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सभी राजनीतिक दलों के लिए क्यों खास बन गए संत रविदास, करोलबाग से काशी तक क्यों मची होड़

लखनऊ, 17 फरवरी: यूपी और पंजाब समेत पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। लेकिन हम बात करेंगे यूपी और पंजाब की सियासत की। यूं तो माघी पूर्णिमा को हर साल एक खास दिन के तौर पर मनाया जाता है, लेकिन 2022 की माघी पूर्णिमा का दिन कुछ ज्यादा ही खास था। सोशल मीडिया पर तीन तस्वीरें वायरल हुईं। पहली तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के करोल बाग स्थित श्री गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर में महिलाओं के साथ झांझ बजाते हुए शबद कीर्तन कर रहे थे। दूसरी तस्वीर काशी में स्थित संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की उत्पत्ति 'सीर गोवर्धन' से हुई, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंगर में जमीन पर बैठकर प्रसाद ले रहे थे और तीसरी तस्वीर पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की थी जो रविदास मंदिर में पूजा-अर्चना करने पहुंचे थे। दरअसल इन तीनों तस्वीरों के अपने सियासी मायने भी हैं। आइए हम बताते हैं कि आखिरकार संत रविदास अचानक से राजनीतिक दलों के लिए इतने खास क्यों हो गए।

आखिर संत रविदास इतने महत्वपूर्ण क्यों और कैसे हो गए?

आखिर संत रविदास इतने महत्वपूर्ण क्यों और कैसे हो गए?

संत शिरोमणि गुरु रविदास का जन्म माघी पूर्णिमा के दिन 1376 ई. में वाराणसी के गोवर्धनपुर गांव में हुआ था। संयोग से यह तिथि इस बार पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की हलचल के बीच पड़ रही है। बड़े मतदाता समूह में अपनी पैठ जमाने के लिए नेता रविदास के मंदिरों में पूजा-अर्चना करने पहुंचे। करोलबाग से काशी तक पीएम, सीएम या अन्य नेताओं में होड़ मच गई। वैसे तो संत रविदास के भक्त पूरी दुनिया में फैले हुए हैं, लेकिन पंजाब में सबसे ज्यादा है। बताया जाता है कि दोआबा क्षेत्र में रैदासियों की बड़ी संख्या है। दूसरा, संत रविदास जी के लगभग 40 छंदों को भी सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ "गुरु ग्रंथ साहिब" में शामिल किया गया है। यही वजह रही कि जब 14 फरवरी को पंजाब में चुनाव की तारीख का ऐलान हुआ तो पंजाब के सीएम चन्नी ने चुनाव आयोग से रैदास जयंती को लेकर चुनाव की तारीख बदलने की मांग की थी। संत रविदास की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव आयोग ने मतदान की तारीख 14 फरवरी से बदलकर 20 फरवरी कर दी थी। क्या था नेताओं को मौका मिला और इस दिन को एक बड़े आयोजन के रूप में पेश करने लगे।

करोलबाग से पठानकोट पहुंचे थे मोदी

करोलबाग से पठानकोट पहुंचे थे मोदी

करोलबाग के श्री गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर में झांझ बजाने के बाद पीएम मोदी सीधे पठानकोट में चुनावी सभा करने गए। संत रविवदास के दोहे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी भी संत रविदास जी के शब्दों का पालन करती है। सबका साथ सबका विकास के मंत्र से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रहा है। इसी तरह से सीएम चन्नी हों, अरविंद केजरीवाल हों, सीएम योगी हों, मायावती हों या फिर सपा नेता अखिलेश यादव, सभी अपने-अपने तरीके से पंजाब और यूपी चुनाव में मतदाताओं को संत रविदास के नक्शेकदम पर चलने का संदेश दे रहे थे।

पंजाब की 117 में से 98 सीटों पर दलितों का असर

पंजाब की 117 में से 98 सीटों पर दलितों का असर

कहा जा रहा है कि चुनावी इतिहास में पहली बार दलित मतदाताओं को दलित मुख्यमंत्री चुनने का मौका मिला है। पंजाब में हर तीसरा मतदाता दलित है। इसलिए 2022 के पंजाब चुनाव में कांग्रेस के चरणजीत सिंह चन्नी अन्य राजनीतिक दलों के लिए मुख्य चुनौती बनकर उभरे हैं। निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब की 117 सीटों में से 98 में 20 फीसदी से लेकर 49 फीसदी तक दलित मतदाता हैं। दूसरे तरीके से बात करें तो पंजाब की 117 में से 34 सीटें यानी एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। खास बात यह है कि इन आरक्षित सीटों पर भी आठ सीटें ऐसी हैं जहां 40 फीसदी से ज्यादा दलित मतदाता हैं।

यूपी में क्या है दलित मतदाताओं का समीकरण

यूपी में क्या है दलित मतदाताओं का समीकरण

क्या उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय अपने नए राजनीतिक आधार की तलाश में है? यही वह सवाल है जिसके पीछे सभी राजनीतिक दल भाग रहे हैं और इस समय से चुनाव की तारीखों के बीच में संत रविदास की जयंती का अवसर आया, इसलिए हर राजनीतिक दल इस अवसर को जाने नहीं देना चाहता है। 2014 के चुनावों में मायावती का शून्य और भाजपा और उसके सहयोगियों का 80 में से 73 सीटें जीतना, कम से कम यह दर्शाता है कि दलित समुदाय के वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा बसपा से भाजपा में स्थानांतरित हो गया है।

यूपी के चुनाव में काफी अहम हैं दलित

यूपी के चुनाव में काफी अहम हैं दलित

2017 के चुनावों में बसपा के 19 सीटों पर सिमटने के बाद, यह अधिक निश्चितता के साथ कहा गया कि दलित वोट अब बसपा में नहीं रहा। यूपी की दलित आबादी में हमारी हिस्सेदारी है तो राज्य में करीब 21 फीसदी दलित वोटर हैं, लेकिन ये सब मायावती की बसपा का वोट बैंक नहीं है। दलितों में कई उपजातियां हैं, जिनमें जाटवों की संख्या लगभग 55 प्रतिशत है। कहने का मतलब यह है कि जाटव बहुसंख्यक हैं और मायावती इसी जाटव समुदाय की हैं। इसके अलावा पासी में 16 फीसदी, कनौजिया व धोबी में 16 फीसदी, कोल में 4.5 फीसदी, वाल्मीकि में 1.3 फीसदी और खटीक में 1.2 फीसदी के करीब है।

सुरक्षित सीटों में छिपी है जीत की कुंजी

सुरक्षित सीटों में छिपी है जीत की कुंजी

सीतापुर, रायबरेली, हरदोई और इलाहाबाद में पासी समुदाय का प्रभाव है। जबकि बरेली, सुल्तानपुर और गाजियाबाद में धोबी व वाल्मीकि समाज का प्रभाव अधिक है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों की तुलना करें तो आप पाएंगे कि जिस पार्टी ने सबसे अधिक आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की, उसने सरकार बनाई। 2007 में बसपा ने कुल 89 आरक्षित सीटों में से 61 पर जीत हासिल की थी और 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इसी तरह, 2012 के चुनावों में, सपा ने आरक्षित 85 सीटों में से 59 पर जीत हासिल की थी और कुल 224 सीटों पर जीत हासिल करते हुए पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। 2017 की बात करें तो पिछले सभी रिकॉर्ड को तोड़ते हुए बीजेपी ने कुल आरक्षित 84 सीटों में से 70 सीटें जीती थीं और 312 सीटें जीतकर दो तिहाई से ज्यादा बहुमत से सरकार बनाई थी। इस चुनाव में बीजेपी की नजर मायावती के जाटव समुदाय को भी लुभाने पर है। इसलिए बड़ी संख्या में जाटव उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया है। समाजवादी पार्टी भी इस दौर में पीछे नहीं है।

किसे मिलेगा संत रविदास का आशीर्वाद

किसे मिलेगा संत रविदास का आशीर्वाद

बहरहाल, पंजाब हो या उत्तर प्रदेश, दोनों ही राज्यों में संत रविदास को केंद्र में रखते हुए उनके पक्ष में बना वोट बैंक का समीकरण चुनाव लड़ने वाली तमाम बड़ी पार्टियों के लिए जिंदगी और मौत का सवाल बन गया है। ऐसे में राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए संत शिरोमणि रविदास जी की जयंती किसी वरदान से कम नहीं है। शायद यही कारण है कि इस मौके पर जहां चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब से सुबह चार बजे चलकर काशी शहर के रविदास मंदिर पहुंचे और पूजा अर्चना करने से नहीं हिचके वहीं पीएम मोदी श्री गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर पहुंचे। दिल्ली में और कीर्तन में महिलाओं के साथ झांझ बजाया। वह मतदाताओं को रिझाने के लिए सीधे पंजाब गए। यूपी के बाकी पांच चरणों के चुनाव में दलित मतदाताओं को लुभाने के लिए सीएम योगी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी अपने-अपने तरीके से संत रविदास को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि 10 मार्च 2022 का जनादेश यह बताएगा कि पंजाब और उत्तर प्रदेश में किस पार्टी को संत रविदास का आशीर्वाद किस रूप में मिलता है।

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