UP में रहकर 2024 की जमीन तैयार करेंगे अखिलेश ?, जानिए इस्तीफे के पीछे छिपे राज

लखनऊ, 23 मार्च: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आजमगढ़ से इस्तीफे के बाद से ही एक बार फिर कयासबाजी का दौर शुरू हो गया है। सपा भले ही सत्ता में नहीं आई हो, लेकिन पार्टी को अब तक का सबसे ज्यादा वोट शेयर मिला है। कोर वोटर पूरी ताकत से लामबंद हो रहा था। विधानसभा के नतीजों पर नजर डालें तो 23 लोकसभा सीटों पर सपा को बढ़त मिली है। पश्चिम यूपी से लेकर पूर्वांचल तक कई जिलों में पार्टी के प्रदर्शन में काफी सुधार हुआ है। मतदाताओं और समर्थकों का समर्थन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सपा उनके मुद्दों पर जमीनी लड़ाई लड़ती दिखे। लोकसभा, राज्यसभा से लेकर विधान परिषद तक पार्टी की भागीदारी कम हो रही है। हालांकि इस बार सपा के पास विधानसभा में दोगुने से ज्यादा विधायक हैं जिसका लाभ अखिलेश लेना चाहते हैं।

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    करहल और आजमगढ़ का सियासी ताप नापने के बाद लिया फैसला

    करहल और आजमगढ़ का सियासी ताप नापने के बाद लिया फैसला

    अखिलेश जिस करहल विधानसभा सीट से जीते हैं, वह उनके पिता मुलायम सिंह यादव की मैनपुरी लोकसभा सीट का हिस्सा है। यह जिला सपा का गढ़ माना जाता है, लेकिन इस बार बीजेपी ने चार में से दो सीटों पर जीत हासिल की है। सपा ने आजमगढ़ की सभी 10 विधानसभा सीटों पर कब्जा कर लिया जहां से अखिलेश यादव सांसद थे। यही वजह है कि अखिलेश ने इस्तीफा देने से पहले करहल और आजमगढ़ दोनों की उम्मीदों की परीक्षा ली। होली में अपने सैफई दौरे के दौरान अखिलेश ने पार्टी कार्यकर्ताओं और करहल के पदाधिकारियों से बातचीत की। इसके बाद वह सोमवार को आजमगढ़ गए। वहां पार्टी के विधायकों और प्रमुख कार्यकर्ताओं से बात की और उनके समझाने के बाद विधानसभा में बने रहने का फैसला किया।

    दिल्ली का रास्ता लखनऊ से जाता है!

    दिल्ली का रास्ता लखनऊ से जाता है!

    यह राजनीति में सबसे लोकप्रिय कहावत है कि 'दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है'। ट्विटर पर अपने बायो में 'भारत के समाजवादी नेता' लिखने वाले अखिलेश भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि सपा की राह यूपी में बनी रहेगी, तभी दिल्ली की राह पर चलना, पहुंचना और प्रभाव बनाए रखना संभव होगा। चुनाव दर चुनाव संसद में सपा की हिस्सेदारी कम होती जा रही है। एक सांसद के रूप में भी अखिलेश यादव की संसद में उपस्थिति और गतिविधि बहुत कम रही है। वहां उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे भी यूपी से जुड़े रहे।

    अखिलेश पर लगा था निष्क्रियता का आरोप

    अखिलेश पर लगा था निष्क्रियता का आरोप

    विपक्ष के चेहरे के तौर पर अखिलेश को 'निष्क्रियता' के सबसे बड़े आरोप का सामना करना पड़ा। समाजवादी साइकिल यात्रा के माध्यम से माहौल बनाकर 2010-11 में सत्ता में आए अखिलेश 2017 में सत्ता से बाहर होने पर सड़क काटते हुए देखे गए थे। गठबंधन के विफल प्रयोगों के बीच सड़क पर उनकी उपस्थिति सार्वजनिक मुद्दों पर प्रतीकात्मक थी। उनके 'निर्देशों' पर प्रतिनिधिमंडल के आंदोलन की औपचारिकताएं निश्चित रूप से बनी रहीं। लखीमपुर कांड के बाद अखिलेश सड़क पर जरूर उतरे और उन्हें हिरासत में ले लिया गया, लेकिन मुलायम सिंह के नेतृत्व में विपक्ष में रहते हुए सपा जिस संघर्ष के लिए जानी जाती थी, वह नदारद थी।

    अखिलेश के रहने से कार्यकर्ताओं का बढ़ेगा मनोबल

    अखिलेश के रहने से कार्यकर्ताओं का बढ़ेगा मनोबल

    अखिलेश के इस्तीफे के बाद समाजवादी पार्टी महिला मोर्चा की अध्यक्ष जूही सिंह ने ट्वीट किया, 'राष्ट्रीय अध्यक्ष जी यूपी विधानसभा में मजबूती से हमारा नेतृत्व करेंगे.' दरअसल, सक्रिय और मजबूत नेतृत्व पार्टी के लिए बुनियादी शर्त बन गया है। हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सत्ता की बिखरती उम्मीदों के बाद प्रासंगिक बने रहने के लिए। पार्टी को उम्मीद है कि अखिलेश विधानसभा में रहकर सरकार से सीधे संवाद करेंगे तो कार्यकर्ताओं का मनोबल भी मजबूत होगा और जनता की पैठ के जरिए सत्ता की बची हुई उम्मीदों को कायम रखना आसान होगा।

    पार्टी के कोर वोटरों को छिटकने से बचाना असली मकसद

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    पार्टी को उम्मीद है कि अखिलेश पुरानी भूमिका में लौट सकते हैं। सदन से सड़क तक अपनी उपस्थिति बढ़ाने से 2024 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2027 के विधानसभा चुनाव तक की तैयारियां सुचारू हो जाएंगी। अखिलेश के पिता मुलायम और चाचा शिवपाल ने भी नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई है। अगर अखिलेश खुद उनका नेतृत्व करेंगे तो पार्टी के कोर वोटरों को भी उम्मीद होगी और वे नए विकल्प नहीं तलाशेंगे। गठबंधन और पार्टी के बीच अनबन की आशंका भी कमजोर होगी। अखिलेश की सक्रियता संगठन को नीचे तक सक्रिय करेगी। कांग्रेस की पस्त जमीन और बसपा की खाली जगह के बीच अगर अखिलेश जमीन पर पसीना बहाते नजर आएंगे तो उनके लिए विस्तार की संभावनाएं प्रबल होंगी।

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