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क्या PM मोदी के गढ़ बनारस में भाजपा का समीकरण बिगड़ रहा है ?

लखनऊ. 18 फरवरी। क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गढ़ बनारस में भाजपा का चुनावी समीकरण बिगड़ गया है ? क्या उसे खुद से अधिक अपना दल (सोनेलाल) पर भरोसा है ? यह सवाल इस लिए पूछा जा रहा है क्यों कि भाजपा ने दो चौंकाने वाले फैसले लिये हैं।

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एक तरफ उसने रोहनिया की जीती हुई सीट, अपना दल को दे दी तो दूसरी तरफ सेवापुरी के अपना दल विधायक नीलरतन पटेल को भाजपा का उम्मीदवार बना दिया।

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बनारस में भाजपा के दो बड़े फैसले

बनारस में भाजपा के दो बड़े फैसले

वाराणसी में पांच विधानसभा क्षेत्र हैं जिनमें सेवापुरी और रोहनिया सीट भी शामिल हैं। 2017 में रोहनिया से भाजपा के सुरेन्द्र नारायण सिंह करीब 57 हजार मतों से जीते थे। लेकिन 2022 में भाजपा ने यह सीट अपना दल (एस) को दे दी। पिछले चुनाव में सेवापुरी से अपना दल के नील रतन सिंह पटेल जीते थे। भाजपा ने इस बार नीलरतन को अपना उम्मीदवार बना लिया। यानी नीलरतन अब कमल छाप पर चुनाव लड़ेंगे। क्या पीएम मोदी के गढ़ में भी भाजपा को खुद पर भरोसा नहीं कि वह अपना दल को ढाल बना कर लड़ाई लड़ रही है ? क्या ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य फैक्टर के चलते भाजपा अतिपिछड़े वोटरों को लेकर आश्वस्त नहीं है ? माना जाता है कि बनारस की रोहनिया और सेवापुरी सीट पर कुर्मी वोटर निर्णायक हैं। कुर्मी वोटर अपना दल (एस) से जुड़े हुए हैं। पार्टी प्रमुख अनुप्रिया पटेल ने अपना पहला चुनाव( 2012) रोहनिया में ही जीता था।

रोहनिया और सेवापुरी में कुर्मी वोटर निर्णायक

रोहनिया और सेवापुरी में कुर्मी वोटर निर्णायक

पिछले चुनाव में रोहनिया के भाजपा उम्मीदवार सुरेन्द्र नारायण सिंह को करीब एक लाख 19 हजार वोट मिले थे। अपना दल ने भरपूर साथ दिया था। लेकिन 2022 में कुर्मी वोटों के ट्रांसफर की स्थिति 2017 की तरह नहीं थी। इस आंकलन ने भाजपा को नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने ये सीट अपना दल (एस) को दे दी। अनुप्रिया पटेल ने रोहनिया से सुनील पटेल को उम्मीदवार बना दिया। सुनील पटेल अपना दल एस के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। इस गणित में भाजपा के विधायक सुरेन्द्र नारायण सिंह कुर्बान हो गये। इसी आधार पर भाजपा ने नीलतरन पटेल को भगवा चोला पहनाया। माना जाता है कि सेवापुरी विधानसभा क्षेत्र में करीब 1 लाख 30 हजार कुर्मी वोटर हैं। जब कि रोहनिया में इनकी तादाद करीब 95 हजार बतायी जाती है। यानी भाजपा ने कुर्मी वोट बैंक को ध्यान में रख कर ये फैसला लिया।

अपना दल के गठन की पृष्ठभूमि

अपना दल के गठन की पृष्ठभूमि

अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल आज केन्द्र सरकार में मंत्री हैं। 2017 में उनके 9 विधायक जीते थे। इस दल को अब उत्तर प्रदेश का प्रमुख क्षेत्रीय दल माना जाता है। लेकिन अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल अपने जीवन काल में कोई चुनाव नहीं जीत पाये थे। उनका जन्म कन्नौज के कुर्मी परिवार में हुआ था। पढ़ने में बहुत मेधावी थे। कानपुर के पीपीएन कॉलेज से पढ़ाई की। फिजिक्स के टॉपर थे। पीएचडी भी की थी। फिर वे सामाजिक न्याय की लड़ाई में शामिल हो गये। चरण सिंह और कांशीराम के साथ काम किया। फिर उन्होंने अध्ययन में पाया कि प्रदेश के करीब 8 फीसदी कुर्मी समुदाय को उनकी आबादी के हिसाब से राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। तब उन्होंने 1994 में लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में एक कुर्मी सम्मेलन किया। इस रैली में बहुत बड़ी भीड़ जुटी ।

कुर्मी समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए अपना दल

कुर्मी समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए अपना दल

इसे यूपी की सबसे बड़ी जातीय रैली में से एक करार दिया गया। इस रैली की कामयाबी के बाद सोनेलाल पटेल सबसे बड़े कुर्मी नेता के रूप में स्थापित हो गये। फिर उन्होंने 1995 में अपना दल की स्थापना की। बड़े कुर्मी नेता होने के बाद भी वे कोई चुनाव नहीं जीत सके। सोने लाल पटेल ने पहला चुनाव 1989 में लोकदल (बहुगुणा) के टिकट पर चौबेपुर विधानसभी सीट से लड़ा था। लेकिन हार गये थे। 2009 में उन्होंने फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ा था। लेकिन तीसरे स्थान पर रहे थे। 2009 में सोनेलाल पटेल की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी। अपना दल की कमान उनकी पत्नी कृष्णा पटेल के हाथ में आयी। सोनेलाल पटेल को चार बेटियां हैं। पल्लवी पटेल, पारुल पटेल, अनुप्रिया पटेल और अमन पटेल। अनुप्रिया पटेल ने दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से पढ़ाई की है। वे साइकोलॉजी से पोस्टग्रेजुएट हैं। एमबीए की डिग्री भी हासिल कर रखी है। एमिटी यूनिवर्सिटी में कुछ दिन तक पढ़ाया भी है। चूंकि अनुप्रिया पटेल पढ़ने लिखने में जहीन थीं इसलिए सोनेलाल पटेल की राजनीतिक विरासत को संभालने में सफल रहीं। उनकी बहनें और मां पीछे छूट गयीं।

अनुप्रिया पटेल के जीवन में रोहनिया की अहमियत

अनुप्रिया पटेल के जीवन में रोहनिया की अहमियत

2012 के विधानसभा चुनाव में अनुप्रिया पटेल बनारस की रोहनिया सीट से अपना दल की उम्मीदवार बनी। सोनेलाल पटेल अपने परिवार के साथ कानपुर में रहते थे। लेकिन जातीय समीकरण को देख कर अनुप्रिया पटेल ने रोहनिया से चुनाव लड़ा था। वे विधायक चुनी गयीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल का भाजपा के साथ गठबंधन हुआ। अपना दल को कुर्मी बहुल मिर्जापुर और प्रतापगढ़ की सीटें मिली। अनुप्रिया पटेल विधायक थीं। लेकिन वे मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहती थीं। जब कि उनकी मां कृष्णा पटेल खुद मिर्जापुर से किस्मत आजमाना चाहती थीं। लेकिन अनुप्रिया पटेल की ही चली। उन्होंने मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा। वे जीती भी। अनुप्रिया के सांसद बनने के बाद रोहनिया विधानसभा सीट खाली हो गयी। उपचुनाव की घोषणा हुई। कहा जाता है कि उपचुनाव में अनुप्रिया पटेल अपने पति आशीष पटेल को चुनाव लड़ाना चाहती थीं। लेकिन मां कृष्णा पटेल रोहनिया से उपचुनाव लड़ने के लिए अड़ गयी। आखिरकार कृष्मा पटेल ने अपना दल से यहां चुनाव लड़ा। लेकिन संयोग से वे हार गयीं। इस हार से कृष्णा पटेल बेहद नाराज हो गयीं। उन्हें लगा कि उनकी बेटी अनुप्रिया ने पति आशीष के साथ मिल कर उन्हें हरा दिया है। वर्ना अपना दल की एक जीती हुई सीट वे कैसे हार सकती हैं। इसके बाद मां बेटी में राजनीतिक अदावत शुरू हो गयी। आखिरकार अनुप्रिया पटेल ने 2016 में अपनी अलग पार्टी, अपना दल (सोनेलाल) बना ली। उनकी बड़ी बहन पल्लवी पटेल और मां कृष्णा पटेल की राजनीतिक (अपना दल, कमेरावादी) फल-फूल नहीं पायी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कृष्णा पटेल ने गोंडा से और पल्लवी पटेल के पति पंकज निरंजन ने फूलपुर से चुनाव लड़ा था। लेकिन दोनों हार गये ते। जब कि अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से दोबारा सांसद चुनी गयीं थीं। अपना दल (सोनेलाल) के लिए रोहनिया सीट वह लॉन्चिंग पैड है जिसने उसकी राजनीति को नयी ऊंचाई दी। वह यहां कितनी मजबूत है इसका प्रमाण 2022 के विधानसभा चुनाव में भी मिल गया। भाजपा को अपनी जीती हुई सीट छोड़नी पड़ी।

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