Char Dham Yatra 2022: 2013 की त्रासदी ना भूलें, किस गलती पर एक्सपर्ट दे रहे हैं ये चेतावनी ?
देहरादून, 22 मई: 2013 में उत्तराखंड में एक प्राकृतिक आपदा आई थी, जिसने प्रकृति के साथ खिलवाड़ को लेकर इंसान को बहुत बड़ी सजा दी थी। कुछ दिन तो ऐसा लग रहा था कि मानो मानव के हाथ में कुछ रह ही नहीं गया है। सब बेबस हो गए थे। उस त्रासदी में जिनपर बीती है, वह उस मंजर को कभी नहीं भुला सकते। उम्मीद थी कि लोग अब भी सतर्क होंगे। उपासना के लिए जा रहे हैं, तो प्रकृति के प्रति अपनी आस्था भी बरकरार रखेंगे। लेकिन, दुख की बात ये है कि एक बार फिर से वही सब शुरू हो चुका है, जिसका रास्ता सिर्फ विनाश की ओर ले जाता है। आस्था के लिए की जा रही पवित्र तीर्थयात्रा भी लोगों की गलतियों से कलंकित हो रही है। यह सावधान हो जाने का वक्त है। सिर्फ सरकारों के लिए ही नहीं, हर इंसान के लिए!

चार धाम यात्रा की पवित्रता को 'कलंकित' न करें
कोविड-19 की वजह से दो साल बाद तीर्थयात्रियों को उत्तराखंड में पवित्र चार धाम यात्रा का भरपूर मौका मिल रहा है। अगली कई तारीखों तक के लिए बुकिंग फुल हैं। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल अभी तक ही 8 लाख से ज्यादा तीर्थयात्रियों ने चारों धाम की यात्रा पूरी कर ली है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की पवित्र तीर्थयात्रा के लिए हर साल देश के हर हिस्से और विदेशों से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। अभी तक लाखों यात्रियों ने इस बार की चार धाम यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन करवा रखा है। सरकार के राजस्व के नजरिए से देखें तो तीर्थयात्रियों की भीड़ से उसका खजाना तो भर रहा है, लेकिन देवभूमि की परिस्थितिकी बिगड़ रही है। क्योंकि, देवभूमि की इस पवित्र यात्रा की पवित्रता बनाए रखना, सबकी जिम्मेदारी है और तीर्थयात्रियों को भी इसपर गौर करना बहुत ही आवश्यका है।
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बाबा केदारनाथ के रास्ते में प्लास्टिक कचरे का अंबार
इस बार चार धाम यात्रा में जिस तरह से कचरा नजर आ रहा है, वह इस पवित्र स्थान की पवित्रता नष्ट कर रहा है। खासकर प्लास्टिक बैग और रैपर्स की भरवार ने पहाड़ों की सुंदरता को ही नहीं बिगाड़ा है, बल्कि यह इसके पर्यावरण को भी चौपट कर रहा है। बाबा केदारनाथ के रास्त में जो प्लास्टिक का कचरा नजर आ रहा है, वह पर्यावरणविदों को हिला रहा है कि आखिर हम क्या कर रहे हैं। क्या हम इतनी जल्दी 2013 के जून वाली उस त्रासदी को भूल चुके हैं ? पता ही नहीं चल रहा है कि यह भोले बाबा के दर्शन के लिए जाने वाला रास्ता है या राजधानी दिल्ली के कचरे वाले बदनाम पहाड़ के पास से गुजर रही सड़क है। कुछ हफ्ते पहले तक जिस जगह पहाड़ों की हरियाली थी, वहां गंदगी ही गंदगी नजर आ रही है। डंपिंग ग्राउंड लग रहा है।

एक और प्राकृतिक आपदा को बुलावा ?
हमें तो ये तस्वीरें सिर्फ अपवित्र नजर आ रही हैं, लेकिन वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की नींदें उड़ चुकी हैं। क्योंकि, ये सिर्फ प्रदूषण का मसला नहीं है, यह प्राकृतिक आपदा के लिए चर्चित राज्य में एक और भयंकर तबाही का बुलावा लग रहा है। गढ़वाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग के प्रोफेसर एमएस नेगी ने कहा है, 'केदारनाथ जाने वाले संवेदनशील रास्ते पर जिस तरह से प्लास्टिक का कचरा जमा हो चुका है, वह हमारी पारिस्थितिकी के लिए बहुत ही खतरनाक है। इससे कटाव होगा और जिसकी वजह से भूस्खलन हो सकता है। हमें 2013 की त्रासदी को ध्यान में रखना होगा और सावधान रहना चाहिए।'

औषधीय पौधे भी विलुप्त हो रहे हैं-वैज्ञानिक
जहां प्रदेश की अर्थव्यवस्था के हिसाब से तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ना बहुत ही अच्छा संकेत है, वहीं उसके दुष्प्रभावों की चिंता करना भी उतनी ही जरूरी है और उसके समाधान पर भी काम करने की आवश्यकता है। हाई ऐल्टिटूड प्लांट फिजियोलॉजी रिसर्च सेंटर के डायरेक्टर प्रोफेसर एमसी नौटियाल के मुताबिक, 'पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ गई है, जिसकी वजह से प्लास्टिक का कचरा बढ़ गया है। जबकि, हमारे पास सैनिटेशन की उचित सुविधा नहीं हैं। इससे हमारी प्राकृतिक वनस्पति भी प्रभावित हुई है। औषधीय पौधे भी विलुप्त हो रहे हैं। '

तीर्थयात्रियों की संख्या कितनी है ?
इस समय प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु प्रत्येक मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंच रहे हैं। बद्रीनाथ में रोज 16,000 तीर्थयात्री दर्शन कर सकते हैं, बाबा केदारनाथ के लिए यह व्यवस्था 13,000 श्रद्धालुओं की है। इसी तरह गंगोत्री मंदिर में हर दिन 8,000 श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर सकते हैं तो यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब में यह संख्या 5,000 तीर्थयात्रियों की है। लेकिन, इतनी बड़ी संख्या में आ रहे श्रद्धालुओं के साथ प्लास्टिक का कचरा भी बड़ी मात्रा में आ रहा है, जो कि शुभ संकेत नहीं है।

2013 के केदारनाथ में क्या हुआ था ?
जून 2013 में बादल फटने और उसकी वजह से आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे उत्तराखंड में तबाही लाई थी। लेकिन, इस त्रासदी का मुख्य केंद्र केदारनाथ धाम बना था। 2004 में बंगाल की खाड़ी में भूकंप के बाद आई सुनामी के बाद यह देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा थी। इस त्रासदी में कुछ लोगों के साथ क्या हुआ और वे कहां गए उनका आजतक नहीं पता चला है। इतने वर्षों की लगातार कोशिश के बाद केदारनाथ धाम फिर से संवर पाया है और यह एक और त्रासदी किसी भी कीमत पर नहीं झेल सकता है। (अंतिम तस्वीर-फाइल)












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