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UP चुनाव में क्यों फेल हो गए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू, जानिए बड़ी वजहें

लखनऊ, 19 मार्च: उत्तर प्रदेश में चुनाव सम्पन्न होने के बाद अब सभी पार्टियों में समीक्षा का दौर शुरू हो गया है। कई जगहों पर गाज भी गिरनी शुरू हो गई है। इस बीच कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने भी प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफे के बाद अब यूपी कांग्रेस में कई सिरे से आवाज उठने लगी है। राजनीतिक पंडितों की माने तो दरअसल अजय लल्लू को एक ओबीसी चेहरे के तौर पर कमान सौंपी गई थी लेकिन चुनाव में कांग्रेस को इसका कोई फायदा नहीं मिला। एक तरफ जहां अब पार्टी 2024 को ध्यान में रखते हुए अपनी नई रणनीति पर विचार करेगी वहीं दूसरी ओर हम जानने की कोशिश करते हैं कि ऐसी कौन सी वजहें रहीं जिसकी वजह से अजय लल्लू असफल साबित हुए और संगठन चलाने में उनके सामने कौन सी चुनौतियां पेश आईं।

प्रियंका की छाया से बाहर नहीं निकल पाए लल्लू

प्रियंका की छाया से बाहर नहीं निकल पाए लल्लू

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू यूं तो प्रदेश अध्यक्ष थे लेकिन यूपी में अपने नाम पर करने के लिए उनके पास कुछ नहीं था। सारे फैसले दिल्ली से लिए जा रहे थे। ये आरोप कई नेताओं ने भी लगाया है कि लल्लू प्रदेश अध्यक्ष तो थे लेकिन पार्टी दिल्ली से चल रही थी। अब दिल्ली से पार्टी कौन चला रहा था यह तो जगजाहिर है। दरअसल कांग्रेस की एक परंपरा है कि यहां जो काई भी प्रदेश अध्यक्ष बनता है वह एक तरह से कठपुतली की तरह ही होता है। उसी तरह लल्लू भी थे। पूरे चुनाव में अजय कुमार लल्लू चाहकर भी प्रियंका गांधी की छाया से बाहर निकलकर कांग्रेस के लिए काम नहीं कर पाए। इसका नतीजा उन्हें चुनाव में हार के बाद इस्तीफे के तौर पर भुगतना पड़ा।

संघर्ष किए लेकिन कार्यकर्ता मोबलाइज नहीं हुआ

संघर्ष किए लेकिन कार्यकर्ता मोबलाइज नहीं हुआ

यूपी में कांग्रेस के कार्यकर्ता इस बार सड़कों पर संघर्ष तो किए लेकिन चुनाव के दौरान उनका मोबलाइजेशन नहीं हो पाया। एक तो उनके पास संगठन कमजोर था लेकिन प्रियंका का दावा था कि हर जिले में कार्यकर्ताओं की बड़ी टीम खड़ी की गई है लेकिन चुनाव में वह टीम गायब दिखायी दी। अजय कुमार लल्लू संगठन का काम देखने की बजाए प्रियंका के इर्द गिर्द ही मंडराते रहे। शायद उन्हें इस बात का एहसास था कि यदि वो प्रियंका की चरण बंदना करेंगे तो चुनाव में हार के बाद भी उनकी कुर्सी बरकरार रहेगी लेकिन चुनाव बााद इसका उल्टा हुआ। हार का सारा ठीकरा लल्लू पर फोड़कर इस्तीफा ले लिया गया। कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि टिकटों का सही वितरण नहीं हो पाया जिसकी वजह से कांग्रेस को हार झेलनी पड़ी है।

यूपी में ओबीसी चेहरे के तौर पर असफल हुए लल्लू

यूपी में ओबीसी चेहरे के तौर पर असफल हुए लल्लू

प्रियंका गांधी ने जब अजय कुमार लल्लू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था तो उन्हें एक ओबीसी नेता समझकर यह कुर्सी दी गई थी। लेकिन लल्लू अपने आपको एक ओबीसी चेहरा बनाने में कामयाब नहीं हुए। एक तरफ जहां विरोधी पार्टियां हर वर्ग औ समुदाय को ध्यान में रखते हुए लीडर तैयार करने में जुटे हैं वहीं दूसरी ओर कांग्रेस सिर्फ लल्लू पर भरोसा किए रही। कई लोग चुनाव से पहले ही हवा कर रुख भांपकर सपा के हो लिए। अजय कुमार लल्लू का सियासी कद उतना बड़ा नहीं था जिससे कांग्रेस को फायदा मिलता। राजनीतिक पंडितों की माने तो कांग्रेस को चेहरों की तलाश तो करनी ही पड़ेगी। बिना जातिगत चेहरों के आभाव में कांग्रेस को यूपी में सफलता नहीं मिल सकती है।

कांग्रेस के अंदर भी लल्लू के खिलाफ जमकर हुई गुटबाजी

कांग्रेस के अंदर भी लल्लू के खिलाफ जमकर हुई गुटबाजी

चुनाव में अजय कुमार लल्लू चौतरफा घिरे हुए थे। एक तरफ जहां वह दिल्ली के आकाओं के इशारे पर फैसले ले रहे थे तो दूसरी ओर उन्हें स्थानीय गुटबाजी से भी जूझना पड़ रहा था। अंदरखाने एक ऐसा धड़ा था जो लल्लू को कमजोर करने में लगा हुआ था। लल्लू के पास अपनी कोई टीम नहीं थी। अगर गौर करें तो बीजेपी जेसी राष्ट्रीय पार्टी में जब प्रदेश अध्यक्ष बदला जाता है तो वह बूथ स्तर पर अपनी टीम बनाता है और उस हिसाब से अपनी रणनीति को अंजाम देता है लेकिन कांग्रेस में ऐसा कुछ नहीं था। लल्लू अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर पाए। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनके पास अपनी कोई टीम नहीं थी जो उनकी रणनीति को आगे बढ़ाती।

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