मिलिए MA पास 'चाय वाली' अंजना रावत से, 17 साल की उम्र में संभाल ली थी दुकान...लोग कसते थे फब्तियां
मिलिए MA पास 'चाय वाली' अंजना रावत से, 17 साल की उम्र में संभाल ली थी दुकान...लोग कसते थे फब्तियां
देहरादून, 28 अगस्त: अपनी ठेठ पंच लाइन की वजह से मशहूर हुई बिहार की 'ग्रेजुएट चाय वाली' प्रियंका गुप्ता के बारे में आप सबने जरूर सुना होगा। लेकिन क्या आपने कभी एमए पास चाय वाली अंजना रावत के बारे में सुना है। अगर नहीं सुना तो आज हम आपको अंजना रावत के संघर्ष की कहानी बताने जा रहे हैं। अंजना रावत ने हालातों को हराकर और कठिन परिस्थितियों में स्वरोजगार की ओर कदम बढ़ाया और तीलू रौतेली पुरस्कार भी जाती। तो आइए जानते हैं कौन है अंजना रावत।

कौन है अंजना रावत
31 साल की अंजना रावत, उत्तराखंड के श्रीनगर की रहने वाली है और पंजाब नेशनल बैंक के पास एक चाय की दुकान चलाती है। अंजना रावत को दुकान चलाते हुए 12 साल हो गए हैं। खास बात यह है कि चाय की दुकान चलाते हुए ही अंजना रावत ने एमए तक पढ़ाई भी पूरी की। साथ ही साथ अपनी बहन की शादी कराई और इसी दुकान से वो अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं। इतना ही नहीं, मकान का लोन और बाकी चीजों का खर्चा भी उठा रही हैं।

2010 में अंजना दुकान पर शुरू किया था बैठना
अंजना रावत ने महज 17 साल की उम्र में चाय की दुकान पर बैठना शुरु किया था। दरअसल, चाय की दुकान अंजना के पिता गणेश रावत चलाया करते थे, लेकिन जब उनकी तबीयत खराब हुई तो उन्होंने दुकान पर जाना बंद कर दिया था। अंजना बताती है कि उनके पिता को कैंसर हो गया था, जिससे उनका स्वास्थ्य खराब होता चला गया और कुछ दिनों बाद पिता जी गुजर गए। पिताजी की मृत्यु के बाद अंजना ने खुद ही अपने पिता की दुकान संभालने का निर्णय ले लिया।

दुकान पर बैठकर की थी MA की पढ़ाई
जिसके बाद अंजना ने अपने पिता की चाय की दुकान संभाल ली और महज 17 साल की उम्र में दुकान पर बैठना शुरू कर दिया। समय की कमी के कारण अंजना अपनी पढ़ाई भी इसी दुकान पर किया करती थी। इसी चाय की दुकान के सहारे ही अंजना ने अपनी बहन की शादी कराई है, साथ ही एमए की पढ़ाई भी पूरी की। उनकी परिस्थितियों में कुछ ज्यादा बदलाव नहीं आया, लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं।

शुरुआत में लोग कसते थे फब्तियां
अंजना रावत की मानें तो शुरुआत में जब लोग चाय पीने के लिए दुकान पर आते थे तो उनमें से कुछ लोग मजाक बनाते थे। इस दौरान कुछ लोग फब्तियां कसते हुए कहते थे कि यह लड़कों वाले काम है। इतने बुरे दिन भी नहीं आए कि लड़की की दुकान पर चाय पीएंगे। लेकिन मैं कभी इन बातों से निराश नहीं हुई और ना ही कभी हिम्मत हारी। बस अपना काम जारी रखी। इसका नतीजा ये हुआ कि जो लोग उस समय मेरा मज़ाक उड़ाते थे आज वही लोग मेरी दुकान पर आकर चाय पीते हैं।

मां अपनी बेटियों को देते है मेरा उदाहरण
अंजना की मानें तो अब उन्हें अच्छा लगता है जब कोई मां अपनी बेटी को मेरी दुकान दिखाते हुए मेरा उदाहरण देती है। इतना ही नहीं, प्रदेश सरकार ने भी अंजना के संघर्ष को सराहते हुए उसे तीलू रौतेली के पुरस्कार 2021 में प्रदान किया था। वहीं, अजंना की इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर अंजना का परिवार आज बेहद खुश है। वे इसे अंजना की लगन, मेहनत और कठोर परिश्रम का नतीजा बता रहे हैं। हालांति, अंजना का कहना है कि समाज ने हर काम को लड़का और लड़की के दायरे में बांट रखा है। काम कभी छोटा बड़ा या जेंडर स्पेसिफिक नहीं होता। इसी सोच के साथ वे आगे बढ़ती गईं।












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