Bichhu Ghas के बारे में ये बातें जानते हैं क्या? फायदे सुनकर चौंक जाएंगे आप
Bichhu Ghas उत्तराखंड का खास उत्पाद है। गांवों और आयुर्वेद की धरती भारत में ऐसे कई अजूबे हैं, जो अक्सर इंसानों को चौंकाते हैं। बिच्छू घास को ऐसे ही अजूबों में एक माना जा सकता है। बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल ग्रीन टी और दवाओं के रूप में होता है।
वनस्पतियों के लिए देश के अलावा दुनियाभर में मशहूर उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में बिच्छू घास प्राकृतिक रूप से बड़े पैमाने पर उगती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इसका इस्तेमाल काफी कम होता है। लोकल स्तर पर जो इसके फायदे जानते हैं, केवल वही बिच्छू घास का घरेलू इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि, इस पहाड़ी राज्य की इकोनॉमी और खासियत के बारे में समझ रखने वाले लोगों का मानना है कि इसके समुचित इस्तेमाल से पलायन और बेरोजगारी जैसी परेशानी पर भी नकेल कसी जा सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, गर्म तासीर वाले इस पौधे की 250 से अधिक प्रजातियां दुनियाभर में पाई जाती हैं।
बिच्छू घास को उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में सिसुण, कंडाली और नेटल जैसे नामों से भी जाना जाता है। वनस्पति के रूप में इसकी पहचान अर्टिका डाईओका नाम से होती है। गढ़वाली लोग इसे कंडाली नाम से जानते हैं और कुमांऊनी बहुल क्षेत्रों में बिच्छू घास को सिसुण कहा जाता है।
औषधीय गुणों से भरपूर होने के बावजूद इस घास का नाम बिच्छू से कैसे जुड़ा, इसके बारे में लोग बताते हैं कि इसके पत्तों में कांटे की तरह रोएं होते हैं। शरीर से टच होने पर झनझनाहट और बिच्छू के डंक जैसा दर्द होने की बात कही जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि झनझनाहट जैसा एहसास पत्तों में मौजूद हिस्टामीन के कारण होता है।
आम तौर पर 4000 फीट से 9000 फीट तक ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में बिच्छू घास पाई जाती है। अधिकांश उत्पादन छायादार इलाके में होता है। चार-छह फीट की औसत ऊंचाई वाले इस घास पर फूल जुलाई-अगस्त में लगते हैं।
औषधीय गुणों से भरपूर बिच्छू घास मिनरल, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, सोडियम, कैल्शियम, आयरन और विटामिन का खजाना है। मोडिकल साइंस से जुड़े लोग शरीर में सूजन ठीक करने के लिए बिच्छू घास के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। आयुर्वेद के जानकार पित्त दोष और शरीर के जकड़न जैसे विकार को ठीक करने के लिए भी बिच्छू घास के इस्तेमाल की सलाह दिए थे।
रिपोर्ट्स के अनुसार, बिच्छू घास से बीज भी निकलता है। पेट से जुड़ी समस्या में बीज को औषधी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जॉन्डिस यानी पीलिया और मच्छरों से फैलने वाली बीमारी मलेरिया के इलाज में भी बिच्छू घास बेहद कारगर है। हड्डी टूटने पर प्लास्टर के रूप में भी इस घास का खूब इस्तेमाल होता है।
गर्मी के दिनों में पहाड़ पर मवेशियों के लिए चारे की कमी होने पर भी बिच्छू घास बेहद उपयोगी है। दुध देने वाले मवेशियों को बिच्छू घास खिलाने पर अच्छी मात्रा में दूध पाया जा सकता है।
सौंदर्य प्रसाधन के तौर पर भी बिच्छू घास का इस्तेमाल होता है। हेयर टॉनिक का इस्तेमाल बालों के गिरने की समस्या से निजात दिलाता है। बालों की शाइन बढ़ाने के साथ-साथ बिच्छू घास केश मुलायम भी करता है।
बिच्छू ग्रीन टी मोटापे में लाभदायक है तो दूसरी ओर साग के तौर पर इसका सेवन आंखों के लिए फायदेमंद है। साग नर्म पत्तियों से बनाया जाता है। इसका सेवन चावल के साथ बेहद लोकप्रिय है।
स्थानीय स्तर पर कुछ लोग इसकी मार्केटिंग का प्रयास कर रहे हैं। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, बागेश्वर के हेम पंत बताते हैं कि बिच्छू घास से बने अलग-अलग उत्पादों को दूसरे राज्यों में भेजा जाने लगा है।
इसमें बिच्छू घास से बनी ग्रीन टी सबसे अधिक भेजी जाती है। अल्मोड़ा की सहकारी समिति भी ग्रीन टी का उत्पादन कर रही है। उत्पादकों का दावा है कि विदेश में भी बिच्छू घास से बनी ग्रीन टी की भारी डिमांड है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, Bichhu Ghas से बनी चप्पलों को भी विदेश में काफी पसंद किया जाता है। बिच्छू घास के रेशे से बनाई जाने वाली चप्पल समेत लगभग 20 उत्पाद उत्तराखंड कॉटेज इंडस्ट्री के लिए नई सुबह का सबब बन सकते हैं।
जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में अमेजॉन से सामानों की बिक्री का एमओयू साइन किया गया है। इस खबर के अनुसार करीब चार साल पहले फ्रांस से 10 हजार जोड़ी चप्पलों का ऑर्डर मिला था।












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