यूपी चुनाव में किस करवट बैठेगी मुस्लिम वोटों की गणित: फिर होगा पहले की तरह विभाजन या बढ़ेगी BJP की टेंशन ?
लखनऊ, 24 सितंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सबसे अहम सवाल है कि यूपी की 20 फीसदी आबादी वाला मुस्लिम वोट बैंक किसके पाले में जाएगा या फिर एक बार वोटों में बिखराव होगा और उसका लाभ बीजेपी ले जाएगी। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम मतों का विभाजन साफ नजर आया था जिसकी वजह से बीजेपी की सत्ता आयी। लेकिन क्या 2022 में होने वाले चुनाव में पुराना इतिहास दोहराया जाएगा या फिर मुस्लिम समुदाय किसी एक दल के साथ जाएगा। सपा, बसपा और कांग्रेस की तरफ से इस वोट बैंक को साधने की कवायद हो रही है वहीं दूसरी ओर बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और उसने तीन करोड अल्पसंख्यकों तक पहुंचने का टारगेट सेट किया है।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय (लगभग 20%) है। कई संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हैं जहां चुनाव के दौरान मुस्लिम वोटों में बदलाव राजनीतिक दलों के लिए हार या जीत तय करता है। रामपुर, फर्रुखाबाद और बिजनौर जैसे निर्वाचन क्षेत्र हैं, जिनमें लगभग 40% मुस्लिम आबादी शामिल है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रोहिलखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम मतदाता चुनाव परिणाम निर्धारित करते हैं।
यूपी की 145 विधानसभा सीटों पर प्रभावित करते हैं नतीजे
आंकडों के अनुसार, यूपी में 145 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक कारक हैं। 70 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमानों की आबादी 20 से 60 फीसदी के बीच है। इनमें से ज्यादातर विधानसभा सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में हैं। ऐसा माना जाता है कि विभिन्न कारणों से मुसलमानों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को छोड़ दिया और समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी पार्टियों की ओर बढ़ गए, जो सामाजिक न्याय के लिए लड़ने का दावा कर रहे थे।

मुस्लिम समुदाय तक पहुंचने में जुटी कांग्रेस
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले अब कांग्रेस ने लोगों तक पहुंचने की कवायद शुरू कर दी है। एक तरफ जहां कांग्रेस चुनावी यात्राओं के जरिए लोगों से कनेक्ट होने का प्रयास कर रही है वहीं दूसरी तरफ यूपी कांग्रेस इकाइ का अल्पसंख्यक सेल भी मुस्लिम समुदाय तक पहुंचने की योजना बनाने में जुटा हुआ है। पाटी के पदाधिकारियों की माने तो यूपी में 8000 से ज्यादा मस्जिदों के बाहर संकल्प पत्र बांटे जाएंगे। इसका मकसद करीब 35 लाख मुस्लिम आबादी तक पहुंचा है।
कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने बताया कि,
''योजना के अनुसार हर शुक्रवार को मस्जिदों में जुमे की नमाज अदा की जाती है। इस दौरान काफी संख्या में लोग पहुंचते हैं। कांग्रेस की योजना है कि मस्जिदों के बाहर अल्पसंख्यक सेल के लोगो को लगाया जाएगा जो कांग्रेस के संकल्प पत्र की प्रतियां उनके बीच वितरित करने का काम करेंगे। इससे कांग्रेस को जन जन तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।''
बीजेपी ने भी चला रखा है अल्पसंख्यकों तक पहुंचने का अभियान
यूपी बीजेपी ईकाई के अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली ने वन इंडिया डॉट काम को बताया कि मोर्चा ने यूपी के तीन करोड़ लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। पूरे जिलों में मोर्चा की कार्यकारिणी और समितियां गठित होने के बाद लगभग 44 हजार कार्यकर्ता होंगे जो अल्पसंख्यक समुदायों के बीच जाकर केंद्र और योगी सरकार की योजनाओं के बारे में बतायाएंगे।

बासित अली ने बताया कि,
'' मोर्चा का लक्ष्य यूपी में तीन करोड़ अल्पसंख्यक परिवारों तक पहुंचना है। इसमें मुस्लिम, सिख और इसाई समुदाय से जुड़े समाज में जाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें भी ज्यादा फोकस मलीन बस्तियों में रहने वाले मुस्लिम समाज पर किया जाएगा और उनको सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी दी जाएगी। इस दौरान पीएम उज्जवला योजना, पीएम आवास योजना, आयुष्मान भारत योजना और किसान सम्मान निधि के बारे में लोगों को जागरुक करेंगे।''
सबसे ज्यादा बसपा ने 102 उम्मीदवारों को दिया था टिकट
1991 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि यूपी में सबसे कम मुसलमान जीतकर आए हैं। यूपी में पिछले विधानसभा चुाव में मुस्लिम विधायकों की संख्या 17.1% से घटकर 5.9% हो गयी है। यह स्थिति तब है जब पिछले चुनाव मे बसपा ने 102 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था लेकिन लेकिन सिर्फ 5 मुस्लिम उम्मीदवार ही जीत का मुंह देख सकें। सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 89 मुसलमानों को टिकट दिए थे। सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक समाजवादी पार्टी के हैं। कुल 23 में से 17 विधायक सपा से हैं. जबकि कांग्रेस के सात में से दो विधायक मुस्लिम हैं। हालांकि बीजेपी ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था।

राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद आफताब अंसारी कहते हैं,
'' राम मंदिर के आंदोलन के बाद से ही मुस्लिम विधायकों की संख्या ज्यादा थी लेकिन उसके मुकाबले आज की हालत काफी खराब है। आज केवल 6 फीसदी के आसपास आ गइ है। इसका कारण स्पष्ट है। मतों के बिखराव की वजह से ही ऐसा हो रहा है। यूपी की करीब 150 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी डिसाइडिंग फैक्टर है लेकिन वहां भी उनको पहले की तरह से वोट नहीं मिलते क्योंकि बीजेपी को छोडकर सभी दल मुस्लिम कैंडिडेट ही उतारते हैं जिससे मतों का बिखराव होना स्वाभाविक है। आने वाले चुनाव में तो वोटों के लिए और कशमकश होगी। अब तक सपा-बसपा-कांग्रेस ही थीं लेकिन अब आप और ओवैसी के आने से और गिरावट आएगी।''
सबसे ज्यादा 64 विधायक 2012 चुनाव में जीतकर आए
यूपी में मुसलमान मतदाता कुल आबादी का लगभग 20 फीसदी हैं। 2012 के चुनाव में अब तक के सब से ज्यादा 64 मुसलमान विधायक जीत कर आए थे। सपा के 41, बसपा के 15, कांग्रेस के दो जबकि छह विधायक अन्य दलों से थे। वहीं पिछले 2007 में विधानसभा चुनाव में 56 मुसलमान विधायक बने थे जिसमें बसपा के 29, सपा के 21 व छह विधायक अन्य दलों के थे। हालांकि जानकारों की माने तो 1991 में राम मंदिर मुद्दे की वजह से सिर्फ 4.1% मुस्लिम विधायक ही जीत पाए थे। इसके बाद हर चुनाव में मुस्लिम विधायकों की संख्या बढ रही थी लेकिन स्थिति यह है कि 2017 में यह 5.9% पर पहुंच गया।












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