Uttar Pradesh Assembly elections : भाजपा ने क्यों कुर्बान कर दीं 12 जीती हुई सीटें ?
नई दिल्ली, 05 फरवरी: उत्तर प्रदेश में चुनावी जीत के लिए भाजपा फूंक फूंक कर कदम उठा रही है। विनिंग थ्योरी को अमल में लाये जाने के बाद उसने अपनी चुनावी रणनीति बदल दी। भाजपा ने टिकट वितरण के पहले अपनी कमजोर सीटों के आकलन के लिए एक आंतरिक सर्वे किया था। इस सर्वें में एक बात ये सामने आयी कि अगर कुछ सीटों पर उम्मीदवार नहीं बदले गये तो उसकी नैया डूब सकती है। इनमें कुछ सीटें उसकी जीती हुई थीं। कुछ जीती हुई सीटों के विधायक पाला बदल चुके थे। जीती हुई 12 ऐसी सीटों की पहचान हुई जहां भाजपा को दोबारा जीत के लिए कुछ नया करने की जरूरत थी।

12 जीती हुई सीटें भाजपा ने सहयोगी दलों की दी
इन सीटों पर नये सिरे से सामाजिक सामीकरण को साधना था। सिर्फ जिताऊ उम्मीदवार की जरूरत थी। तब भाजपा ने इसका नया तोड़ निकाला और ये 12 सीटें अपने सहयोगी दलों (अपना दल (एस) और निषाद पार्टी) को सौंप दी। भाजपा ने जीती हुई इन 12 सीटों में से आठ अपना दल को दे दी हैं। ये आठ सीटें हैं, कायमगंज, घाटमपुर मऊरानीपुर, बिंदकी, बारा, चायल, नानपारा, बछरांवा। भाजपा की ये सीटिंग सीटें अब अपना दल के पास हैं। बहराइच जिले की नानपारा सीट की विधायक माधुरी वर्मा अब सपा में हैं। भाजपा ने अपनी चार जीती हुई सीटें निषाद पार्टी को दी है। ये सीटें हैं, मेंहदावल, सुल्तानपुर सदर (जयसिंहपुर), चौरीचौरा और कालपी।

भाजपा में आने वाले नेता सहयोगी दलों में एडजस्ट
भाजपा ने कुछ नेताओं को सहयोगी दलों में एडजस्ट किया है। सैदपुर (गाजीपुर) के सपा विधायक सुभाष पासी कुछ समय पहले भाजपा में शामिल हुए थे। जब सैदपुर सीट निषाद पार्टी के खाते में चली गयी तो वे निषाद पार्टी के उम्मीदवार बन गये। इसी तरह सपा नेता रश्मि आर्या मऊरानीपुर से टिकट पाने के लिए भाजपा में शामिल हुई थीं। लेकिन जब ये सीट अपना दल के कोटा में चली गयी तो वे अपना दल की उम्मीदवार बन गयीं। जीत का समीकरण बैठाने के लिए ही भाजपा ने इन सीटों पर फेरबदल किये। मेंहदावल सीट पर 2017 में भाजपा के राकेश सिंह बघेल जीते थे। उन्होंने बसपा के अनिल कुमार त्रिपाठी को हराया था। अनिल कुमार त्रिपाठी कुछ समय पहले भाजपा में शामिल हुए थे। जब मेंदावल सीट निषाद पार्टी को मिल गयी तो स्थिति बदल गयी। अब विधायक राकेश सिंह बघेल बेटिकट हैं और इनसे हारने वाले अनिल कुमार त्रिपाठी निषाद पार्टी के उम्मीदवार हैं।

2022 में भाजपा को देनी पड़ी सहयोगी दलों को अधिक सीटें
2017 में भाजपा ने अपने सहयोगी दलों (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल (एस)) को कुल 19 सीटें दी थीं। सुहेलदेव पार्टी को 11 और अपना दल को 8 सीटें। लेकिन 2022 में भाजपा ने अपने सहयोगी दलों को 28 सीटें दी हैं। अपना दल को 18 और निषाद पार्टी को 10 सीटें। यानी इस बार भाजपा ने योगी सरकार को बचाने के लिए समझौते भी किये हैं। आंतरिक सर्वे के संकेतों और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भाजपा को कम्प्रोमाइज के लिए मजबूर होना पड़ा। अनुप्रिया पटेल की पार्टी (अपना दल) की कुर्मी समुदाय में पैठ है। 2017 में उसे 11 सीटें मिलीं थी जिसमें उसने 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस शानदार जीत प्रतिशत की वजह से ही 2022 में उसके चुनाव लड़ने वाली सीटों की संख्या 11 से 18 हो गयी। गैरयादव पिछड़ी जातियों में कुर्मी समुदाय की महत्वपूर्ण स्थिति है। वैसे भी भाजपा गैरयादव ओबीसी वोटरों पर फोकस कर रही है। इसलिए उसने अपनी 8 कमजोर सीटें अपना दल को सौंप दी। इसी तरह उसने निषाद समुदाय की अधिकता वाली अपनी चार कमजोर सीटें निषाद पार्टी को दे दी।

2022 में भाजपा को कितने सीटें मिल सकती हैं ?
भाजपा ने 2017 में 384 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें उसे 312 पर जीत मिली थी। 2022 में भाजपा 375 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कोरोना, किसान आंदोलन, एंटी इनकंबेंसी फैक्टर ऐसे कुछ कारण हैं जिनकी वजह से भाजपा इस बार दवाब महसूस कर रही है। वैसे भाजपा इस बार भी 300 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही है। लेकिन भाजपा के इस दावे के इतर राजनीतिक जानकारों की कुछ अलग राय है। इनकी राय है कि अलग-अलग कारणों से इस बार भाजपा की सीटों की संख्या कम हो सकती है। उसे बहुमत मिल सकता है लेकिन सीटों की संख्या 210 से 230 के बीच सिमट सकती है। समाजवादी पार्टी से उसे कठिन चुनौती मिल रही है। अभी अमित शाह चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। भाजपा को भरोसा है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यूपी चुनाव में पूरी तरह सक्रिय होंगे तब उसकी स्थिति और बेहतर हो सकती है।












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