UP Politics: बलिया में सपा विधायक ने बयान पर दी सफाई, आस्था और शिक्षा को लेकर फिर दिए तर्क
UP Politics: बलिया की सियासत में एक बार फिर सपा नेता जियाउद्दीन रिजवी के बयान ने नया मोड़ ले लिया है। कांवड़ यात्रा और आस्था को लेकर दिए गए उनके पुराने बयान ने हलचल मचा दी थी, लेकिन अब वे अपने शब्दों से पीछे हटते नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और असली सन्दर्भ को नजरअंदाज किया गया।
रिजवी ने यह भी स्पष्ट किया कि जो बातें उनके नाम से वायरल हो रही हैं, वो दरअसल किसी और का हवाला था। उन्होंने खुद को शरद यादव के एक पुराने भाषण से जोड़ा और कहा कि उस संदर्भ को गलत तरीके से पेश किया गया। साथ ही उन्होंने समाज में शिक्षा और धार्मिक आस्था के बीच के संतुलन पर एक गंभीर चर्चा छेड़ी।

पूर्व मंत्री ने कहा कि समाज में जो वर्ग शिक्षा से दूर है, वही अक्सर धार्मिक अंधविश्वास का शिकार बनता है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। उनका इशारा इस ओर था कि आस्था और सामाजिक चेतना दोनों का संतुलन जरूरी है, वरना अंधभक्ति और कट्टरता समाज को पीछे ले जाती है।
आस्था है एक निजी मामला
सपा नेता ने यह भी जोड़ा कि आस्था एक निजी मामला है, जिसे घर पर भी पूरी श्रद्धा से निभाया जा सकता है। उन्होंने योगी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि जब सार्वजनिक स्थानों पर नमाज को रोका गया था, तब भी लोगों ने घरों में इबादत की थी। यही नियम पूजा-पाठ पर भी लागू हो सकता है।
उनका तर्क था कि अगर सरकार सभी धर्मों के लिए समान नियम अपनाए, तो सामाजिक तनाव कम हो सकता है। उन्होंने कांवड़ यात्रा पर रोक की बात को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि लोग श्रद्धा से यात्रा करें, लेकिन इसका राजनीतिक उपयोग नहीं होना चाहिए।
प्रशासनिक रवैये पर उठाए सवाल
रिजवी ने हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो का हवाला दिया जिसमें एक डिप्टी एसपी किसी श्रद्धालु के पैर दबाती नजर आई थीं। उन्होंने सवाल किया कि क्या यही लोकतंत्र है? क्या अधिकारियों की यही भूमिका होनी चाहिए? उनका कहना था कि इस तरह के दृश्य प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं।
इसके साथ ही उन्होंने सरकार पर अंधविश्वास को बढ़ावा देने और शिक्षा की उपेक्षा करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि सरकार का मकसद समाज के वंचित तबकों को जानबूझकर अशिक्षित बनाए रखना है ताकि वे जागरूक न हो सकें।
लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर चिंता
इतना ही नहीं, आगे सपा विधायक ने देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी चिंता जताई। उन्होंने एक शिक्षक की कविता का जिक्र किया, जिस पर एफआईआर दर्ज कर दी गई थी, जबकि वह कविता केवल 'जीवन अर्जित करो' की बात कर रही थी।
इसी तरह एक पत्रकार पर एफआईआर का मामला उठाते हुए उन्होंने सवाल किया कि जब मीडिया सच्चाई दिखाता है, तो उस पर कार्यवाही क्यों होती है? उन्होंने इन घटनाओं को लोकतंत्र का गला घोंटने की प्रक्रिया बताया और इसे एक 'अघोषित इमरजेंसी' करार दिया।












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