Chaitra Navratri 2023: पूर्णागिरि धाम में होती हैं मन्नतें पूरी, झूठे का मंदिर कैसे पड़ा नाम
चंपावत के टनकपुर में पूर्णागिरि का मंदिर या पुण्यागिरी है।। यह मंदिर अन्नपूर्णा पर्वत पर स्थित है। पूर्णागिरि में माँ की पूजा महाकाली के रूप में की जाती है।

22 मार्च से नवरात्र शुरू हो रहे हैं। उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। यहां कई सिद्धपीठ हैं, जिनका अपना पौराणिक महत्व है। ऐसा ही एक धाम है चंपावत के टनकपुर में पूर्णागिरि का मंदिर या पुण्यागिरी। यह मंदिर अन्नपूर्णा पर्वत पर स्थित है। माँ पूर्णागिरि मंदिर चंपावत से लगभग 92 किलोमीटर और टनकपुर से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है। पूर्णागिरि का मंदिर काली नदी के दाएं ओर स्थित है। काली नदी को शारदा भी कहते हैं। यह मंदिर माता के 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पूर्णागिरि में माँ की पूजा महाकाली के रूप में की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब माता सती ने आत्मदाह किया, तब भगवान शिव माता की मृत देह लेकर सारे ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। भगवान विष्णु ने संसार की रक्षा के लिए माता सती की पार्थिव देह को अपने सुदर्शन चक्र से नष्ट करना शुरू किया।
चंपावत के अन्नपूर्णा पर्वत पर माता सती की नाभि भाग गिरा
सुदर्शन चक्र से कट कर माता सती के शरीर का जो अंग जहाँ गिरा ,वहाँ माता का शक्तिपीठ स्थापित हो गया। इस प्रकार माता के कुल 108 शक्तिपीठ हैं। मान्यता है कि उत्तराखंड चंपावत के अन्नपूर्णा पर्वत पर माता सती की नाभि भाग गिरा, पूर्णागिरि मंदिर की स्थापना हुई। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार , महाभारत काल मे प्राचीन ब्रह्मकुंड के पास पांडवों द्वारा विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया। और इस यज्ञ में प्रयोग किये गए अथाह सोने से से यहाँ एक सोने का पर्वत बन गया। 1632 में कुमाऊँ के राजा ज्ञान चंद के दरवार में गुजरात से श्रीचंद तिवारी नामक ब्राह्मण आये,उन्होंने बताया कि माता ने स्वप्न में इस पर्वत की महिमा के बारे में बताया है।तब राजा ज्ञान चंद ने यहाँ मूर्ति स्थापित करके इसे मंदिर का रूप दिया। चैत्र माह से यहाँ 90 दिनों तक पूर्णागिरि मंदिर का मेला भी लगता है।
पूर्णागिरि धाम के झूठे का मंदिर
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक सेठ संतान विहीन थे। एक दिन माँ पूर्णागिरि ने स्वप्न में कहा कि मेरे दर्शन के बाद तुम्हे पुत्र प्राप्ति होगी। सेठ में माता के दर्शन किये ओर मन्नत मांगी यदि उसका पुत्र हुआ तो वह माँ पूर्णागिरि के लिए सोने का मंदिर बनायेगा। सेठ का पुत्र हो गया,उनकी मन्नत पूरी हो गई, लेकिन सेठ का मन लालच से भर गया। सेठ ने सोने की मंदिर की स्थान पर ताँबे के मंदिर में सोने की पॉलिश चढ़ाकर माँ पूर्णागिरि को चढ़ाने चला गया। तभी टुन्याश नामक स्थान पर पहुंचने के बाद वह मंदिर आगे नही ले जा सका वह मंदिर वही जम गया। तब सेठ को वह मंदिर वही छोड़ना पड़ा। वही मंदिर अब झूठे का मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में बच्चों के मुंडन संस्कार किये जाते हैं। इसके बारे में मान्यता है,कि इसमें मुंडन कराने से बच्चे दीर्घायु होते हैं।
सिद्ध बाबा के लिए मोटी मोटी रोटिया ले जाने का रिवाज
पूर्णागिरि के सिद्ध बाबा मंदिर सिद्ध बाबा के बारे में कहा जाता है, कि एक साधु ने घमंड में माँ पूर्णागिरि पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की, तब माता पूर्णागिरि ने क्रोधित होकर साधु को नदी पार फेक दिया। बाद में साधु द्वारा माफी मांगने के बाद ,माता ने दया में आकर साधु को सिद्ध बाबा के नाम से प्रसिद्ध होने का वरदान दिया। और कहाँ कि बिना तुम्हारे दर्शन के ,मेरे दर्शन अधूरे होंगे। अर्थात जो भी भक्त पूर्णागिरि मंदिर जाएगा, उसकी यात्रा और दर्शन तब तक पूरे नही माने जाएंगे, जब तक वह सिद्ध बाबा के दर्शन नही करेगा। यहाँ सिद्ध बाबा के लिए मोटी मोटी रोटिया ले जाने का रिवाज भी प्रचलित है।
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