यूपी में अखिलेश यादव के लिए क्यों जरूरी हुए बसपा के संस्थापक कांशीराम ?
यूपी में अखिलेश यादव दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की ताक में जुटे हैं। उनके सामने निकाय चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव है। अगर बसपा के वोट में सेंध लगा पाए तो उन्हें फायदा मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब दलितों के नेता और बीएसपी के संस्थापक कांशीराम का चेहरा समाजवादी पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण हो गया है। अखिलेश यादव ने सोमवार को उनकी एक आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया है। दरअसल, पिछले कुछ समय से सपा नेता लगातार दलितों के प्रतिया सियासी प्रेम जाहिर करने की कोशिश कर रहे हैं। अचानक कांशीराम के प्रति इतना सम्मान जाहिर करना पहली घटना नहीं है। वे लगातार ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिसने बीएसपी सुप्रीमो मायावती को भी बेचैन कर रखा है।

अखिलेश ने किया कांशीराम की प्रतिमा का अनावरण
उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी पार्टी सपा पिछले कुछ समय से लगातार दलितों को साधने की कोशिशों में जुटी हुई है। अखिलेश यादव की नई राजनीति में जन्मे दलित प्रेम का क्लाइमेक्स सोमवार को रायबरेली के ऊंचाहार में देखने को मिला, जहां उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की प्रतिमा का अनावरण किया। आगे बढ़ने से पहले कांशीराम की इस प्रतिमा का बैकग्राउंड जान लेना जरूरी है। यह प्रतिमा सपा नेता स्वामी प्रसाद मॉर्य के एक कॉलेज के परिसर में स्थापित की गई है, जो खुद बसपा और भाजपा में सत्ता सुख भोगते हुए पिछले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे।

सपा के लिए क्यों जरूरी हुए बसपा के संस्थापक कांशीराम ?
उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक पर बसपा अपना एकाधिकार मानती रही है। लेकिन, पिछले विधानसभा चुनावों से समाजवादी पार्टी की ओर से लगातार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि बीएसपी सुप्रीमो अब जुझारू तरीके से राजनीति नहीं कर पा रही हैं। दलितों को पार्टी के साथ जोड़ने की कोशिश समाजवादी पार्टी पिछले विधानसभा चुनावों से ही शुरू कर चुकी है। तभी से उसने मंच पर दलितों के मसीहा बाबा साहेब अंबेडकर की प्रतिमा रखने का सिलसिला शुरू किया था। फिर पार्टी बाबा साहब वाहिनी भी बनाई, जो पार्टी का फ्रंटल दलित ऑर्गेनाइजेशन होगा। पिछले कुछ समय से स्वामी प्रसाद मौर्य ने शूद्रों के नाम पर दलितों को भी साधने का प्रयास शुरू किया है। यही नहीं पार्टी के 9 बार के दलित विधायक अवधेश प्रसाद को विधानसभा में अखिलेश अपनी बगल की सीट देकर भी अपनी मंशा साफ कर चुके हैं कि वह लंबी राजनीति की तैयारी कर रहे हैं।

गैर-जाटव युवा वोटरों पर अखिलेश की नजर
उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी 20% से अधिक मानी जाती है। इसमें भी जाटव समाज सबसे ज्यादा प्रभावशाली और ज्यादा जनसंख्या में है। बाकी गैर-जाटव दलित जातियां है। बीएसपी अध्यक्ष मायावती भी जाटव हैं। दरअसल, सपा गैर-जाटव दलित वोट बैंक को लुभाने की कोशिशों में ही लगी हुई है। इस वोट बैंक पर भाजपा की भी नजर है और पिछले कम से कम तीन चुनावों 2017, 2019 और 2022 में उसे इसका फायदा भी मिलने की बात कही जाती है। अब अखिलेश यादव भी दलितों के युवा वर्ग को साधने की कोशिश कर रहे है। यही वजह है कि पार्टी मायावती को सीधे टारगेट करने से बच रही है। क्योंकि, ऐसा करने पर उसे नुकसान की आशंका है। लेकिन, वह कहीं न कहीं यह संदेश देने की कोशिश जरूर कर रही है कि माया ने बीजेपी-आरएसएस के सामने सरेंडर कर दिया है! सपा के एक प्रवक्ता अमीक जमेई ने एक न्यूज चैनल से कहा भी है कि 'निकाय चुनाव में बीजेपी की हालत खराब है, इसलिए उसने बहन जी को आगे कर दिया है।'
Recommended Video

अखिलेश के कांशीराम प्रेम से मायावती चिंतित
उधर मायावती को जैसे ही मालूम हुआ कि अखिलेश यादव अब उनके राजनीतिक गुरु के नाम पर राजनीति करने की ताक में हैं, वह काफी परेशान हो गईं। मायावाती दावे करने लगी हैं कि दलित समाज चट्टान के साथ बीएसपी और मूवमेंट के साथ खड़ा है। उनका दावा है कि असल में सपा की ही जनाधार खिसकने लगी है, इसलिए प्रदेश में बीजेपी मजबूत हुई है। उन्होंने अपनी पार्टी के समर्थकों से दुष्प्रचारों और हथकंडों से बचने को भी कहा है। उनका आरोप है कि सपा के कार्यकाल में कांशीराम के नाम पर बने जिले का नाम बदलकर कासगंज कर दिया गया। उनके नाम पर जो उर्दू फारसी यूनिवर्सिटी थी, उसे भी ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के नाम किया गया। यहां तक कि जब उनका निधन हुआ तो एक दिन का राजकीय शोख तक घोषित नहीं किया। ऊपर से संसद में प्रमोशन में आरक्षण का विरोध किया सो अलग।

निकाय चुनाव से लेकर 2024 तक की तैयारी
यूपी में अभी निकाय चुनाव होने हैं। अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाला है। अखिलेश यादव की पार्टी जो जातिगत समीकरण बनाने की कोशिश में है, उसमें उन्हें लगता है कि यादव और मुसलमान तो उनके साथ हैं ही। जयंत चौधरी के साथ होने से जाट समाज का भी एक तबका उनके साथ जुड़ रहा है, जो कि प्रदेश में ओबीसी में ही आते हैं। अगर गैर-जाटव युवा वोट बैंक में भी कांशीराम के नाम पर सेंध लगा सके तो दोनों चुनावों में उनकी राजनीतिक दाल काफी हद तक गल सकती है। क्योंकि, सपा मानकर चल रही है कि दलितों में युवाओं का एक वर्ग है, जो भारतीय जनता पार्टी से खुश नहीं है। भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर से दोस्ती भी उसी रणनीति का हिस्सा है।
-
Delhi Riots: जिसने पूरी जिंदगी ईर्ष्या की, उसी के निकाह में 6 साल जेल काटकर पहुंचे Sharjeel Imam, दूल्हा कौन? -
Iran Vs America War: अमेरिका ने किया सरेंडर! अचानक ईरान से युद्ध खत्म करने का किया ऐलान और फिर पलटे ट्रंप -
'मेरे साथ गलत किया', Monalisa की शादी मामले में नया मोड़, डायरेक्टर सनोज मिश्रा पर लगा सनसनीखेज आरोप -
Silver Rate Today: चांदी में हाहाकार! 13,606 रुपये की भारी गिरावट, 100 ग्राम से 1 किलो की कीमत जान लीजिए -
Gold Silver Rate Crash: सोना ₹13,000 और चांदी ₹30,000 सस्ती, क्या यही है खरीदारी का समय? आज के ताजा रेट -
ईरान का गायब सुप्रीम लीडर! जिंदा है या सच में मर गया? मोजतबा खामेनेई क्यों नहीं आ रहा सामने, IRGC चला रहे देश? -
Gold Rate Today: ईरान जंग के बीच धराशायी हुआ सोना! 13,000 सस्ता, 18K और 22k गोल्ड की ये है कीमत -
Strait of Hormuz में आधी रात को भारतीय जहाज का किसने दिया साथ? हमले के डर से तैयार थे लाइफ राफ्ट -
Rupali Chakankar कौन हैं? दुष्कर्म के आरोपी ज्योतिषी के कहने पर काट ली थी उंगली! संभाल रहीं थीं महिला आयोग -
Love Story: बंगाल की इस खूबसूरत नेता का 7 साल तक चला चक्कर, पति है फेमस निर्माता, कहां हुई थी पहली मुलाकात? -
Ravindra Kaushik Wife: भारत का वो जासूस, जिसने PAK सेना के अफसर की बेटी से लड़ाया इश्क, Viral फोटो का सच क्या? -
Uttar Pradesh Gold Price: यूपी में आज 22K-18K सोने का भाव क्या? Lucknow समेत 9 शहरों में कितना गिरा रेट?












Click it and Unblock the Notifications