भाजपा में शुरू हुआ भि​तरघात की रिपोर्ट पर मंथन, त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में किसका पलड़ा भारी

मतदान के बाद रिजल्ट से पहले भाजपा, कांग्रेस की टेंशन

देहरादून, 25 फरवरी। उत्तराखंड में चुनाव निपटने के बाद भाजपा, कांग्रेस के अंदर अब परिणाम से पहले मंथन हो रहा है। कांग्रेस जहां बहुमत को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहा है। वहीं भाजपा में भितरघात के लगे आरोप टेंशन बढ़ा रहे हैं। प्रदेश नेतृत्व भले ही सार्वजनिक तौर पर भितरघात के आरोपों पर कार्रवाई करने से बचती नजर आ रही है। लेकिन अंदरखाने इसको लेकर पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है।

Brainstorming started in BJP, in the event of a hung assembly, who has the upper hand

महानगर भाजपा ने शुरू किया रिपोर्ट पर काम
भाजपा के सूत्रों की मानें तो भाजपा महानगर देहरादून की टीम जिलों की सीटों पर हुए भितरघात के आरोपों पर रिपोर्ट तैयार कर रही है। इसके लिए महानगर अध्यक्ष रिपोर्ट तैयार करने में जुटे हैं। जो कि नेतृत्व को सौंपी जाएगी। इसके लिए पार्टी स्तर पर विचार विमर्श किया जा रहा है। दूसरे जिलों से मीडिया में दिए गए बयानों पर पार्टी ने संज्ञान नहीं लिया है। पार्टी ने ऐसी सीटों पर लिखित शिकायत मांगी है। पार्टी के लिए सबसे बड़ी मुश्किल प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर लगे आरोपों की जांच करना है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष बिना लिखित के जांच करने से इनकार कर रहे हैं, लेकिन जिस तरह मदन कौशिक पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और डॉ रमेश पोखरियाल निशंक से मुलाकात कर चुके हैं। इसे भी मदन कौशिक के उसी प्रकरण से ही जोड़ा जा रहा है। पार्टी 10 मार्च तक इंतजार करने की बात कर रही है, लेकिन इस बीच अपनी टीम से रिपोर्ट तैयार करवा रही है। जिससे आने वाले समय में किसी भी स्थिति से निपटा जा सके। पार्टी को चिंता भितरघात के बाद हार को लेकर भी है। अभी 5 ​सीटों पर ही विधायकों ने भितरघात को लेकर खुलकर बयानबाजी की है। जिन पर पार्टी को परिणामों की चिंता है। देहरादून जिले की भी कई सीटों पर पार्टी को भितरघात का डर है।

जादुई आंकड़े के लिए रणनीतिकारों का मंथन
प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस भले ही अपने-अपने स्पष्ट बहुमत होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह की बूथ और अन्य रिपोर्ट मिल रही है, उससे ​अधिकतर सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार बने हुए हैं। जो कि भाजपा, कांग्रेस के लिए बहुमत तक पहुंचने में परेशानी खड़ी कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में यूकेडी, बसपा और निर्दलीय की भूमिका अहम हो सकती है। अब सवाल ये उठता है कि अगर सरकार बनाने के लिए यूकेडी, बसपा और निर्दलीयों की आवश्यकता पड़ी तो कौन सा दल मजबूत नजर आ रहा है। हालांकि ये 36 सीटों के जादुई आंकड़े के आसपास पहुंचने वाले दल पर ही निर्भर करेगा, लेकिन अगर भाजपा, कांग्रेस में बराबर की टक्कर रहेगी। तो केन्द्र और प्रदेश के समन्वय के हिसाब से ही पलड़ा भारी माना जाएगा। 2007 में भाजपा सरकार को यूकेडी और निर्दलीय ने समर्थन देकर खंडूरी सरकार को बनाने में अहम भूमिका निभाई। जबकि 2012 में निर्दलीयों ने एक संगठन बनाकर कांग्रेस सरकार को समर्थन दिया। इस दौरान बसपा भी कांग्रेस के साथ खड़ी नजर आई थी। हालांकि दोनों समय ज्यादा सीटें लाने वाले दल को ही मौका मिला था। 2012 में कांग्रेस 32 तो भाजपा 31 सीटें जीतकर आए थे। तब भी सरकार कांग्रेस ने ही बनाई। ऐसे में साफ है कि एक सीट ज्यादा ​जीतने की स्थिति में भी ज्यादा सीटें जीतने वाले दल को ही सरकार बनाने का मौका मिल सकता है। इसके लिए भाजपा, कांग्रेस अंदरखाने अभी से खास रणनीति पर काम कर रहे हैं। जिसके लिए पार्टी के रणनीतिकार मैदान में नजर आने लगे हैं।

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