क्यों यूपी चुनाव से पहले ही निकल रही है अखिलेश यादव के सबसे बड़े दावे की हवा ?

लखनऊ, 23 नवंबर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का नारा है- 22 में बाइसिकल। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव शुरू से 403 में से 400 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं। 2017 में बीजेपी ने 384 सीटों पर लड़कर 312 सीटें जीत ली थीं और तब सत्ता में रहते हुए भी सपा, कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद 47 सीटें ही जीत पाई थी। इस बार समाजवादी पार्टी ने किसी बड़े दल के साथ गठबंधन तो नहीं किया है, लेकिन कई छोटी-छोटी पार्टियों के साथ तालमेल करके बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग वाले फॉर्मूले को आजमाने की कोशिश जरूर कर रही है। पार्टी का भागीदारी संकल्प मोर्चा और राष्ट्रीय लोकदल के साथ तो गठबंधन तय है और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी-लोहिया के साथ भी चर्चा चल रही है।

यूपी चुनाव में सपा के सहयोगी कौन हैं ?

यूपी चुनाव में सपा के सहयोगी कौन हैं ?

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की अगुवाई वाले भागीदारी संकल्प मोर्चा के बीच गठबंधन का ऐलान हो चुका है। सपा सूत्रों के मुताबिक जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोक दल और शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी-लोहिया के साथ भी बातचीत आखिरी दौर में है। भागीदारी संकल्प मोर्चा ने पहले एआईएमआईएम के साथ गठबंधन की घोषणा की थी। इस मोर्चे में ओम प्रकाश राजभर की पार्टी (सुभासपा) के अलावा राष्ट्रीय उदय पार्टी (बाबूराम पाल), भागीदारी पार्टी-पी (प्रेम चंद प्रजापति), राष्ट्रीय उन्नति पार्टी (अनिल सिंह चौहान), बंजारा महासभा (सतीश चंद्र बंजारा), खंगार महासभा (गुलाब सिंह खंगार), अर्कवंशी महासंघ (सुनील अर्कवंशी), दलित महासंघ (हीरा पासवान), कश्यप सेना महासंघ (प्रेम चंद्र कश्यप) और उपेक्षित समाज पार्टी (राजकुमार बारी) भी शामिल हैं।

सपा से कौन कितनी सीटें मांग रहा है ?

सपा से कौन कितनी सीटें मांग रहा है ?

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के एक नेता ने टीओआई से कहा है कि उनकी पार्टी चुनाव लड़ने के लिए 22 सीटें चाहती है और उनके मोर्चे की 35 सीटों की मांग है। बता दें कि 2017 में ओपी राजभर की पार्टी को भाजपा से गठबंधन के तहत सिर्फ 8 सीटें ही मिली थीं और पार्टी ने 50 फीसदी स्ट्राइक रेट से आधी सीटें जीत गई थी। इसलिए राजभर सीटों के मामले में इस बार ज्यादा झुकने के लिए तैयार होंगे, यह मुश्किल है। उधर आरएलडी के नेता नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर कह रहे हैं कि तालमेल को लेकर चर्चा जारी है। जयंत चौधरी की पार्टी सपा के सामने 50 सीटों की मांग रख रही है, जबकि अभी तक उसे सिर्फ 35 सीटें देने में आपत्ति नहीं हो रही है। इन सबका चुनावी लक्ष्य अभी सिर्फ एक ही है- 'बीजेपी को हराना है।'

शिवपाल कितनी सीटें मांग रहे हैं ?

शिवपाल कितनी सीटें मांग रहे हैं ?

उधर उम्मीद थी की सपा संस्थापक मुलायम सिंह के जन्मदिन पर सोमवार को चाचा (शिवपाल यादव)-भतीजे (अखिलेश यादव) में कोई न कोई चुनावी डील जरूर हो जाएगी। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। अखिलेश यादव अबतक चाचा को ज्यादा भाव नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन चाचा कभी अपनी 'सियासी मूंछों पर ताव' दे रहे हैं तो कभी समाजवादी पार्टी के लिए किए गिए 'राजनीतिक त्याग' याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। इटावा जिले के अपने पैतृक गांव सैफई में शिवपाल ने सपा में अपनी पार्टी के विलय को लेकर जो ख्वाहिश जाहिर की है, वह अखिलेश यादव को अपने इरादों पर नए तरीके से सोचने को मजबूर कर सकता है। शिवपाल ने कहा है, 'हम अपने समर्थकों के लिए 100 सीटें चाहते हैं, लेकिन अब हम पीछे हट चुके हैं।......' इसके आगे वे कहते हैं कि 'समाजवादी पार्टी को 303 सीटों पर लड़ना चाहिए। अगर पीएसपीए-एल उसे मिली सिर्फ 50 सीटें भी जीत जाती है, तभी 2022 में हम सरकार बना पाएंगे।'

अखिलेश यादव के सबसे बड़े दावे का क्या होगा ?

अखिलेश यादव के सबसे बड़े दावे का क्या होगा ?

इस तरह से समाजवादी पार्टी की सहयोगी पार्टियां उससे तालमेल के तहत जितनी सीटें मांग रही हैं, मोटे तौर पर उसका आंकड़ा बनता है- 35+50+100=185. शिवपाल पहले से ही तोलमोल के मोड में हैं। फिर भी अगर अखिलेश यादव किसी तरह भागीदारी संकल्प मोर्चा को 22, आरएलडी को 35 और पीएसपीए-एल को उसकी मांग से काफी कम सीटों पर भी राजी कर पाए तो भी उन्हें लगभग 100 सीटें सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ सकती हैं। शायद शिवपाल ने उन्हें 303 सीटों पर लड़ने की सलाह देकर इसी की ओर इशारा करने की कोशिश की है। अगर ऐसा हुआ तो सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के उस बड़े दावे का क्या होगा, जो यूपी में अपनी पार्टी की बड़ी जीत को लेकर वे करते आए हैं। वे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के 400 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं। पिछले चुनाव में भी सपा ने सिर्फ 311 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारे थे और 25 सीटों पर इसके प्रत्याशियों की जमानतें नहीं बच पाई थी।

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