Pakistan Defence: कौन-कौन से यूरोपियन देश पाकिस्तान को दे रहे हथियार? भारत को कितना खतरा? - Report
Pakistan Defence: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में फिनलैंड की आधिकारिक यात्रा के दौरान यूरोप की रक्षा और सुरक्षा नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों को यह समझना होगा कि सालों तक उन्होंने ऐसे हथियार पाकिस्तान को बेचे, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ हो सकता था।
जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब किसी यूरोपीय देश पर भारतीय हथियारों से हमला हुआ हो। इसके बावजूद यूरोपीय देश लंबे समय तक पाकिस्तान को हथियार और सैन्य तकनीक देते रहे। उनका यह बयान भारत की उस पुरानी चिंता को सामने लाता है, जिसे नई दिल्ली कई दशकों से अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाती रही है।

पाकिस्तान की सेना को यूरोप ने कैसे किया मजबूत?
अगर कोल्ड वॉर खत्म होने के बाद के दौर को देखें, तो पाकिस्तान की सैन्य ताकत को आधुनिक बनाने में यूरोप का योगदान काफी बड़ा रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्टों के मुताबिक, 1990 से 2010 के बीच पाकिस्तान की सेना का एक बड़ा हिस्सा यूरोपीय तकनीक और हथियारों पर निर्भर था। इसी दौर में पाकिस्तान ने अपनी वायु सेना और नौसेना को आधुनिक बनाने के लिए यूरोपीय देशों से बड़ी मात्रा में सैन्य उपकरण खरीदे। उस समय पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा यूरोपीय देशों का था।
स्वीडन, फ्रांस और यूरोप ने दिए थे हथियार
पाकिस्तान की निगरानी क्षमता बढ़ाने में स्वीडन से मिले Erieye रडार सिस्टम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसी तरह फ्रांस से प्राप्त मिराज लड़ाकू विमान और सबमरीन्स ने पाकिस्तान की सैन्य ताकत को काफी मजबूत किया।
इन हथियारों का असर सिर्फ पाकिस्तान की सेना तक सीमित नहीं था, बल्कि दक्षिण एशिया के सुरक्षा संतुलन पर भी इसका प्रभाव देखने को मिला। उस दौर में पाकिस्तान की सैन्य क्षमता बढ़ने के पीछे यूरोप की तकनीकी मदद एक बड़ा कारण मानी जाती थी।
वॉरशिप, मिसाइल और हेलीकॉप्टर भी यूरोप से मिले
केवल लड़ाकू विमान और पनडुब्बियां ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान ने इटली और नीदरलैंड्स जैसे देशों से वॉरशिप, मिसाइल सिस्टम और हेलीकॉप्टर भी खरीदे। ये आंकड़े दिखाते हैं कि कई सालों तक पाकिस्तान के डिफेंस मॉर्डनाइजेशन में यूरोपीय देशों की रक्षा कंपनियों और उनकी नीतियों का बड़ा योगदान रहा।
अब क्यों बदल रही है तस्वीर?
हालांकि समय के साथ ग्लोबल पॉलिटिक्स और सुरक्षा समीकरण बदल चुके हैं। SIPRI की 2021 से 2025 तक की रिपोर्ट बताती है कि अब पाकिस्तान की यूरोपीय हथियारों पर निर्भरता पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है। इस बदलाव के पीछे सिर्फ आर्थिक कारण नहीं हैं, बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक वजहें भी शामिल हैं। भारत और यूरोपीय देशों के बीच बढ़ते रिश्तों ने भी इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है।
भारत को नाराज नहीं करना चाहते यूरोपीय देश
विश्लेषकों का मानना है कि आज के समय में पाकिस्तान को हथियार बेचना यूरोपीय देशों के लिए पहले जितना आसान नहीं रह गया है। भारत का बढ़ता वैश्विक प्रभाव, यूरोपीय संघ के देशों के साथ उसके मजबूत होते रणनीतिक संबंध और आर्थिक सहयोग ने यूरोपीय देशों को अधिक सावधान बना दिया है। अब वे ऐसे कदमों से बचना चाहते हैं जो भारत के साथ उनके संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
फिर भी पूरी तरह बंद नहीं हुई है सप्लाई
यूरोप से पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई भले कम हो गई हो, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी नीदरलैंड्स, तुर्किये और ब्रिटेन जैसे देश सीमित स्तर पर पाकिस्तान को मिलिट्री इक्विपमेंट्स मुहैया करा रहे हैं।
SIPRI के मुताबिक, 2021 से 2025 के दौरान पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में नीदरलैंड्स की हिस्सेदारी लगभग 4.6 प्रतिशत रही है।
नीदरलैंड्स और पाकिस्तान की नेवी का रिश्ता
डच रक्षा कंपनी Damen पाकिस्तान नेवी के लिए जहाज और हाईटेक सर्विलांस शिप बनाने में बड़ा किरदार निभा रही है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2024 में पाकिस्तान नौसेना प्रमुख ने आधिकारिक तौर पर नीदरलैंड्स का दौरा किया था। यह दिखाता है कि दोनों देशों के बीच सैन्य संबंध अभी भी जारी हैं।
तुर्किये बना पाकिस्तान का बड़ा सहयोगी
अगर मौजूदा समय की बात करें तो तुर्किये पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार बनकर उभरा है। रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में तुर्किये की हिस्सेदारी करीब 7 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। दोनों देशों के बीच सिर्फ हथियारों की खरीद-बिक्री ही नहीं, बल्कि डिफेंस ट्रेनिंग का भी बड़ा कार्यक्रम चल रहा है। अब तक लगभग 1,500 पाकिस्तानी अधिकारियों को तुर्किये में ट्रेनिंग दी जा चुकी है।
ड्रोन से लेकर फाइटर जेट तक साथ काम
तुर्किये और पाकिस्तान का सहयोग अब जनरल डिफेंस इक्विपमेंट्स से आगे निकल चुका है। पाकिस्तान ने तुर्किये से Bayraktar TB2 ड्रोन, आधुनिक सैन्य वाहन और नौसैनिक वॉरशिप खरीदे हैं। इसके अलावा दोनों देश मिलकर एक नए फाइटर जेट प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहे हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह साझेदारी दक्षिण एशिया में एक नई रक्षा धुरी का संकेत है, जिस पर भारत की नजर लगातार बनी हुई है।
ब्रिटेन की भूमिका कम, लेकिन खत्म नहीं
ब्रिटेन की डायरेक्ट सैन्य भागीदारी पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है। SIPRI के मुताबिक 2015 से 2024 के बीच पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में ब्रिटेन की हिस्सेदारी सिर्फ 0.3 प्रतिशत रही। लेकिन इसके बावजूद ब्रिटिश कंपनियां पाकिस्तान के साथ रक्षा क्षेत्र में जुड़ी हुई हैं।
आखिर यूरोप से खरीद कम क्यों हुई?
पाकिस्तान द्वारा यूरोप से हथियारों की खरीद में आई गिरावट के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण रूस-यूक्रेन युद्ध माना जाता है। इस युद्ध के बाद यूरोपीय देशों को अपने रक्षा भंडारों को बचाए रखने की जरूरत महसूस होने लगी। इसलिए वे अपने हथियारों को निर्यात करने के बजाय घरेलू सुरक्षा पर अधिक ध्यान देने लगे।
दूसरी बड़ी वजह भारत का बढ़ता कूटनीतिक प्रभाव है।
भारत लगातार दुनिया को यह समझाने की कोशिश करता रहा है कि पाकिस्तान को हथियार मुहैया कराना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान की खराब आर्थिक स्थिति ने भी उसकी हथियार खरीदने की क्षमता को सीमित कर दिया है।
चीन बना पाकिस्तान का सबसे बड़ा हथियार देने वाला
यूरोप की जगह अब चीन ने ले ली है। SIPRI के मुताबिक 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में चीन की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। पाकिस्तान अब चीनी लड़ाकू विमान, नौसैनिक वॉरशिप और लेटेस्ट डिफेंस टेक्नोलॉजी पर तेजी से निर्भर हो रहा है। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के बाद चीन ने पाकिस्तान को J-10C लड़ाकू विमानों की खेप सौंपी थी। इसके अलावा पाकिस्तान ने चीन से FC-31 स्टेल्थ फाइटर विमान भी हासिल किए हैं। इस तरह से चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा डिफेंस सहयोगी बनकर उभरा है।
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