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नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर दो धड़ों में क्यों बंटी BJP,लोकसभा चुनाव का ट्रेंड रहेगा बरकरार या होगा नया प्रयोग

लखनऊ, 7 मई: उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP को सरकार बने एक महीने से अधिक समय हो गया है। लेकिन पार्टी को अभी अपना नया प्रदेश अध्यक्ष नहीं चुन पाई है। प्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संगठन में भी दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष होने के अलावा योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में मंत्री हैं। हालांकि पार्टी में एक व्यक्ति और एक पद का फॉर्मूला लागू है। बताया जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष को लेकर कई नामों पर मंथन चल रहा है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में प्रदेश अध्यक्ष पद पर ब्राह्मण को कमान सौंपी गई और पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बसपा के दलित वोट बैंक में भी सेंध लगा दी। इस वजह से अब पार्टी दलित और ब्राह्मण समीकरण के बीच उलझी हुई है।

बीजेपी

नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ ही नए चेहरों को मिलेगी संगठन में जगह

दरअसल 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं और बीजेपी ने विधानसभा और विधान परिषद चुनाव में जीत का झंडा फहराया है। पार्टी ने मिशन-2024 की तैयारी शुरू कर दी है। शासन स्तर पर तैयारी शुरू हो गई है। जबकि संगठन इस मामले में पिछड़ रहा है। क्योंकि राज्य में संगठन की कमान किसी नए नेता को नहीं सौंपी गई है। जिससे नई टीम का गठन नहीं हो सका। क्योंकि संगठन के कुछ नेताओं को योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में शामिल किया गया था। जिससे नए नेताओं को इन पदों पर जिम्मेदारी देनी पड़ रही है। लेकिन पार्टी इस समय जातिगत समीकरणों में उलझी हुई है। चर्चा है कि नए अध्यक्ष के साथ-साथ नए चेहरों को भी संगठन में जगह दी जाएगी।

जातीय समीकरण के गणित में उलझी भाजपा

दरअसल, विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की है और पार्टी राज्य में सरकार बनाने में सफल रही है। अब लोकसभा चुनाव पार्टी के सामने हैं और सरकार और संगठन के 2014 और 2019 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। इसके लिए पार्टी को अब नए सिरे से जातिगत समीकरण तैयार करने होंगे तो अब यह भी चर्चा हो रही है कि किस जाति वर्ग से प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ा और पार्टी को सफलता मिली। लेकिन अब पार्टी चाहती है कि संगठन की कमान किसी नए नेता को मिले। पार्टी का एक धड़ा राज्य की कमान ब्राह्मणों को और दूसरा दलितों को देने की वकालत कर रहा है।

लक्ष्मीकांत वाजपेयी

क्या लोकसभा चुनाव का फार्मूला ही चलेगा

पार्टी का एक धड़ा इस बात की वकालत कर रहा है कि बीजेपी में अगला प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण ही होना चाहिए। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि ब्राह्मण चेहरा देकर बीजेपी पिछले दो लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन कर चुकी है। पिछले रिकॉर्ड पर गौर करें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी थे और उस समय बीजेपी को रिकॉर्डतोड़ सफलता मिली थी वहीं दूसरी बार 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की कमान महेंद्र नाथ पांडेय के हाथ में थी और उस समय भी बीजेपी को 60 से ज्यादा सीटें मिली थीं।

दलित वोट बैंक में सेंधमारी से उत्साहित है बीजेपी

पिछले दो लोकसभा चुनावों में देखा जाए तो राज्य के संगठन की कमान ब्राह्मण नेता के पास रही है और तमाम राजनीतिक मुश्किलों के बीच पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। इसलिए इस बार भी ब्राह्मण को पद देकर पुराने सफल सूत्र की वकालत की जा रही है। वहीं पार्टी के एक धड़े का मानना ​​है कि विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट बीजेपी की तरफ गया है। इसलिए किसी दलित नेता को संगठन का मुखिया बनाया जाना चाहिए। विधानसभा चुनाव में आगरा और उसके आसपास के इलाकों में बीजेपी को दलित वोट मिले हैं ऐसा पार्टी का कहना है। बताया जा रहा है कि दलितों में पैठ बनाने के लिए ही बीजेपी ने संघ के इशारे पर अपना काम और तेज कर दिया है। दलितों का वोट मिलने का इनाम भी बीजेपी को मिला था और दलित समुदाय के दो चेहरों असीम अरूण और बेबीरानी मौर्या को कैबिनेट में जगह दी गई थी।

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