राजधानी, जिसमें से एक भी स्थाई नहीं। उत्तराखंड आंदोलन में गैरसेंण को राजधानी बनाने की मांग के साथ जनता सड़कों पर उतरी। लेकिन 21 साल में किसी भी सरकार ने पूरी सरकार को पहाड़ चढ़ाने की हिम्मत तक नहीं उठाई। अब तक भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन बनाने,सत्र आयोजित करने और ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का धरातल पर काम हुआ,लेकिन चुनाव आते ही गैरसेंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग तेज हुई है। अब सवाल ये उठता है कि क्या नया साल और नई सरकार क्या 2022 में राजधानी को लेकर कोई ठोस निर्णय ले पाएंगे।












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