कौन हैं रेवती रमण सिंह? जिनके अखिलेश के सामने पैर-पर पैर चढ़ाकर बैठने को लेकर मचा हंगामा, खोजने लगे लोग जाति!
Revati Raman Singh: समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हाल ही में प्रयागराज के अशोक नगर स्थित बीनांचल कोठी पहुंचे थे। वहां उन्होंने वरिष्ठ राजनेता कुंवर रेवती रमण सिंह से मुलाकात की और साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर रणनीति पर बात की। लेकिन इस मुलाकात की जो तस्वीर बाहर आई, उसने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
तस्वीर में कुंवर रेवती रमण सिंह आराम से स्टूल पर पैर-पर-पैर चढ़ाकर बैठे हैं, जबकि सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनके ठीक सामने सोफे पर बैठकर चर्चा कर रहे हैं। इस अंदाज को लेकर इंटरनेट पर दो गुट बन गए हैं और लोग अब गूगल पर रेवती रमण सिंह का इतिहास और उनकी जाति खंगालने में जुट गए हैं। ऐसे में आइए जानें सोशल मीडिया पर क्या बहस चल रही है और रेवती रमण सिंह कौन हैं।

रेवती रमण सिंह समाजवादी राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने पार्टी के शुरुआती दौर से लेकर लंबे समय तक संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। वह लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों के सदस्य रह चुके हैं और मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी नेताओं में उनकी पहचान रही है।
सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव-रेवती रमण सिंह की तस्वीर को लेकर क्यों छिड़ा है विवाद
इस तस्वीर के सामने आते ही सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई है। समाज का एक धड़ा इसे सामंती और मनुवादी सोच से जोड़कर देख रहा है। लोगों का कहना है कि रेवती रमण सिंह ने जानबूझकर अखिलेश यादव को नीचा दिखाने या उनका अपमान करने के लिए मेज पर पैर रखकर बैठने का यह तरीका चुना। वहीं दूसरी तरफ, एक बड़ा वर्ग इस तर्क के खिलाफ खड़ा है।
जमीनी हकीकत और उनके करीबियों की मानें तो रेवती रमण सिंह की उम्र 80 साल से ज्यादा (करीब 82 वर्ष) हो चुकी है और वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे हैं। बीमारी की वजह से वे पैर नीचे लटकाकर ज्यादा देर नहीं बैठ सकते, इसलिए डॉक्टरों की सलाह पर वे पैर ऊपर रखकर बैठते हैं।
समर्थकों का कहना है कि यह अखिलेश यादव की कोई मजबूरी नहीं, बल्कि उनका बड़प्पन और बड़ों के प्रति संस्कार है कि वे रेवती रमण की तकलीफ को समझते हुए उनके पास बैठकर उनका हालचाल ले रहे थे। दूसरी ओर, कुछ आलोचक इस बात पर भी अड़े हैं कि कद में अखिलेश यादव बहुत बड़े नेता हैं, इसलिए रेवती रमण सिंह को अपनी शारीरिक लाचारी के बावजूद राजनीतिक गरिमा का ख्याल रखना चाहिए था।
Revati Raman Singh Caste: गूगल पर क्यों सर्च होने लगी रेवती रमण सिंह की जाति?
इस पूरे विवाद के बीच लोग रेवती रमण सिंह का बैकग्राउंड तलाश रहे हैं। आपको बता दें कि कुंवर रेवती रमण सिंह सामान्य (जनरल) कैटेगरी के तहत भूमिहार ब्राह्मण जाति से आते हैं। उनका ताल्लुक प्रयागराज के बेहद मशहूर और रसूखदार 'बराव स्टेट' (Baraon State) के राजघराने से है।
इसी वजह से इंटरनेट पर कुछ लोग इसे अगड़ी और पिछड़ी जाति के बीच की कड़वाहट से जोड़कर देख रहे हैं। आलोचकों का दावा है कि राजघराने और अपनी ऊंची जाति के मिजाज के कारण उन्होंने पिछड़े समाज से आने वाले एक पूर्व मुख्यमंत्री को तवज्जो नहीं दी। हालांकि, रेवती रमण के लंबे राजनीतिक सफर को जानने वाले इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हैं।

कौन हैं रेवती रमण सिंह? (who is Revati Raman Singh)
- कुंवर रेवती रमण सिंह का जन्म 5 अक्टूबर 1943 को हुआ था। वे उत्तर प्रदेश और खासकर पूर्वी यूपी (पूर्वांचल) की राजनीति के सबसे कद्दावर और असरदार चेहरों में से एक रहे हैं।
- रेवती रमण सिंह उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने मुलायम सिंह यादव, बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खान के साथ मिलकर समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी। वे लंबे समय तक सपा के राष्ट्रीय सचिव रहे।
- प्रयागराज की करछना विधानसभा सीट से वे एक या दो बार नहीं, बल्कि 7 से ज्यादा बार विधायक चुने गए और सूबे की सरकार में सिंचाई व पर्यावरण जैसे बड़े मंत्रालयों के कैबिनेट मंत्री रहे।
- साल 2004 के लोकसभा चुनाव में रेवती रमण सिंह ने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) सीट पर बीजेपी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी को हराकर सबको चौंका दिया था। वे दो बार लोकसभा सांसद रहे और बाद में राज्यसभा भी पहुंचे।
जेपी आंदोलन से लेकर वीपी सिंह के करीबी होने तक का सफर
1980 के दशक में जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े-बड़े क्षत्रपों का दौर था, तब रेवती रमण सिंह ने अपनी निडरता और जमीनी पकड़ से एक अलग पहचान बनाई थी। इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के खिलाफ उन्होंने जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जेल भी गए।
अपनी तीक्ष्ण राजनीतिक सूझबूझ के कारण वे पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और राजनारायण जैसी देश की महान राजनीतिक हस्तियों के बेहद करीब रहे। इसके अलावा,उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दिवंगत पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मिलकर गंगा नदी की सफाई के अभियान में भी कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था।
आज भले ही वे उम्र के इस पड़ाव पर सक्रिय राजनीति से थोड़े दूर हों, लेकिन प्रयागराज की धरती पर उनका सियासी रसूख और बराव स्टेट का दबदबा आज भी कायम है। यही वजह है कि अखिलेश यादव के साथ आई उनकी एक तस्वीर ने पूरे उत्तर प्रदेश के सियासी पारे को चढ़ा दिया है।
मुलायम के भरोसेमंद नेताओं से अखिलेश के मुलाकाय के मायने, 2027 की तैयारी
प्रयागराज दौरे के दौरान अखिलेश यादव ने उन नेताओं से मुलाकात की, जिन्हें कभी मुलायम सिंह यादव का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता था। इस कड़ी में रेवती रमण सिंह से उनके आवास पर मिलना, फिर रेवती रमण सिंह के बेटे उज्ज्वल रमण सिंह से भी उन्होंने लंबी बातचीत की।
इसके बाद अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के विधायक विजय मिश्रा यादव के घर पहुंचे और उनसे मुलाकात की। उन्होंने महानगर अध्यक्ष इस्तखार अहमद के आवास पर भी जाकर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत की। प्रयागराजवास के दौरान उन्होंने कई पुराने कार्यकर्ताओं के घर जाकर भी उनका हालचाल जाना और संगठन को लेकर चर्चा की।
राजनीतिक जानकार इस पूरे दौरे को सिर्फ शिष्टाचार मुलाकात नहीं मान रहे हैं। माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियां अभी से तेज कर दी हैं। अखिलेश यादव लगातार ऐसे नेताओं से मिल रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक पार्टी की संगठनात्मक और चुनावी रणनीति को मजबूत किया।
सूत्रों के मुताबिक इन बैठकों में केवल हालचाल नहीं पूछा गया, बल्कि इस बात पर भी चर्चा हुई कि बदलते राजनीतिक माहौल में समाजवादी पार्टी को और मजबूत कैसे बनाया जाए। पुराने नेताओं के अनुभव और युवा नेतृत्व की ऊर्जा को साथ लेकर चलने की रणनीति पर भी विचार हुआ।
समाजवादी पार्टी इस समय पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को अपनी सबसे बड़ी चुनावी रणनीति के तौर पर आगे बढ़ा रही है। लेकिन पार्टी केवल इसी दायरे तक सीमित नहीं रहना चाहती। प्रयागराज दौरे के दौरान अखिलेश यादव ने पुराने समाजवादी नेताओं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं से मिलकर यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी अनुभवी नेतृत्व और युवा कार्यकर्ताओं को साथ लेकर आगे बढ़ेगी।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रदीप सिंह का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले ऐसे दौरे संगठन में नई ऊर्जा भरने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने का भी काम करते हैं। अब यह रणनीति 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को कितना फायदा पहुंचाती है, इसका जवाब आने वाले समय में जनता और चुनावी नतीजे ही देंगे।














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