UP में BJP की हार और जीत का 2024 के आम चुनाव पर क्या पड़ेगा असर
लखनऊ, 9 मार्च: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मतदान के बाद अब मतगणना का काउनडाउन शुरू हो गया है। एक्जिट पोल के नतीजो में यूपी में बीजेपी की बहुमत से सरकार बनती दिख रही है। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये आंकड़ें सही ही साबित हों। जहां तक बात पोल सर्वे की है तो इसमें हमेशा ही उलटफेर होते रहे हैं। लेकिन हालात कितने भी बुरे क्यों न हों, जीत की सुई सिर्फ बीजेपी की तरफ ही घूमती है। हालांकि पिछले चुनावी आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 लोकसभा चुनाव जीत के बाद बीजेपी लगातार राज्य में अच्छा प्रदर्शन कर रही है। शायद यह भी एक वजह हो सकती है कि चुनावी सर्वे बीजेपी पर दांव लगा रहे हैं लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों का दो साल बाद होने वोले आम चुनाव पर कितना असर पड़ेगा यह देखना काफी दिलचस्प होगा।

2024 के चुनावों के लिए इसका क्या मतलब है?
एग्जिट पोल बताते हैं कि सपा को 35 फीसदी वोट मिलने की उम्मीद है, जो कि यादवों और मुसलमानों की आबादी के प्रतिशत के बराबर है। इसमें कोई शक नहीं कि अगर मुसलमानों और यादवों ने सपा को वोट दिया है तो हिंदू वोटरों ने बीजेपी को अपनी पहली पसंद के तौर पर समर्थन दिया है। पश्चिमी यूपी में जाट-मुस्लिम गठबंधन को लेकर तमाम तरह की चर्चाओं के बावजूद बीजेपी के वोटरों ने पार्टी से दूरी नहीं बनाई तो सबक नंबर एक यह है कि हिंदुत्व के नारे को खारिज नहीं किया गया है।

मुफ्त की योजनाएं कर रही काम
यूपी में एक मजाक प्रचलित है कि लाभार्थी सबसे बड़ा जाति समूह है। राज्य में मतदाताओं ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि उन्हें सरकारी पेंशन और राशन मिलता है। इसलिए इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि लोगों ने पारंपरिक जाति निष्ठा से ऊपर उठकर भाजपा को सत्ता में वापस लाने के लिए मतदान किया हो। राजनीति में ऐसा मत सोचो कि दुश्मन का दुश्मन हमेशा दोस्त होता है। ऐसा माना जा रहा है कि शरद पवार के वोटर ममता बनर्जी को वोट देंगे क्योंकि दोनों का एजेंडा एक ही है। इन सभी कारकों को एक साथ मिलाकर, यह स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि भाजपा 2024 में अजेय होगी। ऐसे विपक्ष और मतदाताओं से निकट भविष्य में किसी अन्य परिणाम की उम्मीद न करें।

विपक्ष के एकजुट होने का कितना असर पड़ा
विपक्ष एक साथ आने और 2024 में भाजपा को कड़ी टक्कर देने की योजना बना रहा था। लेकिन इन चुनौती देने वालों के लिए बुरी खबर यह है कि एकजुट विपक्ष भी वोटों के ध्रुवीकरण की ओर ले जाता है और भाजपा को इसका फायदा मिलता दिख रहा है। इसका कारण यह है कि यूपी में बीजेपी को संभावित वोट करीब 43 फीसदी बताया जा रहा है, जो पिछली बार के मुकाबले 3 फीसदी ज्यादा है. ये वोट कहां से आ रहे हैं? ये वोट कुछ हद तक कांग्रेस और ज्यादातर बसपा की ओर से आते दिख रहे हैं क्योंकि इन चुनावों में बसपा को यूपी की दौड़ से बाहर माना जा रहा था और उम्मीद थी कि ये वोट सपा को जाएंगे। लेकिन कुछ मतदाताओं, मुख्य रूप से बसपा का समर्थन करने वाले जाटवों ने विभिन्न कारणों से भाजपा को वोट दिया है।

1985 के बाद कोई सत्ता में नहीं लौटा
यह अपेक्षित जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण होने वाली है क्योंकि पहली बार भाजपा एकजुट विपक्ष से भिड़ रही थी। उत्तर प्रदेश के इतिहास में आज तक कोई भी मुख्यमंत्री अपने पूर्ण कार्यकाल के बाद फिर से निर्वाचित नहीं हुआ है। 1985 के बाद से कोई भी पार्टी लगातार सत्ता में नहीं लौटी है लेकिन भविष्यवाणी है कि बीजेपी इस बार इतिहास बदलने जा रही है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बेरोजगारी, महंगाई और आवारा पशुओं जैसी मतदाताओं की समस्या जस की तस बनी हुई है। लेकिन मतदाताओं को यकीन है कि मोदी के जरिए बीजेपी इन सभी समस्याओं का समाधान कर देगी। उनका मानना है कि मोदी जी जो तोड़ते हैं, उसमें जोड़ भी सकते हैं।












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