UP: 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर मिली सत्ता, 16 साल बाद रणनीति बदलने के लिए मजबूर हुईं मायावती
2024 से पहले माया के नए फार्मूले का लिटमस टेस्ट होगा। मायावती ने निकाय चुनाव में एक भी ब्राह्मण को मेयर का टिकट नहीं दिया है। सवर्ण जाति के केवल एक उम्मीदवार को मायावती ने टिकट पकड़ाया है।

UP Nikay Chunav 2023: बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) 2007 में अपने सोशल इंजीनियरिंग के दम पर यूपी की सत्ता में आई थी। लेकिन पांच साल बाद 2012 में उसके साथ से सत्ता चली गई थी। इसके बाद बसपा अपनी वापसी की कई कोशिशें कर चुकी है लेकिन उसे हमेशा हार ही नसीब हुई है। लगातार झटका खा रहीं मायावती ने इस बार निकाय चुनाव में अपनी सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति में बदलाव किया है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यूपी की 17 मेयर सीटों में 11 सीटें मुस्लिम को दी गई हैं लेकिन जिस ब्राह्मण के सहारे वह सत्ता में आईं थीं उस समुदाय को एक भी सीट नहीं मिली है।
पिछले कई चुनावों में बीएसपी का निराशाजनक प्रदर्शन
मायावती के नेतृत्व वाली बसपा ने 2012 के विधानसभा चुनावों में हारने के बाद से राज्य में काफी आधार खो दिया है। वह लगातार दस साल से हर चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन कर रही है। हालांकि बसपा के लिए बस राहत की बात यही है कि उसका क्षेत्रिय पार्टी का दर्जा अभी बचा हुआ है। यानी दलित वोट बैंक में जाटव अभी भी बसपा के साथ खड़ा है। बसपा ने कुल 17 मेयर उम्मीदवारों में से 11 मुस्लिम, तीन सीटें OBC, दो सीटें SC और एक सीट सवर्ण को उम्मीदवार को दी है।
दलित-मुस्लिम-गैर यादव ओबीसी पर फोकस
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो मायावती ने 2007-2012 के दौरान ब्राहृमणों के समर्थन से सीएम बनी थीं। तब बसपा ने अपने आपको 'बहुजन हिताय' के बजाय 'सर्वजन हिताय' की पार्टी के रूप में पेश किया था। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग में अनुसूचित जाति के कोर वोट बैंक के साथ ब्राह्मण समुदाय का बड़ा समर्थन शामिल था जिसका बसपा को काफी फायदा हुआ था। लेकिन 2014 के लोकसभा के बाद से ब्राहृमण बीजेपी की तरफ चला गया। इसी वजह से अब मायावती 20 फीसदी दलित, 20 फीसदी मुस्लिम और गैर यादव ओबीसी की रणनीति पर काम कर रही हैं।
वरिष्ठ राजनीतिक विष्लेशक मनीष हिन्दवी कहते हैं कि,
ओबीसी पर सभी पार्टियां फोकस कर रही हैं। चाहे वह बसपा हो या सपा। इन लोगों को ये पता चल गया है कि सवर्ण इनको वोट देने वाला नहीं है। दूसरी बात यह 2022 में बसपा का कोर वोट बैंक उससे खिसक गया। ईमानदारी से सिर्फ जाटव ही बसपा के साथ बना हुआ है। यूपी की सियासत में बसपा का जो भी कुछ रहा वह दलितों के दम पर रहा। कोर वोट के साथ मुस्लिम को सहेजने की लड़ाई है। 2022 में 90 फीसदी मुसलमानों ने अखिलेश को वोट किया लेकिन मुसलमानों को सपा से निराशा मिली है। मायावती को लगता है कि मुसलमानों की इस नाराजगी को कैश किया जा सकता है। बसपा ने इसी को देखते हुए गंभीर प्रयास शुरू किया है। बसपा अब 20 फीसदी दलित और 20 फीसदी मुस्लिम के साथ गैर यादव ओबीसी को जोड़ने की पॉलिटिक्स पर आगे बढ़ रही है।
नए फार्मूले के साथ आगे बढ़ना चाहती है बसपा
बसपा के रणनीतिकार बताते हैं कि अपनी रण्नीति में बदलाव इसलिए किया है क्योंकि वह मुस्लिम वोट बैंक को दलित वोट बैंक के फार्मूले के साथ आगे बढ़ना चाहती हैं। निकाय चुनावों में हालांकि बसपा ने एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है। पार्टी ने इस चुनाव में सवर्ण जाति के नवल किशोर नथानी को गोरखपुर से टिकट दिया है जो अग्रवाल (बनिया) समुदाय से हैं। मायावती ने केवल दो एससी-आरक्षित सीटों आगरा नगर निगम में लता कुमारी (आरक्षित) और झांसी में भगवान दास फुले पर दांव लगाया है।
17 मेयर उम्मीदवारों में ब्राम्हण एक भी नहीं
महापौर चुनावों के लिए बसपा के तीन ओबीसी उम्मीदवारों में कानपुर निकाय में अर्चना निषाद, अयोध्या में राममूर्ति यादव (अनारक्षित सीट) और वाराणसी (अनारक्षित सीट) में सुभाष चंद्र माझी शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर ओबीसी के लिए आरक्षित चार महापौर सीटों पर बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जिनमें सहारनपुर से खदीजा मसूद, मेरठ से हसमत अली, शाहजहांपुर से शगुफ्ता अंजुम (पिछड़ी वर्ग की महिला) और फिरोजाबाद में रुखसाना बेगम (पिछड़े वर्ग की महिला) शामिल हैं।
समाान्य सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार को तरजीह
वहीं बसपा ने महिलाओं के लिए आरक्षित तीन निकाय मेयर पदों में से दो में मुस्लिम उम्मीदवारों को भी मैदान में उतारा है। गाजियाबाद में निसारा खान और लखनऊ में शाहीन बानो को टिकट दिया है। सामान्य श्रेणी की सीटों पर मैदान में उतरे अन्य मुस्लिम उम्मीदवारों में अलीगढ़ में सलमान शाहिद, यूसुफ खान शामिल हैं। बरेली, मथुरा में रजा मोहतसिम अहमद, प्रयागराज में सईद अहमद और मुरादाबाद में मोहम्मद यामीन शामिल हैं।
बसपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा,
बहनजी अब इस बात को महसूस कर रहीं हैं कि 2007 में पार्टी के लिए काम करने वाली सोशल इंजीनियरिंग बाद के तीन विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में काम नहीं कर पाई। इसी को देखते हुए इस बार रणनीति में बदलाव किया गया है क्योंकि निकाय चुनाव ही लोकसभा चुनाव की नींव रखेंगे। यूपी में दलितों की तरह मुसलमान भी अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्हें सपा ने भी अकेला छोड़ दिया है जो उनके वोटों पर राजनीति करती रही है।
दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाम मुस्लिम-यादव फॉर्मूला
बसपा नेताओं का दावा है कि पार्टी का दलित-मुस्लिम गठजोड़ सपा के मुस्लिम-यादव फॉर्मूले से कहीं ज्यादा ताकतवर होगा। बसपा यह बताने की कोशिश कर रही है कि मायावती सरकार ने उनके कल्याण और प्रगति के लिए क्या काम किए थे। इन कामों को मुस्लिम समुदाय के बीच ले जाकर एक संदेश देने की कोशिश की जा रही। बसपा यह भी बताने की कोशिश कर रही है कि मायावती जब सीएम थीं तो किस तरह से मुस्लिम चेहरों को जगह दी गई थी।
क्या है BSP के नेताओं का दावा
बसपा के वरिष्ठ नेता धर्मवीर चौधरी कहते हैं कि,
मुस्लिम समुदाय का हित केवल बसपा के हाथों में सुरक्षित है। बहनजी ने अल्पसंख्यक छात्रों के लिए छात्रवृत्ति सुनिश्चित करने के अलावा उर्दू फ़ारसी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। बसपा अल्पसंख्यक समुदाय को मजबूत करेगी और वो बसपा को मजबूत करेंगे। सपा ने मुसलमानों को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है। मुसलमान और दलित साथ चलेंगे। आगे आपको इसके परिणाम देखने को मिलेगा।












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