कौन हैं आशु मलिक? जिनके चलते कभी सपा हुई थी दो फाड़, अब बने अखिलेश के खासमखास

लखनऊ, 4 अप्रैल: समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लगता है कि अपने चाचा शिवपाल यादव से सियासी दूरी बना लेने का फैसला कर लिया है। इसकी वजह ये हो सकती है कि उन्होंने देख लिया है कि अब प्रदेश की राजनीति में उनका खुद का एक ऐसा पॉलिटिकल बेस तैयार हो चुका है, जिसमें उन्हें चाचा के सहयोग की आवश्यकता नहीं रह गई है। समाजवादी पार्टी के दोनों कोर वोटर बेस उनके साथ खड़ा हो चुका है। अगर शिवपाल यादव को अभी भी वह सपा में ज्यादा अहमियत देंगे तो इससे उन्हें जितना फायदा होगा, उससे कहीं ज्यादा नुकसान ही हो सकता है। सपा की राजनीति में अखिलेश यादव की इस रणनीति में आशु मलिक एक बहुत ही फिट किरदार हैं और दोनों को अपना सियासी भविष्य सेट करने के लिए एक-दूसरे की भरपूर आवश्यकता है।

कभी थे शिवपाल के खास, अब बने अखिलेश के खासमखास

कभी थे शिवपाल के खास, अब बने अखिलेश के खासमखास

यूपी में समाजवादी पार्टी की अंदर की राजनीति में आशु मलिक एकबार फिर से चर्चित किरदार बनकर उभरे हैं। चाचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव के बीच एकबार फिर से जो दूरियां दिखाई दे रही हैं, उस दौरान जिस तरह से अखिलेश ने इन्हें अचानक अपने पिता मुलायम सिंह यादव के साथ अपनी मौजूदगी में मुलाकात करवाई है, उससे समाजवादी पार्टी में बन रहे नए समीकरणों के संकेत मिल रहे हैं। यह वही आशु मलिक हैं, जो कभी शिवपाल यादव के खासमखास हुआ करते थे और 2017 के 6 जनवरी को समाजवादी पार्टी में पिता-पुत्र के बीच जो सार्वजनिक घमासान देखने को मिला था, इन्हें उसका मुख्य किरदार भी माना जाता है।

कौन हैं आशु मलिक?

कौन हैं आशु मलिक?

आशु मलिक इस बार सहारनपुर देहात से सपा के टिकट पर शानदार जीत दर्ज करके विधानसभा पहुंचे हैं। यही आशु मलिक पांच साल पहले समाजवादी पार्टी में दो फाड़ होने की वजह माने जाते रहे हैं। आशु मलिक शुरू से समाजवादी पार्टी के ऐसे नेता रहे हैं, जो आजम खान से दूर रहे, लेकिन शिवपाल यादव से इनकी काफी करीबी रही। यह करीबी ऐसी थी कि जब सीएम की कुर्सी पर अखिलेश बैठे थे, तब भी वह चाचा के सबसे ज्यादा नजदीक थे। पश्चिमी यूपी में इन्होंने अपनी पहचान सपा के एक सशक्त मुस्लिम चेहरे के तौर पर बनाई है। साल 2014 में पार्टी ने उन्हें एमएलसी बनाया था। जब उस समय अखिलेश और शिवपाल समर्थकों के बीच चिट्ठीबाजी का दौड़ चल रहा था तो चाचा की ओर से जवाब देने का जिम्मा आशु मलिक ने ही संभाल रखा था। पार्टी में उनके बढ़ते कद से आजम खान भी परेशान होते रहे हैं। गाजियाबाद हज हाउस उद्घाटन के बाद वे आजम के खिलाफ मोर्चा भी खोल चुके हैं।

कभी अखिलेश को कहा था 'औरंगजेब'!

कभी अखिलेश को कहा था 'औरंगजेब'!

जिस तरह अब आशु मलिक ने अखिलेश यादव की मौजूदगी में मुलायम से मुलाकात की है, उससे लगता है कि सपा अध्यक्ष अपने पिता के सामने उनके छोटे भाई के खिलाफ अपना पक्ष मजबूत करना चाहते हैं। क्योंकि, समाजवादी पार्टी का वह चर्चित कार्यक्रम जिसमें अखिलेश यादव ने पिता के सामने से माइक छीन लिया था, उसके पीछे भी आशु मलिक को ही कारण माना जाता है। जानकारी के मुताबिक तब चाचा शिवपाल के करीबी रहे आशु मलिक को अखिलेश इसलिए दंडित करना चाहते थे, क्योंकि उन्होंने उन्हें औरंगजेब कह दिया था। कहा जाता है कि उस कार्यक्रम में अखिलेश के समर्थक इतने उग्र थे कि मुलायम को किसी तरह से वहां से आशु मलिक को अपने साथ सुरक्षित निकालना पड़ा था। अब अगर वह मुलायम के सामने शिवपाल के खिलाफ अखिलेश यादव की गवाही देने पहुंचे हैं तो पूर्व सीएम के लिए अपने पिता को समझाने में शायद ज्यादा आसानी रहेगी।

सहारनपुर से टिकट मिलने से ही मिले थे नजदीकियों के संकेत

सहारनपुर से टिकट मिलने से ही मिले थे नजदीकियों के संकेत

समाजवादी पार्टी में चाचा-भतीजे के बीच रार तभी से ठन गई थी, जब 2012 में पार्टी के नंबर दो रहे भाई शिवपाल की जगह मुलायम ने बेटे अखिलेश को सीएम बनाने के लिए वीटो लगा दिया। यही विवाद आखिरकार 2017 की बगावत का कारण बना। शिवपाल ने राजनीतिक मजबूरी में भले ही इस चुनाव में अखिलेश को अपना नेता मान लिया था, लेकिन 2017 में उनसे बगावत करने वाले शिवपाल के करीबियों को अखिलेश नहीं भूले थे और इसलिए उन सबको बेटिकट ही रख दिया था। लेकिन, जब आशु मलिक को सहारनपुर देहात से टिकट दिया गया तो लगा कि शायद शिवपाल यादव ने इसके लिए ज्यादा ताकत लगाई हो।

अखिलेश भी चाहते हैं शिवपाल से छुटकारा!

अखिलेश भी चाहते हैं शिवपाल से छुटकारा!

लेकिन, शिवपाल के बीजेपी से नजदीकियां बढ़ने की अटकलों के बीच आशु मलिक का अखिलेश यादव की मौजूदगी में मुलायम से आशीर्वाद लेने पहुंचने से ऐसा लगता है कि सपा अध्यक्ष ने अब शिवपाल के बगैर ही राजनीति करने का मन बना लिया है। इसकी वजह यह है कि बीते चुनाव में यूपी में जो नतीजे आए हैं, उससे यह लग रहा है कि समाजवादी पार्टी के कोर वोटर यादव और मुसलमान पूरी तरह से अखिलेश के पीछे लामबंद हैं। यही वजह है कि नतीजों के बाद से ही भतीजे ने चाचा को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है। आजम खान की ढलती उम्र की वजह से सपा को भी एक युवा मुस्लिम चेहरे की आवश्यकता है, जिसका व्यापक प्रभाव हो। लगता है कि यही वजह है कि आशु मलिक को अखिलेश में और सपा प्रमुख को उनमें अपनी भविष्य की राजनीति दिख रही हो। (पहली दोनों तस्वीर-आशु मलिक के ट्विटर हैंडल से)

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