केदारनाथ में जल प्रलय के बाद से 8 साल में बदली तस्वीर, जानिए जलप्रलय से पुनर्निर्माण तक क्या हुआ?

16 और 17 जून, 2013 को केदारनाथ में आई जलप्रलय के बाद केन्‍द्र सरकार ने किया पुर्ननिर्माण

देहरादून, 5 नवंबर। 16 और 17 जून, 2013 को केदारनाथ में आई जलप्रलय ने केदारपुरी को भारी नुकसान पहुंचाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदारनाथ के पुर्ननिर्माण को अपने ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को केदारनाथ धाम में गोवर्धन पूजा के अवसर पर लगभग 400 करोड़ की योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। बीते 8 साल में केदारपुरी की तस्वीर बदल चुकी है। लेकिन पर्यावरण और भू गर्भ वैज्ञानिक उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह के पुर्ननिर्माण के कार्यों को सही नहीं बता रहे है। जबकि पहले भी केदारपुरी में प्राकृतिक घटना हो चुकी है।

4 साल में 5वीं बार पहुंचे पीएम

4 साल में 5वीं बार पहुंचे पीएम

पीएम मोदी बीते 4 साल में 5वीं बार केदारनाथ धाम पहुंचे। यहां पीएम ने पूजा अर्चना के बाद पुर्ननिर्माण से संबंधित योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इसमें आदि गुरू श्री शंकराचार्य जी के पुनर्निर्मित समाधि स्थल और नई प्रतिमा का अनावरण के साथ तीर्थ पुरोहितों के आवास, सरस्वती नदी के तट पर बाढ़ सुरक्षा तथा घाटों का निर्माण, मन्दाकिनी नदी तट पर बाढ़ सुरक्षा हेतु भार वाहक दीवार, गरुड़ चट्टी के लिये मन्दाकिनी नदी पर पुल के निर्माण कार्यों का लोकार्पण किया। प्रधानमंत्री द्वारा जिन योजनाओं का शिलान्यास किया गया उनमें केदारनाथ धाम में संगम घाट का पुनर्विकास एवं रेन शैल्टर शेड, प्राथमिक चिकित्सा एवं पर्यटक सुविधा केन्द्र, मन्दाकिनी आस्था पथ पंक्ति प्रबन्धन, मन्दाकिनी वाटर एटीएम एवं मन्दाकिनी प्लाजा, प्रशासनिक कार्यालय एवं अस्पताल भवन, केदारनाथ तीर्थ स्थल में संग्रहालय (म्यूजियम) परिसर, सरस्वती सिविक एमेनिटी भवन का निर्माण कार्य शामिल है।

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    2013 की आपदा एक नजर में

    2013 की आपदा एक नजर में

    केदारनाथ की विनाशकारी आपदा को 8 साल हो चुके हैं। 16 और 17 जून, 2013 की भीषण आपदा में केदारनाथ और मंदाकिनी घाटी में हजारों लोग लापता हो गए थे। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो आपदा में 3,183 लोगों का आज तक पता नहीं चल पाया है। जबकि सैकड़ों कंकाल बरामद हो पाए। पुलिस के मुताबिक आपदा में लापता हुए लोगों के बारे में कुल 1840 एफआईआर उसके पास राज्य और अन्य प्रदेशों से आई। जांच में पता चला कि, इसमें से कई दो-दो बाद दर्ज हुई। इसे लेकर रुद्रप्रयाग पुलिस ने अलग से विवेचना सेल गठित की गई। पुलिस ने जांच के बाद इसमें 584 एफआईआर मर्ज की, जो दो-दो जगहों पर दर्ज थी। पुलिस ने कुल 1256 एफआईआर को वैध माना। पुलिस के पास 3,886 गुमशुदगी दर्ज हुई जिसमें से विभिन्न सर्च अभियानों में 703 कंकाल बरामद किए गए। जबकि आपदा के दौरान ही पुलिस को 11 शव मिले थे जिनकी शिनाख्त के बाद दाह संस्कार भी किया गया। 16 जून की शाम चौराबाड़ी ताल टूटने से मंदाकिनी में बाढ़ आयी थी। जिसके कारण केदारनाथ के आपास नुकसान और रामबाड़ा तहस-नहस हो गया था। 17 जून सुबह दोबारा चौराबाड़ी ताल से काफी पानी मलबा लेकर आया। जो कि केदारनाथ समेत पूरी घाटी में तबाही लेकर आया जिसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार 4027 लोगों की मौत हो गई थी। सरकारी आंकड़ों में 13,844.34 करोड़ रुपए की परिसंपत्तियों को नुकसान हुआ था। आठवीं सदी में बने केदारनाथ मंदिर को भी इस दौरान भारी नुकसान पहुंचा था। त्रासदी के दौरान बाढ़ से मंदाकिनी नदी की उफनती लहरों ने रामबाड़ा का अस्तित्व ही खत्म कर दिया। इसके बाद सालों निर्माण कार्य चला और साल 2018 में ही ये रास्ता दोबारा तैयार हुआ। आपदा के दो सालों तक केदारनाथ दर्शन के आने वालों की संख्या में भारी गिरावट आई, लेकिन साल 2019 में पहली बार दस लाख से अधिक यात्री केदारनाथ धाम में दर्शनों के लिए पहुंचे। ये अब तक का सबसे बड़ी संख्या मानी जाती है।

    पुर्ननिर्माण का कार्य संवेदनशील भूवैज्ञाानिक की अनदेखी

    पुर्ननिर्माण का कार्य संवेदनशील भूवैज्ञाानिक की अनदेखी

    केदारनाथ के पुर्ननिर्माण को लेकर एक तरफ केन्द्र और राज्य सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। वहीं दूसरी और पर्यावरण और भू गर्भ वैज्ञानिक प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को सही नहीं मानते हैं। जिस तरह से केदारनाथ में भारी मशीनों और कंस्ट्रक्शन का कार्य किया जा रहा है। उसको आने वाले समय के लिए प्रकृति के लिहाज से सही नहीं माना जा रहा है। भरसार विश्वविद्यालय उत्तराखंड के पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉक्टर एसपी सती का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह के विकास कार्य नहीं होने चाहिए। उन्होंने कहा कि केदारनाथ के पुर्ननिर्माण का कार्य संवेदनशील भूवैज्ञाानिक की अनदेखी है। 2013 की प्राकृतिक घटना को प्राकृतिक आपदा बताया गया। उन्होंने कहा कि पिछले 10 हजार साल में जो ग्लेशियर पीछे गए हैं, उन्होंने मलबा छोड़ा हुआ है। तब भी विकास कार्य करवाए जा रहे हैं।

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